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Lohagad Fort: 7 Amazing Facts जो आपको जरूर जानने चाहिए

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महाराष्ट्र की सह्याद्री पहाड़ियों के बीच एक ऐसा किला खड़ा है, जिसकी मजबूती और इतिहास आज भी लोगों को अपनी ओर खींचता है। यह किला है Lohagad Fort। पुणे और मुंबई के आसपास रहने वाले लोगों के लिए Lohagad Fort आज एक लोकप्रिय ट्रेकिंग डेस्टिनेशन है। लेकिन यह जगह सिर्फ घूमने या ट्रेकिंग करने के लिए खास नहीं है। इस किले की हर दीवार के पीछे मराठा साम्राज्य, पुराने राजवंशों और कई ऐतिहासिक घटनाओं की कहानी छिपी हुई है। किले का नाम ही इसकी पहचान के बारे में बहुत कुछ बताता है। ‘लोह’ का मतलब होता है लोहा और ‘गढ़’ का मतलब होता है किला। यानी Lohagad Fort का सीधा अर्थ हुआ—लोहे जैसा मजबूत किला। हालांकि यह किला लोहे से नहीं बना है, लेकिन इसकी प्राकृतिक स्थिति, मजबूत पत्थर की दीवारें और शानदार सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि दुश्मनों के लिए इसे जीतना बेहद मुश्किल माना जाता था। इसी वजह से इसे अंग्रेजी में Iron Fort भी कहा जाता है। आज Lohagad Fort Maharashtra के सबसे लोकप्रिय ऐतिहासिक और ट्रेकिंग स्थलों में शामिल है। लोहगढ़ को Iron Fort क्यों कहा जाता है? Lohagad Fort समुद्र तल से लगभग 3,400 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह किला एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है और इसके चारों तरफ सह्याद्री की ऊंची-नीची पहाड़ियां दिखाई देती हैं। पुराने समय में किसी भी किले की सुरक्षा सिर्फ उसकी दीवारों से नहीं होती थी। किले की भौगोलिक स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती थी। लोहगढ़ के साथ भी यही बात थी। किले तक पहुंचने के रास्ते सीमित थे और पहाड़ी की ऊंचाई के कारण किसी भी सेना के लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। किले की मजबूत संरचनाएं और पत्थरों से बनी दीवारें इसे और भी सुरक्षित बनाती थीं। इसी वजह से Lohagad Fort को एक ऐसा किला माना जाता था जिसे जीतना आसान नहीं था। किले का नाम ‘लोहगढ़’ भी इसकी इसी मजबूती की ओर इशारा करता है। आज जब पर्यटक Lohagad Fort Trek के दौरान इसकी सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, तो उन्हें अंदाजा होता है कि पुराने समय में सैनिकों और दुश्मन सेनाओं के लिए यहां तक पहुंचना कितना कठिन रहा होगा। लोहगढ़ किले का इतिहास 2,000 साल से भी ज्यादा पुराना है Lohagad Fort History बेहद लंबी और दिलचस्प है। इतिहासकारों के अनुसार, इस किले का इतिहास लगभग 2,000 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है। समय के साथ इस किले पर अलग-अलग राजवंशों का नियंत्रण रहा। सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट और यादव जैसे कई राजवंशों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा था। इसके बाद यह किला बहमनी सल्तनत और निजामशाही के अधीन भी रहा। बाद में मुगलों ने भी इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। हर शासक के लिए Lohagad Fort महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह किला दक्कन के पठार और कोंकण क्षेत्र के बीच आने-जाने वाले रास्तों पर नजर रखने के लिए बेहद रणनीतिक जगह पर बना हुआ था। उस समय व्यापार और सेना की आवाजाही के लिए पहाड़ी रास्ते बेहद महत्वपूर्ण होते थे। ऐसे में जो शासक इन किलों पर नियंत्रण रखता था, वह आसपास के बड़े क्षेत्र पर नजर रख सकता था। यही वजह है कि Lohagad Fort Maharashtra के इतिहास में हमेशा एक महत्वपूर्ण स्थान रखता आया है। छत्रपति शिवाजी महाराज और लोहगढ़ का गौरवशाली इतिहास Lohagad Fort के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मराठा साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1648 में इस किले पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था। शिवाजी महाराज के लिए किले सिर्फ रहने की जगह नहीं थे। वे इन किलों का इस्तेमाल दुश्मनों पर नजर रखने, व्यापारिक रास्तों को नियंत्रित करने और महत्वपूर्ण सामान को सुरक्षित रखने के लिए करते थे। लोहगढ़ भी इसी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। हालांकि 1665 में हुई पुरंदर की संधि के बाद शिवाजी महाराज को कई किले मुगलों को सौंपने पड़े। इनमें Lohagad Fort भी शामिल था। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद, 1670 में शिवाजी महाराज ने फिर से इस किले पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह घटना मराठा इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बाद लोहगढ़ मराठा साम्राज्य के लिए एक बार फिर महत्वपूर्ण किला बन गया। कहा जाता है कि किले की मजबूत स्थिति और आसपास के रास्तों पर नजर रखने की क्षमता के कारण इसका इस्तेमाल महत्वपूर्ण सामान और खजाने को सुरक्षित रखने के लिए भी किया जाता था। किले के चार दरवाजे आज भी बताते हैं इसकी मजबूती की कहानी Lohagad Fort की वास्तुकला इसकी सबसे खास विशेषताओं में से एक है। किले में प्रवेश करने के लिए चार प्रमुख दरवाजे बनाए गए थे। इनमें गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा शामिल हैं। पुराने समय में किले के दरवाजे सिर्फ प्रवेश और बाहर निकलने के लिए नहीं बनाए जाते थे। इनका इस्तेमाल सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी किया जाता था। कई दरवाजे इस तरह बनाए जाते थे कि दुश्मन सीधे किले के अंदर प्रवेश न कर सके। Lohagad Fort के दरवाजों में भी ऐसी ही सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिलती है। पत्थरों से बनी दीवारें और मजबूत दरवाजे उस समय की इंजीनियरिंग की समझ को दिखाते हैं। आज जब पर्यटक इन दरवाजों से होकर किले के अंदर प्रवेश करते हैं, तो उन्हें पुराने समय की वास्तुकला को करीब से देखने का मौका मिलता है। विंचू काटा: लोहगढ़ की सबसे खास जगह Lohagad Fort की सबसे प्रसिद्ध संरचनाओं में से एक है विंचू काटा। नाम सुनकर ही आप समझ सकते हैं कि इसका आकार किसी खास चीज से जुड़ा हुआ है। विंचू काटा का आकार दूर से देखने पर बिच्छू की पूंछ जैसा दिखाई देता है। इसी वजह से इसे विंचू काटा कहा जाता है। यह किले का एक लंबा और संकरा हिस्सा है, जो मुख्य पहाड़ी से आगे की ओर निकला हुआ है। पुराने समय में ऐसी जगहों का इस्तेमाल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता था। किले की ऊंचाई से आसपास का बहुत बड़ा क्षेत्र दिखाई देता है। आज Lohagad Fort Trek पर आने वाले पर्यटक विंचू काटा को देखने के लिए खास तौर पर जाते हैं। मानसून के दौरान जब चारों तरफ की पहाड़ियां हरी हो जाती हैं और बादल किले के