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Golden Chariot: दक्षिण भारत घूमने वाली Luxury Train फिर लौटी

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दक्षिण भारत घूमने का मतलब सिर्फ मंदिरों और ऐतिहासिक जगहों को देखना नहीं है। यहां की यात्रा में महल हैं, पुराने मंदिर हैं, जंगल हैं, समुद्र का किनारा है और ऐसे शहर हैं जिनकी अपनी अलग पहचान है। अब अगर इन सभी जगहों को देखने का मौका किसी ऐसी ट्रेन में मिले, जिसमें सफर के साथ रहने, खाने और आराम करने की सुविधाएं भी हों, तो यात्रा और भी खास हो जाती है। यही अनुभव देने के लिए Golden Chariot एक बार फिर नए अंदाज में पटरी पर लौट आई है। भारतीय रेलवे की टूरिज्म शाखा यानी IRCTC ने दक्षिण भारत की इस मशहूर Luxury Train को नए और अपग्रेडेड रूप में फिर से पेश किया है। ट्रेन में पुराने शाही अंदाज को बरकरार रखते हुए आधुनिक सुविधाएं जोड़ी गई हैं। यानी इस Luxury Train में सफर करते हुए आपको बार-बार होटल बदलने, सामान पैक करने और फिर खोलने की परेशानी नहीं होगी। आपका कमरा, खाना और सफर एक ही जगह रहेगा और ट्रेन आपको दक्षिण भारत की अलग-अलग खूबसूरत जगहों तक लेकर जाएगी। नई Golden Chariot में रिफर्बिश्ड पैसेंजर केबिन, आलीशान फैब्रिक्स, स्मार्ट टीवी, वाई-फाई और अपग्रेडेड वॉशरूम जैसी सुविधाएं दी गई हैं। लेकिन Golden Chariot की खासियत सिर्फ इसकी सुविधाएं नहीं हैं। इसकी पूरी सजावट और डिजाइन दक्षिण भारत के इतिहास और वास्तुकला से जुड़ी हुई है। तो आखिर Golden Chariot इतनी खास क्यों है? इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसमें क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं, कौन-कौन से रूट हैं और इसके लिए कितना खर्च करना पड़ता है? आइए आसान भाषा में जानते हैं इस पूरी Luxury Train के बारे में। Golden Chariot की शुरुआत कैसे हुई? Golden Chariot की कहानी दक्षिण भारत की संस्कृति और इतिहास से काफी गहराई से जुड़ी है। इस ट्रेन की शुरुआत कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास निगम यानी KSTDC और भारतीय रेल मंत्रालय के बीच साल 2002 में हुए एक समझौते के तहत हुई थी। इसके बाद Golden Chariot का आधिकारिक उद्घाटन 23 जनवरी 2008 को बेंगलुरु के यशवंतपुर रेलवे स्टेशन पर भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने किया था। अपनी पहली यात्रा इस Luxury Train ने 10 मार्च 2008 को बेंगलुरु से गोवा के लिए शुरू की थी। नाम से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस ट्रेन का रिश्ता किसी साधारण ट्रेन से अलग है। Golden Chariot का नाम हम्पी के प्रसिद्ध यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल विट्ठल मंदिर के पत्थर के रथ यानी Stone Chariot से प्रेरित होकर रखा गया है। ट्रेन के लोगो में ‘याली’ नाम के एक पौराणिक जीव को दिखाया गया है। इसे रक्षक का प्रतीक माना जाता है। याली का शरीर सिंह जैसा और सूंड हाथी जैसी बताई गई है। Golden Chariot का रंग और डिजाइन भी खास है Golden Chariot को देखते ही इसका गहरा बैंगनी और सुनहरा रंग ध्यान खींचता है। बैंगनी रंग लालित्य और भव्यता को दिखाता है, जबकि सुनहरा रंग कर्नाटक राज्य की स्वर्ण जयंती का प्रतीक है। इस Luxury Train के 11 गेस्ट कोचों के नाम भी दक्षिण भारत के 11 महान राजवंशों के नाम पर रखे गए हैं। इनमें कदंब, होयसला, राष्ट्रकूट, गंगा, चालुक्य, बहमनी, आदिलशाही, संगमा, सातवाहन, यदुकुल और विजयनगर शामिल हैं। ट्रेन की सजावट को तैयार करने में भी दक्षिण भारत की ऐतिहासिक वास्तुकला को ध्यान में रखा गया था। वास्तुकार कुसुम पेंडसे और 200 कुशल बढ़इयों की टीम ने 12वीं शताब्दी की होयसला मंदिर वास्तुकला से प्रेरित होकर कोचों पर बारीक लकड़ी की नक्काशी तैयार की थी। यानी Golden Chariot में बैठने के बाद सिर्फ बाहर का नजारा ही नहीं, बल्कि ट्रेन के अंदर का माहौल भी दक्षिण भारत के इतिहास की झलक देता है। यही चीज इसे आम ट्रेन से अलग बनाकर एक खास Luxury Train का अनुभव देती है। नए अवतार में Golden Chariot में क्या बदला? नई Golden Chariot को पुराने शाही अंदाज के साथ आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। ट्रेन में कुल 11 इंटर-कनेक्टेड गेस्ट केबिन हैं और इनमें करीब 80 से 84 यात्रियों के रहने की व्यवस्था है। इन केबिनों में 13 डबल बेड, 30 ट्विन बेड और दिव्यांग पर्यटकों के लिए एक विशेष केबिन भी बनाया गया है। खास बात यह है कि इन केबिनों में सामान्य ट्रेनों की तरह बेड तिरछे नहीं रखे गए हैं। यहां ट्रेन की लंबाई के समानांतर फुल-साइज बेड दिए गए हैं। बेड पर हाथ से बुने हुए रेशमी बेडस्प्रेड हैं और दीवारों पर ऐतिहासिक पेंटिंग्स लगाई गई हैं। इससे केबिन का पूरा माहौल किसी होटल के कमरे जैसा लगता है। हर केबिन में स्मार्ट टीवी दिया गया है, जिसमें ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ऐप्स की सुविधा है। इसके अलावा हाई-स्पीड वाई-फाई, इलेक्ट्रॉनिक लॉकर और फोल्डेबल वैनिटी डेस्क भी उपलब्ध हैं। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी सर्विलांस और आधुनिक फायर अलार्म सिस्टम लगाए गए हैं। हर केबिन के साथ अटैच्ड वॉशरूम भी है। वॉशरूम में 24 घंटे गर्म और ठंडे पानी की सुविधा वाला शावर, फुल-लेंथ शीशा, बाथरोब, तौलिए और प्रीमियम प्रसाधन सामग्री दी जाती है। यानी Golden Chariot में रहने के दौरान यात्रियों को सामान्य ट्रेन वाली सुविधाओं की जगह काफी अलग अनुभव मिलता है। Golden Chariot में खाने का भी अलग इंतजाम किसी भी लंबी यात्रा में खाना एक जरूरी हिस्सा होता है और Golden Chariot में इस पर भी खास ध्यान दिया गया है। ट्रेन में दो अलग-अलग मल्टी-कुजीन रेस्टोरेंट हैं, जिनके नाम ‘नलपाक’ और ‘रुचि’ हैं। नलपाक का नाम महाभारत के महान राजा और रसोइये नल के नाम पर रखा गया है। इसके इंटीरियर में हेलेबिड के होयसला मंदिर की नक्काशी से प्रेरणा ली गई है। दूसरा रेस्टोरेंट ‘रुचि’ है। संस्कृत के ‘रुचि’ यानी उत्कृष्ट स्वाद शब्द से लिया गया यह नाम ट्रेन के खाने के अनुभव के साथ भी जुड़ता है। इसकी सजावट हम्पी के विट्ठल मंदिर की वास्तुकला से मिलती-जुलती है। इस Luxury Train में खाना सिर्फ एक तय मेन्यू तक सीमित नहीं है। ट्रेन के मास्टर शेफ सफर के दौरान ताजा सामग्री का इस्तेमाल करके रोज अलग-अलग मेन्यू तैयार करते हैं। मैसूर से मीट और गदग से ताजी सब्जियां और फल जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। यात्रियों को तीन-कोर्स भोजन परोसा जाता है। इसमें स्थानीय दक्षिण भारतीय जायकों के साथ-साथ महाद्वीपीय