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Dilli Haat INA- जरूर देखें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की याद में बना ये म्यूजियम

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अगर आप इस वीकेंड दिल्ली घूमने का प्लान बना रहे हैं और दिल्ली की किसी यूनीक जगह या भीड़भाड़ से हटकर कुछ प्रेरणादायक देखना चाहते हैं, तो Dilli Haat INA के गेट नंबर 2 के पास स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल आपके लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल का उद्घाटन 30 जुलाई 2016 को किया गया था। यह मेमोरियल भारत के ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन से प्रेरित होकर बनाया गया है। इसी वजह से यहां आपको कलाम जी की सादगी और महानता की जीती-जागती मिसालें देखने को मिलती हैं। इसके साथ ही मेमोरियल में कलाम जी की कई निजी वस्तुएं और उनके द्वारा लिखे गए पत्र (लेटर्स) जैसी कई अहम चीजें भी देखने को मिलती हैं। तो आइए जानते हैं कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की कौन-सी निजी वस्तुएं इस मेमोरियल में रखी गई हैं और क्या खासियत है इस मेमोरियल की, जिसकी वजह से लोग इसे देखना पसंद करते हैं, और आखिर इसे दिल्ली हाट (INA) में ही क्यों बनाया गया। यह संग्रहालय दूसरे संग्रहालयों से क्यों अलग है? यह मेमोरियल दूसरे संग्रहालयों से इसलिए अलग है क्योंकि यहां आपको डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के पूरे जीवन की कहानी, या यूं कहें कि उनके जीवन की एक संक्षिप्त यात्रा देखने को मिलती है। यहां उनकी निजी वस्तुएं जैसे उनके जूते, चश्मा, कपड़े, पेन, यहां तक कि उनके इस्तेमाल किए गए बर्तन भी देखने को मिलते हैं। जिन लोगों के लिए कलाम जी एक प्रेरणा हैं, वे यहां आकर उन कई सवालों के जवाब पा सकते हैं, जो अक्सर उनके मन में होते हैं- जैसे कलाम जी किस तरह अपना जीवन व्यतीत करते थे या उन्हें कौन-सी चीजें ज्यादा पसंद थीं। अगर आप भी कलाम जी को अपना इंस्पिरेशन मानते हैं, तो यह संग्रहालय आपको जरूर विजिट करना चाहिए। इसके साथ ही इस संग्रहालय में आपको कुछ ऐसी बातें भी पता चलती हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। कलाम जी को संगीत का भी शौक था और वे एक बेहतरीन संगीतकार थे। इस मेमोरियल में उनकी पसंदीदा वीणा भी रखी गई है, जिसका वे अक्सर इस्तेमाल किया करते थे। मेमोरियल के फ्रंट में उनकी एक शानदार प्रतिमा लगी हुई है और दीवारों पर उनके लिखे हुए कोट्स और किताबों को बहुत ही खूबसूरत तरीके से प्रदर्शित किया गया है। इस मेमोरियल की थीम देखकर आपको रामेश्वरम की याद आ जाएगी, क्योंकि यहां का माहौल बिल्कुल साफ-सुथरा, शांत और सादगी से भरा हुआ है। सिर्फ मेमोरियल ही नहीं दिल्ली हाट और आस पास की जगहों को भी एक्सप्लोर करें क्योंकि यह मेमोरियल दिल्ली हाट के अंदर ही स्थित है, इसलिए यहां आपको एक ही जगह पर कई डेस्टिनेशन एक्सप्लोर करने का मौका मिल जाता है। अगर आप डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल देखने जा रहे हैं, तो दिल्ली हाट (INA) में आप अलग-अलग राज्यों के फूड कोर्ट का मज़ा ले सकते हैं और साथ ही हस्तशिल्प की खरीदारी भी कर सकते हैं। इसके अलावा, अगर आप दिल्ली की और जगहें एक्सप्लोर करना चाहते हैं, तो इस इलाके के 2–3 किलोमीटर के दायरे में ही लोधी गार्डन और सफदरजंग का मकबरा जैसी मशहूर जगहें भी देखी जा सकती हैं। दिल्ली सरकार ने इस जगह को सिर्फ एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में विकसित किया है, जहां आपको पूरे भारत की संस्कृति, खान-पान और कला देखने को मिलती है। पर्यटकों के लिए जरूरी जानकारी यह मेमोरियल सुबह 11:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है, जबकि सोमवार को बंद रहता है। यहां पहुंचने के लिए सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन INA है, जो पिंक लाइन पर स्थित है। मेट्रो स्टेशन से यह मेमोरियल पैदल दूरी पर ही मौजूद है। इस मेमोरियल को देखने के लिए अलग से कोई टिकट लेने की आवश्यकता नहीं होती। जब आप दिल्ली हाट (INA) का टिकट लेते हैं, उसी टिकट के जरिए आप इस मेमोरियल में भी प्रवेश कर सकते हैं। Written by Shivani Pal

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लोधी गार्डन : दिल्ली में स्थित गुंबदों और मकबरों की दास्ताँ

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दिल्ली की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और महानगर की चकाचौंध के बीच, एक ऐसी हरी-भरी जगह है जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को बयां करती है, लोधी गार्डन। यह कोई आम बगीचा नहीं, बल्कि इतिहास के रंगों और प्रकृति की शांति का खूबसूरत मेल है। जब आप लोधी गार्डन में प्रवेश करते हैं, तो आपको सिर्फ एक बगीचा देखने को नहीं मिलता, बल्कि सदियों पुराना एक इतिहास मिलता है, जो हर पेड़, हर पत्थर और हर रास्ते में अपनी कहानी बुन रहा होता है। इस स्थान की जड़ें 15वीं सदी तक जाती हैं, जब सैय्यद और लोदी वंश के शासकों ने इसे अपने विश्राम और समाधि स्थल के रूप में चुना। गार्डन में मौजूद प्रमुख स्मारकों में मोहम्मद शाह और सिकंदर लोदी के मकबरे शामिल हैं, जो इंडो-इस्लामिक (Indo- Islamic) स्थापत्य कला के शानदार उदाहरण हैं। आओ, लोधी गार्डन के इतिहास को जानें- इन मकबरों की स्थापत्य विशेषताएँ , जैसे अष्टकोणीय संरचना, छतरियाँ, अलंकृत दरवाज़े और खूबसूरत प्लास्टर वर्क- उस दौर की वास्तुकला में झलकने वाली कला और सौंदर्य को दर्शाते हैं। मोहम्मद शाह, जो सैय्यद वंश के तीसरे शासक थे, उनका मकबरा आज भी अपनी भव्यता के साथ यहाँ मौजूद है, और ऐसा माना जाता है कि उसमें उनके साथ उनके परिवार के सदस्यों की भी कब्रें हैं। जहाँ आज हम पेड़ों के नीचे बैठकर शांति को महसूस कर पाते हैं, वहाँ कभी एक ‘ख़ैरपुर’ गाँव हुआ करता था। 1931 तक ये क्षेत्र गाँव के रूप में मौजूद था, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान 1936 में यहाँ के ग्रामीणों को हटाकर, इस क्षेत्र को एक सुव्यवस्थित बग़ीचे के रूप में विकसित किया गया और ब्रिटिश वायसराय की पत्नी के नाम पर इसका नाम रखा गया ‘लेडी विलिंगडन पार्क‘। (Lady Willingdon Park) स्वतंत्रता के बाद, 1947 में इसका नाम बदला गया और इसे आज के लोधी गार्डन के रूप में पहचाना जाने लगा। इतिहासस से शहरी रिट्रीट तक का सफर – लोधी गार्डन 1968 में इस गार्डन को दो प्रसिद्ध शख्सियतों ने नया रूप दिया- अमेरिकन लैंडस्केप आर्किटेक्ट गैरेट एक्बो और आर्किटेक्ट जोसेफ एलन स्टीन, जिन्होंने यहाँ ग्लास हाउस, फाउंटेन से सजी झील, बोनसाई गार्डन और गुलाब उद्यान जैसी विशेषताएँ जोड़ीं। नतीजा यह निकला कि यह स्थान एक ऐतिहासिक पार्क से एक बहु-आयामी शहरी रिट्रीट बन गया, जहाँ लोग न सिर्फ इतिहास से रूबरू होते हैं, बल्कि प्रकृति की गोद में कुछ सुकून के पल भी बिता सकते हैं। बड़ा गुम्बद बड़ा गुम्बद लोधी गार्डन के मध्य में स्थित है जो कि तीन संरचनाओं से मिलकर बना है। बड़ा गुम्बद, मस्जिद, और मेहमान ख़ाना (गेस्ट हाउस)। “बड़ा गुम्बद” नाम अपने विशाल गुंबद के कारण पड़ा, जिसकी ऊँचाई लगभग 27 मीटर और माप 19 x 19 मीटर है। इसकी अनोखी बात यह है कि इसमें कोई कब्र नहीं है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह एक भव्य प्रवेशद्वार रहा होगा। इसके चारों ओर की दीवारें खुली हैं, और इसके ऊपरी हिस्से में कंगूरों का अद्भुत डिज़ाइन, काले संगमरमर की सजावट और लाल पत्थर की नक्काशी इस इमारत को सौंदर्य और भव्यता का प्रतीक बनाते हैं। मस्जिद और मेहमान खाना इसके सामने स्थित मस्जिद और मेहमान खाना भी स्थापत्य कला के बेहतरीन उदाहरण हैं। मस्जिद में “मेहराब” है, जो पश्चिमी दीवार में नमाज़ की दिशा दर्शाने के लिए होता है। मेहमान खाना भी इसी पैमाने पर बना है लेकिन बिना गुंबद और परिसज्जा के। यहाँ की मेहराबें और संयोजन उस समय की जीवनशैली को दर्शाते हैं। शीश गुम्बद शीश गुम्बद, जो अपनी चौकोर संरचना और छिपी हुई सीढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है, लोधी गार्डन का एक और आकर्षण है। इसकी दीवारों पर खुले हुए द्वार और हवादार आर्किटेक्चर इसे एक ऐसा मकबरा बनाते हैं, जिसमें वास्तुकला के साथ-साथ वायुमंडल का भी बढ़िया सामंजस्य है। अंदर का मुख्य कक्ष 10 मीटर का है और इसमें भी कई कब्रें हैं। कल से आज तक आज का लोधी गार्डन सिर्फ इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर किसी के लिए खुला है- चाहे आप एक जॉगिंग ट्रैक पर भागना चाहें, बच्चों के साथ पिकनिक का मज़ा लेना हो या फिर किसी शांत कोने में बैठकर किताब पढ़नी हो, यह जगह हर मूड और हर मौसम के लिए उपयुक्त है। यहाँ की पगडंडियाँ, पुराने पेड़, रंग-बिरंगे फूल, झील के किनारे बहता पानी और पक्षियों की चहचहाहट, हर कदम पर आपको एक नया अनुभव देते हैं। साथ ही, यह गार्डन कला प्रेमियों के लिए भी एक सौगात है। यहाँ प्रदर्शित मूर्तियाँ और कला-कृतियाँ इस स्थान को और भी जीवंत बनाती हैं। यहाँ पर समय जैसे ठहर जाता है- हर पत्थर इतिहास बोलता है और हर पौधे में जीवन झलकता है।‎लोधी रोड पर स्थित यह गार्डन, सफदरजंग टॉम्ब और खान मार्केट के बीच बसा हुआ है, और दिल्लीवासियों व पर्यटकों दोनों का एक पसंदीदा स्थान है। जब भी दिल्ली के शोरगुल से राहत की तलाश हो, और मन इतिहास से संवाद करना चाहे, तो आप लोधी गार्डन जा सकते हैं। क्योंकि यह सिर्फ एक बाग़ नहीं, एक ऐसी सुंदर जगह है जो आपको नित्य नए अनुभव दे सकती है। यह गार्डन इतिहास, प्रकृति और एक केवल महसूस की जाने वाली शांति के संगम का यह खूबसूरत उदाहरण है।‎