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Kumati Bakhli Travel Guide: एक ही घर में रहते थे 40 परिवार

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जब भी पहाड़ों की खूबसूरती की बात होती है, तो हमारे दिमाग में ऊंचे पहाड़, हरे-भरे जंगल, बादलों से घिरी चोटियां और शांत रास्ते आते हैं। लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों की असली पहचान केवल प्राकृतिक नजारों तक सीमित नहीं है। यहां के पुराने गांव, पत्थरों से बने घर, लकड़ी के दरवाजे और सदियों पुरानी रहने की परंपराएं भी इस क्षेत्र को खास बनाती हैं। नैनीताल के रामगढ़ इलाके में मौजूद कुमाटी गांव भी ऐसी ही एक कहानी अपने अंदर समेटे हुए है। इस गांव में एक पुरानी Bakhli मौजूद है, जिसकी लंबाई करीब 100 मीटर बताई जाती है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कभी इस लंबी और जुड़ी हुई संरचना में लगभग 35 से 40 परिवार एक साथ रहते थे। आज के समय में जहां एक परिवार भी अपने घर में अलग-अलग कमरे और निजी जगह को जरूरी मानता है, वहीं यह सोचकर ही हैरानी होती है कि कभी इतने सारे परिवार एक ही जुड़ी हुई संरचना का हिस्सा हुआ करते थे। हालांकि यह केवल कई लोगों के एक साथ रहने की कहानी नहीं है। इस Bakhli के पीछे पहाड़ों की जमीन, मौसम, खेती, सुरक्षा और सामाजिक जीवन को ध्यान में रखकर बनाई गई एक पूरी व्यवस्था थी। कुमाटी की Bakhli क्यों खास है? रामगढ़ ब्लॉक अपनी हरियाली और फलों के बागानों के लिए जाना जाता है। इसी इलाके में कुमाटी नाम का एक छोटा गांव है, जहां यह अनोखी Bakhli मौजूद है। Bakhli को आसान भाषा में समझें तो यह एक ही कतार में जुड़े हुए कई घरों की श्रृंखला होती है। हर परिवार का अपना रहने का हिस्सा होता था, लेकिन घरों की दीवारें और छत एक-दूसरे से जुड़ी होती थीं। कुमाटी की यह Bakhli करीब 100 मीटर लंबी बताई जाती है। कभी इसमें 35 से 40 परिवार रहते थे। यानी एक ही लंबी इमारत में कई परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी चलती थी। किसी हिस्से में खाना बनता होगा, कहीं बच्चे खेलते होंगे, किसी जगह पशुओं की देखभाल होती होगी और घरों के सामने बने आंगन में खेती से जुड़े काम किए जाते होंगे। आज ऐसी संरचना देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुराने समय में पहाड़ों में लोग किस तरह एक-दूसरे के करीब रहकर अपना जीवन बिताते थे। ऐसे जुड़े हुए घर क्यों बनाए जाते थे? अब सवाल यह उठता है कि जब हर परिवार अपना अलग घर बना सकता था, तो इतनी लंबी Bakhli बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पहाड़ों की जमीन थी। पहाड़ी इलाकों में समतल जमीन बहुत कम होती है। खेती के लिए थोड़ी सी भी समतल जमीन बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती थी। अगर हर परिवार अलग घर बनाने के लिए अधिक जमीन इस्तेमाल करता, तो खेती के लिए जगह कम बचती। इसलिए एक ही संकरी पट्टी या पहाड़ की ढलान के अनुसार लंबे और जुड़े हुए घर बनाए जाते थे। इससे कम जमीन में कई परिवारों के रहने की व्यवस्था हो जाती थी और बाकी जमीन खेती के लिए बचाई जा सकती थी। इस तरह Bakhli केवल घर बनाने का एक तरीका नहीं थी। इसके पीछे उस समय की जरूरत और पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति को समझने वाली सोच थी। ठंड से बचने में भी मदद करती थी पहाड़ों में सर्दियों का मौसम काफी ठंडा होता है। पुराने समय में आज की तरह हीटर या घर को गर्म रखने वाली आधुनिक सुविधाएं हर परिवार के पास नहीं होती थीं। ऐसे में जुड़े हुए घरों का एक फायदा यह भी था कि साझा दीवारों के कारण अंदर की गर्मी अधिक समय तक बनी रह सकती थी। पत्थर से बने घर जल्दी ठंडे हो सकते हैं, लेकिन जब कई घर एक-दूसरे से जुड़े हों, तो तापमान बनाए रखना अपेक्षाकृत आसान होता है। इस तरह Bakhli की बनावट में रहने वाले लोगों की जरूरत और पहाड़ के मौसम, दोनों का ध्यान रखा गया था। यह बात दिखाती है कि पुराने समय के लोग अपने आसपास के वातावरण को समझकर घरों की योजना बनाते थे। सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण पुराने समय में पहाड़ों के आसपास जंगल होते थे और जंगली जानवरों का खतरा भी रहता था। इसके अलावा किसी भी परेशानी के समय एक-दूसरे का साथ होना जरूरी होता था। जुड़े हुए घरों में रहने से लोग एक-दूसरे के करीब रहते थे। अगर किसी परिवार को मदद की जरूरत पड़ती, तो आसपास रहने वाले लोग तुरंत पहुंच सकते थे। इस लिहाज से Bakhli एक तरह की सामूहिक जीवन व्यवस्था भी थी। हर परिवार की अपनी जगह थी, लेकिन सभी परिवार एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं थे।यही बात इसे आज की अलग-अलग घरों वाली व्यवस्था से काफी अलग बनाती है। पारंपरिक पहाड़ी घरों की बनावट पुराने कुमाऊंनी घरों को समझने के लिए उनकी बनावट पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसे पारंपरिक घर आमतौर पर दो मंजिला होते थे। घर के निचले हिस्से को गोठ कहा जाता था। यहां मवेशियों और चारे को रखा जाता था। यह व्यवस्था केवल सुविधा के लिए नहीं थी। नीचे रहने वाले पशुओं के शरीर से निकलने वाली गर्मी ऊपर के रहने वाले हिस्से तक पहुंचती थी। इससे घर के कमरों को गर्म रखने में मदद मिलती थी। इस तरह एक ही व्यवस्था से पशुओं के लिए जगह भी मिल जाती थी और घर को गर्म रखने में भी सहायता होती थी। पुराने पहाड़ी घरों की ऐसी कई छोटी-छोटी विशेषताएं थीं, जिनके पीछे व्यावहारिक सोच दिखाई देती है। ऊपर रहती थी परिवार की जगह घर की ऊपरी मंजिल पर परिवार के रहने के कमरे और रसोई होती थी। रहने वाले हिस्से को कमरा और रसोई से जुड़े हिस्से को भानार कहा जाता था। घर के मुख्य प्रवेश द्वार को खोली कहा जाता था। इसे अक्सर लकड़ी की नक्काशी से सजाया जाता था। घर के सामने पत्थरों से बना एक बड़ा आंगन भी होता था, जिसे पाटा-आंगन कहा जाता था। यह आंगन केवल बैठने की जगह नहीं था। यहां अनाज सुखाने से लेकर परिवार और गांव के सामाजिक कार्यक्रमों तक कई काम किए जाते थे। शादियों जैसे बड़े आयोजन भी ऐसे आंगनों में किए जाते थे। इससे पता चलता है कि पुराने पहाड़ी