Qutub Minar Destination Delhi Latest Travel

सितंबर में Qutub Minar घूमने का पूरा ट्रैवल गाइड

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अगर आप सितंबर में दिल्ली घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो Qutub Minar को अपनी घूमने की सूची में जरूर शामिल कर सकते हैं। दिल्ली का यह ऐतिहासिक इलाका सिर्फ एक ऊंची मीनार देखने की जगह नहीं है, बल्कि यहां कदम-कदम पर आपको पुरानी दिल्ली की कहानियां, ऐतिहासिक इमारतें और सदियों पुरानी वास्तुकला देखने को मिलती है। सितंबर में दिल्ली का मौसम धीरे-धीरे बदलने लगता है। मानसून की आखिरी बारिशों के बाद शहर की धूल कुछ कम हो जाती है और आसपास हरियाली दिखाई देने लगती है। हालांकि उमस पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन मई-जून वाली तेज गर्मी भी नहीं रहती। अगर आप पहली बार Qutub Minar आ रहे हैं, तो सिर्फ मीनार देखकर वापस जाने की जरूरत नहीं है। कुतुब कॉम्प्लेक्स के अंदर कई ऐसी ऐतिहासिक जगहें हैं, जिनकी अपनी अलग कहानी है। Qutub Minar, लौह स्तंभ, कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलाई दरवाजा, इल्तुतमिश का मकबरा और अधूरी अलाई मीनार, ये सब एक ही परिसर में देखने को मिलते हैं। इसलिए सितंबर में Qutub Minar का सफर इतिहास, घूमने और फोटोग्राफी तीनों के लिए अच्छा अनुभव बन सकता है। सितंबर में Qutub Minar घूमना कैसा रहेगा? सितंबर में दिल्ली में मानसून की विदाई शुरू हो जाती है। दिन में गर्मी और उमस महसूस हो सकती है, लेकिन बारिश के बाद मौसम कुछ बेहतर लग सकता है। इस समय कभी-कभी अचानक बारिश भी हो सकती है। इसलिए Qutub Minar घूमने निकलते समय मौसम का थोड़ा ध्यान रखना जरूरी है। अगर सुबह मौसम साफ है, तो सुबह का समय घूमने के लिए बेहतर रहेगा। इस समय धूप कम तेज होती है और भीड़ भी अपेक्षाकृत कम मिल सकती है। दोपहर में धूप और उमस बढ़ सकती है। इसलिए अगर आप सितंबर में Qutub Minar जा रहे हैं, तो पानी की बोतल, धूप का चश्मा और हल्का छाता साथ रखना अच्छा रहेगा। शाम के समय परिसर की रोशनी और बदलते आसमान के रंग फोटोग्राफी के लिए अच्छे लग सकते हैं। लेकिन प्रवेश समय मौसम और पुरातत्व विभाग के नियमों के अनुसार बदल सकता है, इसलिए जाने से पहले उसी दिन का समय जरूर जांच लें। फूल वालों की सैर के बारे में जरूरी बात महरौली इलाका सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों के लिए ही नहीं जाना जाता। यहां की सांस्कृतिक विरासत भी काफी खास है। फूल वालों की सैर दिल्ली की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे की मिसाल के तौर पर जानी जाती है। इस परंपरा में योगमाया मंदिर और सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादरें और खूबसूरत पंखे चढ़ाए जाते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि फूल वालों की सैर हर साल सितंबर में ही हो। वर्ष 2026 में यह आयोजन मार्च में हुआ था। इसलिए सितंबर की यात्रा के साथ इसे जोड़ने से पहले उस साल की आधिकारिक तारीख जरूर जांच लें। अगर आयोजन की तारीख आपकी यात्रा के समय से मिलती है, तो महरौली का अनुभव और खास हो सकता है। नहीं तो भी Qutub Minar और आसपास का ऐतिहासिक इलाका अपने आप में काफी दिलचस्प है। Qutub Minar जाने से पहले क्या पहनें? सितंबर के मौसम को देखते हुए कपड़ों का चुनाव थोड़ा सोच-समझकर करना अच्छा रहेगा। इस समय उमस रहती है और बारिश की संभावना भी बनी रहती है। हल्के और आरामदायक सूती या लिनन के कपड़े पहनना बेहतर रहेगा। बहुत भारी कपड़े पहनने से बचें, क्योंकि Qutub Minar परिसर में काफी पैदल चलना पड़ता है। महरौली इलाके में कई ऐतिहासिक और धार्मिक जगहें भी हैं। अगर आप Qutub Minar के साथ आसपास के मंदिर या दरगाह देखने का प्लान बना रहे हैं, तो ऐसे कपड़े पहनें जिनमें कंधे और घुटने ढके रहें। साथ में एक हल्का दुपट्टा, स्टोल या स्कार्फ रखना भी काम आ सकता है। अचानक बारिश हो जाए तो यह सिर ढकने या हल्की ठंड से बचने में मदद कर सकता है। जूते भी आरामदायक होने चाहिए। कॉम्प्लेक्स में घूमते हुए आपको काफी चलना पड़ेगा और कुछ रास्ते पथरीले भी हो सकते हैं। एक छोटी पानी की बोतल, धूप का चश्मा और फोल्डिंग छाता भी साथ रख सकते हैं। सितंबर में अचानक बारिश हो जाए तो यही छोटी चीजें काफी काम आती हैं। Qutub Minar कैसे पहुंचें? दिल्ली में कहीं से भी Qutub Minar पहुंचने के लिए मेट्रो सबसे आसान विकल्पों में से एक है। दिल्ली का ट्रैफिक कई बार आपका काफी समय ले सकता है, इसलिए मेट्रो से जाना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा। कुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर है। स्टेशन से Qutub Minar परिसर तक की दूरी पैदल चलने के लिए थोड़ी ज्यादा लग सकती है। इसलिए मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलने के बाद ऑटो, ई-रिक्शा या कैब लेना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा। अगर मौसम अच्छा हो और आपको पैदल चलना पसंद है, तो आसपास के महरौली इलाके को देखते हुए पैदल भी जा सकते हैं। अगर आप पहली बार दिल्ली आ रहे हैं और रास्तों की ज्यादा जानकारी नहीं है, तो मेट्रो से Qutub Minar जाना काफी आसान रहेगा। अपनी कार से आने वाले लोगों को पार्किंग और ट्रैफिक के लिए अतिरिक्त समय रखना चाहिए। सप्ताहांत और छुट्टी वाले दिन आसपास ज्यादा भीड़ मिल सकती है। Qutub Minar के अंदर क्या-क्या देखना है? कई लोग Qutub Minar देखकर सोचते हैं कि बस यही मुख्य जगह है और इसके बाद वापस चला जाए। लेकिन असल में कुतुब कॉम्प्लेक्स के अंदर कई ऐतिहासिक इमारतें हैं। अगर आपके पास समय है, तो पूरा परिसर आराम से घूमना बेहतर रहेगा। Qutub Minar सबसे पहले बात उसी जगह की, जिसके नाम पर पूरा परिसर पहचाना जाता है। Qutub Minar करीब 72.5 मीटर ऊंची मीनार है। इसकी शुरुआत 12वीं शताब्दी के अंत में कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाई थी। वह इसकी पहली मंजिल तक ही काम पूरा करवा पाए। इसके बाद इल्तुतमिश ने इसे आगे बढ़ाया और बाद में फिरोज शाह तुगलक ने इसकी मरम्मत करवाई। मीनार की बाहरी दीवारों पर खूबसूरत नक्काशी, अरबी कैलीग्राफी और कुरान की आयतें दिखाई देती हैं। ऊंचाई और इसकी बारीक कारीगरी इसे परिसर की सबसे खास इमारत बनाती है। पहले लोग इसकी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन सुरक्षा कारणों से अब अंदर जाना और सीढ़ियां चढ़ना बंद

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Delhi में 15 अगस्त को Qutub Minar में होगा Celebration

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15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर Delhi का माहौल हर साल कुछ अलग नजर आता है। शहर के प्रमुख इलाकों में तिरंगे की सजावट, देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम और ऐतिहासिक जगहों पर विशेष आयोजन देखने को मिलते हैं। लाल किले पर होने वाला मुख्य स्वतंत्रता दिवस समारोह देशभर में सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है, लेकिन इसके अलावा Delhi के ऐतिहासिक स्मारक भी इस दौरान लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। इन्हीं ऐतिहासिक जगहों में कुतुब मीनार का नाम सबसे ऊपर आता है। महरौली में स्थित यह ऐतिहासिक मीनार Delhi की पहचान से जुड़ी हुई है। करीब 73 मीटर ऊंची कुतुब मीनार अपनी वास्तुकला, इतिहास और आसपास मौजूद पुराने स्मारकों के कारण देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। स्वतंत्रता दिवस के आसपास कुतुब मीनार को केसरिया, सफेद और हरे रंग की रोशनी से सजाए जाने की जानकारी सामने आती रही है। रात में तिरंगे के रंगों से रोशन कुतुब मीनार का दृश्य सामान्य दिनों से काफी अलग दिखाई दे सकता है। अगर आप 15 अगस्त 2026 को Delhi में घूमने का प्लान बना रहे हैं और कुतुब मीनार को अपनी यात्रा में शामिल करना चाहते हैं, तो केवल इसकी लाइटिंग और खूबसूरती के बारे में जानना काफी नहीं है। आपको टिकट, मेट्रो कनेक्टिविटी, लाइट एंड साउंड शो, फोटोग्राफी का सही समय और सबसे जरूरी बात, उस दिन स्मारक खुला है या नहीं, इन सभी चीजों की जानकारी पहले से होनी चाहिए। स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे के रंगों में रोशन होगी कुतुब मीनार 15 अगस्त के मौके पर Delhi की कुतुब मीनार को खास रोशनी से सजाए जाने की जानकारी मिलती रही है। इसमें मीनार को भारतीय तिरंगे के तीन रंगों यानी केसरिया, सफेद और हरे रंग की रोशनी से सजाया जाता है। दिन के समय कुतुब मीनार अपने लाल और भूरे रंग के पत्थरों के कारण अलग दिखाई देती है, लेकिन रात में जब इस पर तिरंगे की रोशनी पड़ती है, तो इसका पूरा रूप बदल जाता है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस तरह की लाइटिंग का उद्देश्य ऐतिहासिक स्मारक को राष्ट्रीय पर्व से जोड़ना और लोगों के बीच देशभक्ति का माहौल बनाना होता है। अगर आप Delhi में 15 अगस्त के आसपास घूम रहे हैं, तो रात में कुतुब मीनार की रोशनी देखने का अनुभव अलग हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए, जो ऐतिहासिक जगहों की फोटोग्राफी पसंद करते हैं, यह एक अच्छा अवसर हो सकता है। हालांकि, यहां जाने से पहले यह जरूर देख लें कि उस दिन पर्यटकों के लिए प्रवेश की अनुमति है या नहीं। राष्ट्रीय पर्व पर सुरक्षा व्यवस्था सामान्य दिनों से अलग हो सकती है और ऐतिहासिक स्मारकों के नियमों में बदलाव किया जा सकता है। कुतुब मीनार का लाइट एंड साउंड शो कब होता है? कुतुब मीनार से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में लाइट एंड साउंड शो का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि यह शो प्रतिदिन रात 8 बजे से 9 बजे तक चलता है। करीब एक घंटे के इस शो में Delhi के इतिहास को रोशनी, दृश्य प्रभाव और narration के जरिए दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। Delhi का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और शहर के अलग-अलग हिस्सों में इसके निशान आज भी दिखाई देते हैं। ऐसे में लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से Delhi की विरासत और इतिहास को एक अलग तरीके से समझने का मौका मिल सकता है। अगर आप केवल कुतुब मीनार देखकर वापस आने की बजाय उसके इतिहास और Delhi की संस्कृति को समझना चाहते हैं, तो यह शो आपके लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन 15 अगस्त के दिन कार्यक्रम की timing या availability सुरक्षा व्यवस्था के कारण बदल सकती है। इसलिए अगर आपका मुख्य उद्देश्य लाइट एंड साउंड शो देखना है, तो घर से निकलने से पहले उस दिन के शो की पुष्टि जरूर करें। Golden Hour में कुतुब मीनार की फोटो क्यों अच्छी आती है? अगर आपको फोटोग्राफी का शौक है, तो Delhi की कुतुब मीनार आपके लिए काफी अच्छा फोटो स्पॉट हो सकती है। कुतुब मीनार की तस्वीरें लेने के लिए सूर्यास्त से पहले का समय यानी Golden Hour खास माना जाता है। इस समय सूरज की रोशनी तेज नहीं होती और मीनार पर पड़ने वाली रोशनी धीरे-धीरे बदलती रहती है। इस दौरान कुतुब मीनार के पत्थरों की बनावट, नक्काशी और ऊंचाई को अलग-अलग angle से capture किया जा सकता है। अगर आप 15 अगस्त को यहां जाने की योजना बना रहे हैं और स्मारक उस दिन पर्यटकों के लिए खुला है, तो कोशिश करें कि सूर्यास्त से कुछ समय पहले पहुंच जाएं। इससे आपको पहले स्मारक देखने और फोटोग्राफी करने का समय मिलेगा। बाद में अगर शाम का कोई कार्यक्रम उपलब्ध हो, तो उसमें भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि स्वतंत्रता दिवस के दिन भीड़ सामान्य दिनों से ज्यादा हो सकती है। इसलिए फोटोग्राफी के लिए सही जगह बनाने में थोड़ा समय लग सकता है।  कुतुब मीनार की टिकट कितनी है? कुतुब मीनार घूमने के लिए प्रवेश टिकट की आवश्यकता होती है। अलग-अलग प्रकार के Tour और Package के अनुसार इसकी कीमत बदल सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गाइड के साथ प्रवेश टिकट की कीमत लगभग 788 रुपये हो सकती है। अगर आप किसी निजी ऑपरेटर के माध्यम से परिवहन और गाइड सहित विशेष Package लेते हैं, तो इसकी कीमत करीब 2,407 रुपये तक जा सकती है। हालांकि ये कीमतें Package और Operator के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए अगर आप किसी Private Tour Package से कुतुब मीनार देखने जा रहे हैं, तो Booking से पहले यह जरूर देखें कि कीमत में कौन-कौन सी सुविधाएं शामिल हैं। कुछ Package में केवल गाइड शामिल हो सकता है, जबकि किसी दूसरे Package में वाहन, प्रवेश टिकट और दूसरी सुविधाएं भी शामिल हो सकती हैं। अगर आप Delhi में कम बजट में घूमने की योजना बना रहे हैं, तो Private Package लेने से पहले सामान्य प्रवेश टिकट और सार्वजनिक परिवहन के विकल्पों की तुलना कर लेना बेहतर रहेगा। कुतुब मीनार कहां स्थित है? कुतुब मीनार महरौली, नई दिल्ली में स्थित है। यह Delhi के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में शामिल है। कुतुब मीनार के आसपास भी कई ऐतिहासिक

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ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टिकोण से कुतुब मीनार

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“ऐसा क्या है जो दिल्ली शहर को खास बनाता है? वह कौन सी खासियत है जिसके कारण दिल्ली देश के बाकी राज्यों से अलग है? ऐसा क्या है दिल्ली शहर में जिसके कारण यह शहर देश की राजधानी है? इन सारे सवालों का जवाब है यहां का गौरवशाली इतिहास और उसकी गवाही देते यहां के बेहतरीन ऐतिहासिक इमारतें। इस शहर में दुनिया की सबसे अतरंगी और अद्भुत कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यह भारत का एकमात्र ऐसा शहर है जहां आपको एक या दो नहीं बल्कि हजार से भी अधिक ऐतिहासिक इमारतें देखने को मिलेंगी।”और दिल्ली के इन्हीं ऐतिहासिक इमारतों में से सबसे खास इमारत है महरौली स्थित कुतुब मीनार!(Qutub Minar) कुतुब मीनार (Qutub Minar) सुनहरें लफ़्ज़ों का इतिहासआज भी तेरे हर पत्थर, तेरी हर दीवार पर हैजो ख़ूबसूरती उस ज़माने में थीवही क़ातिलाना अदा आज क़ुतुब मीनार पर है। एक ऐसी मीनार जो ईट से बनी दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। एक ऐसा भव्य आकर्षण जिसे देखने के बाद आश्चर्य होना लाजमी है। एक ऐसी खूबसूरत इमारत जिसकी दीवारों पर कुरान पाक की आयतें गढ़ी गईं हैं और अंत में एक ऐसा साक्षी जो मुगल साम्राज्य के भारत में प्रसार का प्रत्यक्षदर्शी है। वैसे तो पूरी दिल्ली ही देखने के लिहाज़ से बहुत खास है पर इसकी कुछ नायाब इमारतों को देखे बिना दिल्ली दर्शन अधूरा है। क़ुतुब मीनार इन्हीं खास और नायाब जगहों में से एक है। इस बात में कोई शक नहीं कि मुगलों ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शायद इसी का परिणाम है दिल्ली चारों दिशाओं से बेहद खूबसूरत मुगल इमारतों से सजी हुई है।  कुतुब मीनार का इतिहास (The History of Qutub Minar) दुनिया के सबसे विशालतम मीनारो में शामिल इस मीनार का इतिहास भी उतना हीं विशाल है। यह बात उस समय की है जब भारत में अफगानी आक्रमणकारियों का आगमन हुआ था। सबसे पहले मोहम्मद गोरी ने यहां अपनी हुकूमत स्थापित की। लेकिन गोरी नहीं यहां लंबे समय तक शासन नहीं किया। वह अपने सबसे विश्वासनीय गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक की हाथ में सत्ता की बागडोर देकर वह वापस लौट गया। तब तक भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना नहीं हुई थी। भारत छोटे-छोटे रियासतों में बंटा हुआ था। वर्ष 1199 कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस मीनार की नींव रखी। लेकिन यह मीनार एक ही बार में बनकर तैयार नहीं हुआ, बल्कि इसे किश्तों में अलग-अलग मुगल शासकों द्वारा बनवाया गया था।कुतुबुद्दीन ऐबक इस मीनार की पहली मंजिल का ही निर्माण करवा पाया। उसकी मौत के बाद उसके दामाद इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार की दूसरी तीसरी और चौथी मंजिलों का निर्माण करवाया। इस मीनार की अंतिम मंजिल के निर्माण का श्रेय फिरोज शाह तुगलक को दिया जाता है। अब क्योंकि यह मीनार किश्तों में बनकर तैयार हुआ था इसलिए आप इस मीनार पर 12वीं सदी से 14वीं सदी तक मुगलकालीन स्थापत्य कला में आए बदलावों को भी साफ-साफ देख सकते है। कुतुब मीनार की संरचना (The Structure Of Qutub Minar) इस मीनार की सबसे पहली मंजिल के दीवारों को 12 गोल तथा 12 टिकों ने पिलरों से बनवाया गया है तथा इसके ऊपर पट्टियों में नक्काशियां की गई हैं। जब आप इन नक्काशीयों को गौर से देखेंगे आपको इनमें ज्यामितीय संरचनाओं, फूलों, अल्लाह के नामों तथा कुरान की आयतों के अंश देखने को मिलेंगे। इतना हीं नहीं, कुतुबुद्दीन ऐबक ने इनमें मोहम्मद गोरी का भी गुणगान किया है। ऐबक ने इन नकाशियों में अपने बारे में भी बहुत कुछ लिखवाया है। कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद इल्तुतमिश के द्वारा बनवाए गए अगले तीन मंजिलों में से दूसरी मंजिल की दीवार को गोल पिलर से किया गया है। इल्तुतमिश ने तीसरी मंजिल के दीवार को तिकोने पिलरों के सहायता से बनवाया गया है, जबकि चौथी मंजिल की दीवार सपाट गोल है। इल्तुतमिश ने अपने द्वारा बनवाई गई तीनों मंजिलों की दीवारों पर बनी पट्टियों में अपने बारे में खुदवाने के साथ-साथ कुरान पाक की आयत और फूल बेलों की नक्काशियां भी करवाई है।कहा जाता है कि 13वीं और 14वीं शताब्दी में आए भूकंप और बिजली गिरने के कारण इस मीनार के ऊपरी महलों को काफी क्षति पहुंची थी। जिनकी मरम्मत करवाते हुए फिरोज शाह तुगलक ने 1368 ईस्वी में इस मीनार के अंतिम महले का निर्माण करवाया था। अगर कुल मिलाकर कुतुब मीनार के लंबाई तथा चौड़ाई की बात की जाए तो इस पांच मंजिली भव्य इमारत की लंबाई 72.5 मीटर है। इस विशाल मीनार के आधार का विकास 14.3 मीटर तथा ऊपरी सिरे का व्यास 2.75 मीटर है।कुतुब मीनार के सभी मंजिलों पर दरवाजे बनवाए गए हैं जिनसे मीनार के छज्जे पर जाया जा सकता है। इन सभी दरवाजों को एक सीध में बनवाया गया है तथा इन सभी दरवाजों तक पहुंचाने के लिए कुतुब मीनार में पूरे 379 सीढ़ियां हैं। पूरा कुतुब मीनार परिसर 13 अलग-अलग व्यूपोइंट्स में बंटा हुआ है। हम में से ज्यादातर लोग मुख्य कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ से ही वाकिफ़ हैं पर और भी बहुत कुछ है अपनी नक़्क़ाशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार के इस परिसर में। परिसर में घुसते ही सबसे पहले नजर आती है काली गुबंद वाली मस्जिद। अंदर आते ही सबसे पहले इस मस्जिद पर ही नजर पड़ती है। आगे बढ़ने पर विशिष्ट मुगल शैली के बगीचें दिखाई देते हैं  जो कि मुगलों की प्रसिद्ध चार बाग की शैली में बने हैं। ये चार बाग शैली किसी भी इमारत में जान डाल देती है। प्रसिद्ध मुगल इमारतों में बागों की इसी शैली का प्रयोग किया जाना आम बात है। मीनार के पास मण्डप जैसी दिखने वाली संरचना को कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कहा जाता है। ये जानकारी पास लगे सूचना बोर्ड से ही मिली अन्यथा हम तो इसे एक सामान्य मण्डप भर समझ रहे थे। इस मस्जिद की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1190 के दशक में की थी। इस मस्जिद की खासियत इसकी स्थापत्य कला है। इंडो इस्लामिक शैली से बनी ये मस्जिद और इसकी नक्काशी एक बार तो आपको दीवाना ही बना देगी। नक्काशीदार स्तंभो पर खड़ी यह मस्जिद बनावट के मामले में बेहतरीन है। अगर यूं कहें कि कुतुब मीनार परिसर की शोभा बढ़ाने में इस मस्जिद का भी अमूल्य योगदान है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। कुतुब मीनार

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Qutub Minar Delhi – World Heritage Site

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Qutub Minar: कुतुब मीनार नहीं देखा तो दिल्ली दर्शन अधूरा है सुनहरें लफ़्ज़ों का इतिहास आज भी तेरे हर पत्थर, तेरी हर दीवार पर है जो ख़ूबसूरती उस ज़माने में थी वही क़ातिलाना अदा आज क़ुतुब मीनार पर है। वैसे तो पूरी दिल्ली ही देखने के लिहाज़ से बहुत खास है पर इसकी कुछ नायाब इमारतों को देखे बिना दिल्ली दर्शन अधूरा है। क़ुतुब मीनार इन्हीं खास और नायाब जगहों में से एक है। इस बात में कोई शक नहीं कि मुगलों ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शायद इसी का परिणाम है  दिल्ली चारों दिशाओं से बेहद खूबसूरत मुगल इमारतों से सजी हुई है। आज अपने दिल्ली दर्शन में हम निकले हैं क़ुतुब मीनार के दीदार पर। कैसे पहुंचे क़ुतुब मीनार लॉकडाउन के बाद से ही दिल्ली में मेट्रो सेवा कई जगहों पर बदहाल है, मेट्रो स्टेशन के बाहर लम्बी-लम्बी लाइन्स आसानी से देखने को मिल जाएँगी। इसलिए हमें इन सब से बचते हुए  डीटीसी बस यात्रा का आनंद लेना ही मुनासिब लगा। एक लंबी बस यात्रा के बाद हम पहुंचे क़ुतुब मीनार। लेकिन अगर आप मेट्रो से आते हैं तो यहाँ का मेट्रो स्टेशन है क़ुतुब मीनार। सड़क के एक तरफ कुतुब मीनार परिसर है तो दूसरी तरफ टिकट घर। 40 रुपये का टिकट लिया और उत्सुकतावश अपने कदम तेजी से बढ़ा दिए क़ुतुब मीनार की तरफ। भीड़ ठीक-ठाक ही थी, क्योंकि किसी भी ऐतिहासिक इमारत में चहल-पहल के बिना हमारी  दिल्ली अधूरी है जनाब। आपको कुतुबमीनार के परिसर में जहाँ एक तरफ युवा अलग-अलग पोज़ में फोटोशूट करते दिख जायेंगे वहीँ, परिवार के साथ आने वालों के लिए भी यह एक बेहतरीन यादगार जगह है। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। इन दिनों में जो एक चीज आप सभी पर्यटन स्थलों पर सबसे ज्यादा मिस करेंगे वो है विदेशी सैलानी। कोविड महामारी के कारण विदेशी सैलानियों की कमी महसूस हुई और उनके साथ इतिहास का बखान करने वाले ट्यूरिस्ट गाइड भी मीनार में दूर-दूर तक नज़र नहीं आए। बस सब समय का खेल है, उम्मीद करते हैं जल्द ही सब पहले जैसा हो। काली गुबंद वाली मस्जिद पूरा कुतुब मीनार परिसर 13 अलग-अलग व्यूपोइंट्स में बंटा हुआ है। हम में से ज्यादातर लोग मुख्य कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ से ही वाकिफ़ हैं पर और भी बहुत कुछ है अपनी नक़्क़ाशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार के इस परिसर में। परिसर में घुसते ही सबसे पहले नजर आती है काली गुबंद वाली मस्जिद। अंदर आते ही सबसे पहले इस मस्जिद पर ही नजर पड़ती है। आगे बढ़ने पर विशिष्ट मुगल शैली के बगीचें दिखाई देते हैं  जो कि मुगलों की प्रसिद्ध चार बाग की शैली में बने हैं। ये चार बाग शैली किसी भी इमारत में जान डाल देती है। प्रसिद्ध मुगल इमारतों में बागों की इसी शैली का प्रयोग किया जाना आम बात है। मीनार के पास मण्डप जैसी दिखने वाली संरचना को कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कहा जाता है। ये जानकारी पास लगे सूचना बोर्ड से ही मिली अन्यथा हम तो इसे एक सामान्य मण्डप भर समझ रहे थे। इस मस्जिद की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1190 के दशक में की थी। इस मस्जिद की खासियत इसकी स्थापत्य कला है। इंडो इस्लामिक शैली से बनी ये मस्जिद और इसकी नक्काशी एक बार तो आपको दीवाना ही बना देगी। नक्काशीदार स्तंभो पर खड़ी यह मस्जिद बनावट के मामले में बेहतरीन है। अगर यूं कहें कि कुतुब मीनार परिसर की शोभा बढ़ाने में इस मस्जिद का भी अमूल्य योगदान है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अलाई मीनार आप जैसे-जैसे परिसर में आगे बढ़ते जायेंगे वैसे ही अद्भुत स्थापत्य कला के मुरीद बनते चले जायेंगे। आगे दिखी अजीब-सी बेढ़ंगी चट्टान जैसी दिखने वाली एक इमारत। पास पहुंच कर पता चला ये है अलाई मीनार। जी, ये वही मीनार है जिसे दिल्ली के बाद के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बनाने की कोशिश की थी। ये खिलजी के अधूरे सपने जैसा है। खिलजी कुतुबमीनार से भी ऊंची इमारत बनाना चाहता था पर किसी कारणवश ये सपना अधूरा ही रह गया। इल्तुतमिश का मकबरा अलाई मीनार से आगे बढ़कर परिसर में एक सफेद और लाल बलुआ पत्थर से बना मकबरा नजर आ रहा था। ये वही मकबरा था जिसमें दिल्ली के दूसरे शासक इल्तुतमिश को दफनाया गया था। ये मकबरा कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के ठीक पीछे ही है। मकबरा अपनी इस्लामिक बनावट के कारण अलग ही नजर आ रहा था। इसकी खूबसूरती को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि ये एक कब्र है। किसी शाही महल जैसी इसकी बनावट वास्तव में अद्भुत है। बीच-बीच में बने सफेद मेहराब और खुली छत इसे और भी आकर्षक बनाते हैं। इसी के ठीक सामने अलाउद्दीन खिलजी का मदरसा है, जिसे शायद खिलजी ने अपनी छाप छोड़ने के लिए बनवाया था। मेहराबों के समूह जैसा दिखने वाला ये मदरसा शिक्षा का केंद्र रहा होगा, जिसमें छात्रों के लिए कमरें और पुस्तकालय हुआ करते थे। मदरसे का परिसर काफी विशाल है। मार्ग में आगे प्रेमी जोड़े तस्वीरें खिंचवाते दिखे। विचार आया इन्हें इस परिसर के इतिहास से क्या ही लेना देना। इनके लिए ये अब सिर्फ क्वालिटी टाइम बिताने का एक ठिकाना भर है। लौह स्तम्भ परिसर का बारीकी से मुआयना करते हुए हम कुतुब मीनार पास ही स्थित लौह स्तम्भ के करीब पहुंचे। बचपन में अपनी किसी किताब में इस लौह-स्तम्भ का जिक्र पढ़ा था। जो कहता था कि इस स्तम्भ को पीठ के बल खड़े होकर दोनों हाथों से गले लगा सकने वाला व्यक्ति भाग्यशाली होता है। इच्छा मेरी भी थी इस किंवदंती को एक बार आजमाने की। दुर्भाग्य से अब लौह स्तम्भ के चारों तरफ ग्रिल लगा दी गई है ताकि पर्यटक उसके पास न पंहुचे। शायद  अब स्तम्भ को देखना भर ही हमारे भाग्य में था। खैर, इसकी वैज्ञानिक खासियत को जान लेना भी जरूरी है। 550 ईस्वी से भी पहले का ये स्तम्भ आज भी अपने पौराणिक रूप में जस का तस है। आज भी जंग का एक कतरा इस स्तम्भ को छू तक नहीं पाया। स्तम्भ पर संस्कृत के शिलालेख उकेरे हुए हैं। स्तम्भ कुल 7.2