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आखिर क्यों Murthal के पराठे इतने मशहूर हैं? जानें पूरी कहानी

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कभी-कभी घूमने के लिए किसी बड़े टूरिस्ट प्लेस की जरूरत नहीं होती। बस गाड़ी उठाइए, दोस्तों या परिवार को साथ लीजिए और किसी ऐसे हाईवे पर निकल जाइए जहां रास्ते में गरमा-गरम खाना आपका इंतजार कर रहा हो। दिल्ली-एनसीआर में रहने वालों के लिए ऐसा ही एक नाम है Murthal। दिल्ली से निकलकर जैसे ही हाईवे का सफर शुरू होता है, कुछ ही देर बाद बड़े-बड़े ढाबों के बोर्ड, पार्किंग में खड़ी गाड़ियां और तंदूर से आती खाने की खुशबू बता देती है कि आप मूरथल पहुंचने वाले हैं। यहां आने का मजा सिर्फ खाना खाने में नहीं है। असली मजा तो उस पूरे माहौल में है—हाईवे की ड्राइव, दोस्तों के साथ बातें, सामने रखा गरमा-गरम पराठा, ऊपर पिघलता सफेद मक्खन और साथ में ठंडी या गाढ़ी लस्सी। Murthal आज सिर्फ सोनीपत के पास मौजूद एक हाईवे पड़ाव नहीं रह गया है। यह दिल्ली से निकलने वाली छोटी रोड ट्रिप का एक ऐसा हिस्सा बन चुका है, जहां लोग कई बार सिर्फ पराठे खाने के लिए भी पहुंच जाते हैं। तो इस बार बात सिर्फ आलू पराठे की नहीं होगी। इस ब्लॉग में जानेंगे कि मूरथल ढाबा कल्चर की शुरुआत कैसे हुई, यहां के पराठों में ऐसा क्या खास है, कौन-कौन से ढाबे चर्चित हैं, कितना बजट रखना चाहिए, कब जाना सही रहेगा और खाने के साथ आसपास क्या देखा जा सकता है। ट्रक ड्राइवरों के पड़ाव से कैसे बना मूरथल का ढाबा हब? आज जिस Murthal को देखकर आपको बड़े-बड़े रेस्टोरेंट और चमकते ढाबे दिखाई देते हैं, उसकी शुरुआत इतनी ग्लैमरस नहीं थी। कई दशक पहले यह इलाका हाईवे से गुजरने वाले ट्रक ड्राइवरों के लिए रुकने की जगहों में से एक था। लंबी दूरी तय करने वाले ड्राइवरों को रास्ते में ऐसा खाना चाहिए होता था जो सादा हो, पेट भर दे और ज्यादा समय भी न लगाए। इसी जरूरत ने सड़क किनारे छोटे ढाबों को जन्म दिया। यहां दाल, रोटी, सब्जी, पराठे, दही और चाय जैसी चीजें मिलती थीं। धीरे-धीरे हाईवे से गुजरने वाले दूसरे यात्रियों ने भी इन ढाबों का स्वाद लेना शुरू किया। समय के साथ दिल्ली और चंडीगढ़ के बीच बढ़ते ट्रैफिक ने इस पूरे इलाके को और लोकप्रिय बना दिया। छोटे ढाबों की जगह बड़े रेस्टोरेंट बनने लगे, लेकिन देसी स्वाद और हाईवे वाला माहौल आज भी इसकी सबसे बड़ी पहचान बना हुआ है। यही वजह है कि Murthal की कहानी सिर्फ खाने की कहानी नहीं है। यह उस सड़क संस्कृति की कहानी भी है जो यात्रियों, ट्रक ड्राइवरों, परिवारों और दोस्तों को एक ही टेबल पर लेकर आती है। आखिर मूरथल के पराठों में ऐसा क्या खास है? मूरथल का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में क्या आता है? तंदूरी पराठा, सफेद मक्खन और लस्सी। यही तीन चीजें यहां के खाने की पहचान बन चुकी हैं। यहां के पराठों में आलू, गोभी, पनीर, प्याज, मूली और सोया जैसी कई तरह की स्टफिंग मिल जाती है। तंदूर की गर्म आंच पर तैयार होने के कारण इनका स्वाद सामान्य तवे वाले पराठे से थोड़ा अलग महसूस होता है। गर्म पराठा प्लेट में आते ही उसके ऊपर रखा सफेद मक्खन धीरे-धीरे पिघलने लगता है। साथ में हरी चटनी, अचार और सिरके वाला प्याज मिल जाए तो पूरा कॉम्बिनेशन तैयार हो जाता है। और अगर इसके साथ एक बड़ी गिलास लस्सी भी आ जाए, तो फिर Murthal की रोड ट्रिप का असली मजा समझ आता है। सफेद मक्खन से लेकर पंचरंगा अचार तक, प्लेट में क्या-क्या मिलता है? मूरथल के पराठे को सिर्फ पराठा समझना थोड़ा कम होगा। यहां उसके साथ मिलने वाली छोटी-छोटी चीजें भी स्वाद को खास बनाती हैं। सफेद मक्खन इसकी सबसे चर्चित चीजों में से एक है। गर्म पराठे पर मक्खन का टुकड़ा रखते ही वह पिघलने लगता है और पराठे के साथ मिलकर अलग ही स्वाद देता है। इसके साथ हरी चटनी, सिरके वाला प्याज और अचार दिया जाता है। कई जगह पानीपत का पंचरंगा अचार भी खाने को मिलता है। अगर आपको तीखा-खट्टा स्वाद पसंद है तो यह अचार पराठे के साथ काफी अच्छा लगता है। खाने के बाद मीठी लस्सी, कुल्हड़ वाली चाय या गरम जलेबी का नंबर आता है। यानी Murthal में एक छोटा-सा नाश्ता भी आसानी से पूरा खाना बन सकता है। अमरीक सुखदेव: मूरथल का सबसे पहचाना जाने वाला नाम अगर पहली बार Murthal जा रहे हैं तो अमरीक सुखदेव का नाम शायद सबसे पहले सुनने को मिलेगा। यह जगह लंबे समय से मूरथल की पहचान से जुड़ी हुई है और हाईवे से गुजरने वाले लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। यहां पराठे, सफेद मक्खन, लस्सी और जलेबी जैसे देसी खाने काफी पसंद किए जाते हैं। इसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि खासकर छुट्टी और वीकेंड के दिनों में यहां अच्छी-खासी भीड़ मिल सकती है। इसलिए अगर आप यहां आराम से बैठकर खाना चाहते हैं तो सुबह थोड़ा जल्दी पहुंचना बेहतर हो सकता है। भीड़ देखकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन वीकेंड पर थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है। गुलशन ढाबा: पुराने स्वाद के साथ बड़ा ढाबा अनुभव मूरथल के पुराने चर्चित नामों में गुलशन ढाबा भी गिना जाता है। लंबे समय से यहां लोग पराठे और देसी खाना खाने आते रहे हैं। गोभी और पनीर के पराठे जैसे विकल्प यहां खास तौर पर पसंद किए जाते हैं। बड़े हॉल और परिवार के साथ बैठकर खाने की सुविधा इसे उन लोगों के लिए उपयोगी बनाती है जो छोटे सड़क किनारे ढाबे की जगह थोड़ा व्यवस्थित माहौल चाहते हैं। Murthal में ढाबों की यही खासियत है कि आपको एक तरफ बिल्कुल देसी और सादा माहौल मिल सकता है, तो दूसरी तरफ बड़े परिवार के साथ बैठकर खाने वाली जगहें भी मिल जाती हैं। अहूजा ढाबा: सादा खाना और देसी माहौल नंबर 1 अहूजा ढाबा उन जगहों में गिना जाता है जो मूरथल के पुराने ढाबा कल्चर को दिखाते हैं। यहां की खास बात सिर्फ खाना नहीं बल्कि माहौल भी है। एक ही जगह पर आपको अलग-अलग तरह के लोग खाना खाते दिख सकते हैं। कोई ट्रक से आया है, कोई परिवार के साथ रुका है और कोई दोस्तों के साथ रोड ट्रिप पर निकला है। दाल, रोटी, सब्जी और पराठे जैसे सादे खाने के

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Murthal: जहाँ पराठे के लिए लोग आधी रात को भी निकल पड़ते हैं

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अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं और अब तक Murthal के मशहूर पराठों का स्वाद नहीं चखा है, तो यकीन मानिए आपकी रोड ट्रिप वाली लिस्ट अभी अधूरी है। दिल्ली से कुछ ही दूरी पर एनएच-44 यानी पुराने ग्रैंड ट्रंक रोड पर बसा Murthal आज सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि देश के सबसे लोकप्रिय फूड डेस्टिनेशन्स में से एक बन चुका है। पहले जहाँ यह जगह मुख्य रूप से ट्रक ड्राइवरों के लिए जानी जाती थी, वहीं आज हर उम्र और हर वर्ग के लोग सिर्फ यहाँ के मक्खन से लदे पराठे और गाढ़ी लस्सी का स्वाद लेने के लिए आते हैं। दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और आसपास के शहरों से लोग देर रात या सुबह-सुबह लंबी ड्राइव का मज़ा लेते हुए Murthal पहुँचते हैं। यही वजह है कि आज Murthal  सिर्फ खाने की जगह नहीं बल्कि एक पूरा वीकेंड एक्सपीरियंस बन चुका है। Murthal का इतिहास: 20 चारपाइयों से ₹100 करोड़ तक का सफर Murthal की सफलता की कहानी भी इसके पराठों जितनी ही दिलचस्प है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी जब सीताराम नाम के एक व्यक्ति ने यहाँ पहला ढाबा शुरू किया। उस समय यह इलाका सिर्फ हाईवे का एक साधारण पड़ाव था, जहाँ से ट्रक ड्राइवर और यात्री गुजरते थे। इसके कुछ साल बाद, 1956 में सरदार प्रकाश सिंह ने एक छोटा सा ढाबा शुरू किया। उस समय उनके ढाबे में सिर्फ 20 चारपाइयाँ थीं और खाना लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जाता था। उनका मकसद यात्रियों और ट्रक ड्राइवरों को सस्ता, स्वादिष्ट और घर जैसा खाना उपलब्ध कराना था। धीरे-धीरे यह ढाबा यात्रियों के बीच मशहूर होने लगा। बाद में उनके बेटों अमरीक सिंह और सुखदेव सिंह ने इस कारोबार को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। आज अमरीक सुखदेव ढाबा सिर्फ Murthal ही नहीं बल्कि पूरे भारत का एक प्रतिष्ठित नाम बन चुका है। इसका सालाना कारोबार करीब ₹100 करोड़ तक पहुँच चुका है और इसे दुनिया के प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट्स में भी गिना जाता है। जिस जगह कभी सिर्फ कुछ चारपाइयाँ हुआ करती थीं, आज वहाँ हजारों लोग रोज खाना खाने आते हैं। Murthal के प्रसिद्ध ढाबे: कहाँ क्या है खास? Murthal में दर्जनों ढाबे मौजूद हैं, लेकिन कुछ ऐसे नाम हैं जो हर यात्री की पहली पसंद बने हुए हैं। सबसे पहले बात आती है अमरीक सुखदेव की। यह Murthal का सबसे लोकप्रिय ढाबा माना जाता है। यहाँ के आलू पराठे, पनीर पराठे, सफेद मक्खन और मीठी लस्सी की चर्चा पूरे देश में होती है। यह ढाबा 24 घंटे खुला रहता है और यहाँ हमेशा भीड़ देखने को मिलती है। फिर भी इसकी सर्विस इतनी तेज़ है कि लोगों को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता। गुलशन ढाबा भी Murthal के पुराने और भरोसेमंद नामों में गिना जाता है। 1950 के दशक से चल रहा यह ढाबा अपने गोभी और पनीर पराठों के लिए काफी मशहूर है। यहाँ आपको पारंपरिक ढाबे का माहौल भी मिलता है और आधुनिक सुविधाएँ भी। अगर आप परिवार के साथ आराम से बैठकर खाना चाहते हैं, तो गरम धरम एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इसका माहौल अपेक्षाकृत शांत रहता है और यहाँ परिवारों की अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिलती है। जन्मदिन, सालगिरह या छोटे-मोटे फैमिली फंक्शन के लिए भी लोग इस जगह को पसंद करते हैं। वहीं नंबर 1 आहूजा ढाबा अपनी सादगी और पुराने ढाबा कल्चर के लिए जाना जाता है। यहाँ आपको एक ही टेबल पर ट्रक ड्राइवर, बिजनेस मैन और पर्यटक साथ बैठकर खाना खाते दिखाई दे सकते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। पराठों का स्वाद: सफेद मक्खन और तंदूर का जादू Murthal के पराठे आखिर इतने खास क्यों होते हैं? इसका जवाब उनके बनाने के तरीके में छुपा है। यहाँ पराठों को सामान्य तवे की बजाय अक्सर तंदूर में धीमी आँच पर पकाया जाता है। इससे पराठों में एक अलग तरह का स्मोकी फ्लेवर आ जाता है जो स्वाद को और बढ़ा देता है। जब पराठा तैयार हो जाता है तो उसके ऊपर घर का बना सफेद मक्खन भरपूर मात्रा में रखा जाता है। यही मक्खन Murthal के पराठों की असली पहचान माना जाता है। आलू, पनीर, प्याज और मिक्स वेज पराठे यहाँ सबसे ज्यादा ऑर्डर किए जाते हैं। इनके साथ मिलने वाली दही, अचार और मक्खन का कॉम्बिनेशन स्वाद को और भी शानदार बना देता है। घर पर बनाएं Murthal  जैसे तंदूरी पराठे अगर आप Murthal नहीं जा पा रहे हैं, तो घर पर भी वैसा स्वाद लाने की कोशिश कर सकते हैं। इसके लिए गेहूँ का आटा, उबले आलू, बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च, अदरक, हरा धनिया और अपने पसंदीदा मसाले लें। आटे को थोड़ा तेल और नमक मिलाकर नरम गूंध लें। इसके बाद आलू की स्टफिंग तैयार करें और लोई में भरकर पराठा बेल लें। यदि आपके पास गैस तंदूर है तो उसमें सेकें, नहीं तो मोटे तवे पर धीमी आँच पर अच्छी तरह पकाएँ। आखिर में ऊपर से सफेद मक्खन डालकर गर्मागर्म परोसें। स्वाद काफी हद तक Murthal जैसा महसूस होगा। पर्यावरण और सरकारी नियम Murthal की बढ़ती लोकप्रियता के साथ यहाँ पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। हाल के वर्षों में हरियाणा सरकार ने ढाबा मालिकों को साफ-सफाई और वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं। सरकार ने कई ढाबों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना अनिवार्य किया है ताकि आसपास के इलाकों में प्रदूषण न फैले। जो ढाबे पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन नहीं करते, उनके खिलाफ कार्रवाई और भारी जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है। इसका उद्देश्य Murthal की लोकप्रियता के साथ-साथ यहाँ के प्राकृतिक वातावरण को भी सुरक्षित रखना है। ट्रैवल टिप्स और जरूरी जानकारी अगर आप Murthal घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो कुछ छोटी-छोटी बातें आपकी यात्रा को और बेहतर बना सकती हैं। सुबह 8 बजे से पहले या देर रात यहाँ पहुँचना सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि उस समय भीड़ अपेक्षाकृत कम होती है। वीकेंड पर खासकर शनिवार और रविवार को यहाँ काफी भीड़ रहती है। दो लोगों के लिए खाने का औसत खर्च लगभग ₹500 से ₹1000 तक आ सकता है, जो आपके ऑर्डर पर निर्भर करता है। बड़े ढाबों में पार्किंग की सुविधा उपलब्ध रहती है, लेकिन भीड़ के समय टेबल मिलने

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Murthal ke Paranthe

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Murthal ke Paranthe: मुरथल के परांठे वाले ढाबे -जहाँ रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग खाने का लुत्फ उठाते हैं by Pardeep Kumar अगर आप परांठे खाने के शौक़ीन हैं तो आज हम आपको अपने इस ब्लॉग में रू-ब-रू करवाएंगे तकरीबन देश भर में प्रसिद्ध मुरथल के मशहूर परांठों के स्वाद से। वैसे तो मुरथल के परांठे पूरे देश में फेमस हैं लेकिन फिर भी दिल्ली से लगते सात राज्यों में अपने पराठों के स्वाद के लिए प्रसिद्ध मुरथल के ढाबों का कोई सानी नहीं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भी लोग यहाँ आकर परांठों का लुत्फ़ उठाते हैं। खासकर शनिवार और रविवार को यहां दिल्ली-एनसीआर से परांठों के शौकीनों की भारी भीड़ उमड़ती है। अगर आप दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे हैं तो एन एच 1 पर सोनीपत के नजदीक और दिल्ली से तकरीबन घंटे भर के सफर पर एक छोटे से कस्बे मुरथल में यह ढ़ाबे मौजूद हैं। (Murthal ke Paranthe) किसान आंदोलन और दिल्ली से मुरथल का सफर काफी दिनों से मुरथल का प्लान बनाया जा रहा था। क्योंकि आजकल किसान आंदोलन के कारण दिल्ली से मुरथल पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो गया था इसलिए कई बार प्रोग्राम बना और बिगड़ भी गया। लेकिन इस बार वीकेंड पर हमने ठान लिया था कि कैसे भी करके मुरथल के परांठे खाने ही हैं। सो दिल्ली से हमने औचंदी बॉर्डर का रास्ता लिया और अंदर अलग-अलग गांव से होते हुए सोनीपत शहर से गुजरते हुए तकरीबन दोपहर के 3 बजे मुरथल पहुंचे। और जब आप इस तरह का सफर तय करते हैं तब भूख कुछ ज्यादा ही लग जाती है और मैं हमेशा कहता हूँ खाने का असली मजा तब है जब आपको जोर की भूख लगी हो। और ऊपर से मुरथल के विख्यात परांठे हो वो भी ताजा मक्खन के साथ तो बस समझ लीजिये आपका दिन बन गया। वैसे तो मेरा सारा बचपन सोनीपत शहर में ही गुजरा है। 12वीं कक्षा तक मेरी स्कूली एजुकेशन इसी शहर में हुयी और इसी कारण जब भी मेरा और मेरे कुछ दोस्तों का मन करता तब हम सोनीपत से मुरथल आ जाते थे परांठे खाने। सोनीपत से मुरथल यही 6-7 किलोमीटर है और आजकल तो ऐसा लगता है कि मुरथल सोनीपत शहर में ही मिल गया है। वो नब्बें का दशक था। यही 1997-98 का समय। स्कूल टाइम की यादें और मुरथल के परांठे मुझे अच्छे से याद है तब मुरथल बस स्टॉप से पानीपत की तरफ थोड़ा आगे निकल कर गुलशन का ढ़ाबा ही फेमस हुआ करता था और उसके आसपास एक दो ढ़ाबे और थे। तब परांठे का साइज आज के परांठों के साइज से बड़ा होता था। तब मुरथल के ढाबों पर सिर्फ दाल मखनी, परांठे, खूब सारा मक्खन और मीठे में खीर ही मिलती थी लेकिन आज यहां पर हर प्रकार के शाकाहारी स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं। नब्बे के दशक में हम देखते थे कि पहले सिर्फ ट्रक चालक यहां से गुजरते हुए रुककर खाना खाते थे, या फिर सोनीपत के युवाओं की टोलियां जिनका कभी-कभार बाहर खाने का मन करता। लेकिन आज यहाँ का मंज़र बिलकुल बदल चुका है, अब आपको इन फुली एयर कंडीशंड ढाबों की पार्किंग में सैंकड़ों लक्ज़री कार दिखाई देंगी और कई बार तो भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग की जगह होने के बाद भी यहाँ आपको अपनी कार पार्क करने की जगह नहीं मिलती। Murthal Ke Paranthe आजकल लोग यहां अपने परिवार के साथ पार्टी व अन्य पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित करने आते हैं, मैंने आपको पहले ही बताया कि दिल्ली से महज घंटा भर की ड्राइव कर यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही बड़ी वजह है कि दिल्ली और एनसीआर के लोग खासकर युवा यहाँ अक्सर देर रात या वीकेंड पर पराठे खाने के लिए आते हैं। बताते हैं मुरथल के ढाबों की शुरुआत 1950-60 के दशक में हुई थी। बेहद परम्परागत ढाबों के तौर पर शुरू हुए यह ढाबे आज अपनी अलग ही क्रेज बना चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग यहां आकर खाने का लुत्फ उठाते हैं। यह वास्तव में एक अद्भुत संख्या है। वैसे तो यहाँ जितने भी ढाबे हैं चाहे काफी पुराना पहलवान ढाबा हो, आहूजा हो या फिर झिलमिल उन सभी में परांठों का स्वाद लाजवाब है लेकिन फिर भी अमरीक सुखदेव का पिछले एक दशक से यहाँ एक तरफा राज है। शायद यही वजह है अगर आप वीकेंड पर यहाँ आएंगे तो हो सकता है लगभग 20-25 मिनट आपको बैठने के लिए सीट भी न मिले। लेकिन कहते हैं न कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, बस यहाँ इंतज़ार का फल बेहद स्वादिष्ट मिलेगा। सुपर स्टार धर्मेंद्र का गरम-धरम ढाबा अमरीक सुखदेव के बिलकुल साथ लगता और कुछ साल पहले बना गरम-धरम ढ़ाबा भी है, जोकि अपनी बनावट के कारण लोगों में काफी पॉपुलर भी हो रहा है। इस ढ़ाबे की पूरी थीम बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र की फिल्मों पर बेस्ड है। पूरे ढ़ाबे को धर्मेंद्र की फिल्मों के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। ढ़ाबे के बाहर मेन गेट पर आपको शोले फिल्म की मशहूर पानी की टंकी दिखाई देगी जिस पर चढ़कर धर्मेंद्र फिल्म की नायिका हेमा मालिनी को परपोज करता है। अंदर ढ़ाबे में आप ऑटो रिक्शा, ट्रक और धर्मेंद्र की फिल्मों के पोस्टरों के बीच में इस ढाबे पर बनने वाले फेमस फ्रूट परांठे का स्वाद भी ले सकते हैं। हम अमरीक सुखदेव के परांठे कई बार खा चुके थे इसलिए इस बार हमने गरम-धरम ढ़ाबे के परांठे खाने का निर्णय लिया। एंट्री गेट पर ही गार्ड ने हैंड सेनिटाइज करवाए। अंदर वातानुकूलित हॉल में एक अच्छा-सा कार्नर देखकर हमने आसन जमा लिया। भूख लगी थी इसलिए तुरंत चाय और मिक्स वेज परांठे आर्डर किये। तकरीबन 10 मिनट के इंतज़ार के बाद परांठे की थाली आ चुकी थी। कड़क चाय, दो-तीन तरह का अचार, हरी मिर्च और ताजे मक्खन की भरी कटोरी और गरमा-गर्म परांठे। बिना तले स्वादिष्ट परांठे अगले कुछ लम्हें सब कुछ भूल कर हमने सिर्फ परांठों पर ही फोकस किया। स्वादिष्ट और एकदम फ्रेश। पराठे खाते वक्त हमने देखा कि यहाँ के परांठों की फिलिंग में ज्यादा चीजें