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Jim Corbett National Park – The First Tiger Reserve of India

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Jim Corbett National Park Ramnagar- जंगल सफारी और प्रकृति प्रेमियों के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन by Pardeep Kumar वन्य जीव प्रेमियों के लिए स्वर्ग समझा जाने वाला और देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड के रामनगर में स्थित है। जहाँ दिल्ली से आप आराम से पांच से छह घंटे का सफर तय करके पहुंच सकते हैं। थोड़ा अतिरिक्त  समय लगता भी है तो सिर्फ मुरादाबाद से काशीपुर तक जहाँ सड़क थोड़ी जर्जर हालत में है। इसके अलावा पूरा रास्ता दिल्ली-लखनऊ हाईवे-24 ही है। हम सुबह तकरीबन 5 बजे दिल्ली से निकले थे और ग्यारह-साढ़े ग्यारह तक रामनगर पहुंच गए थे। रास्ते में गढ़ मुक्तेश्वर से थोड़ा आगे निकल कर आपको कुछ बेहतरीन ढाबे और मेक्डोनाल्ड, बर्गर किंग, बीकानेरवाला, केएफसी और स्टारबक्स आदि  मिल जायेंगे जहाँ रूक कर आप ब्रेकफास्ट लंच या चाय वगैरह ले सकते हैं। Jim Corbett National Park होटल और रिज़ॉर्ट ठहरने के लिए आपको रामनगर में बहुत-सी जगह मिल जाएँगी। कॉर्बेट पार्क के आसपास बहुत सारे होटल और रिज़ॉर्ट बजट के अनुसार पर्यटकों के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन मैं राय दूंगा अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और दो-तीन दिन दुनिया के शोर शराबे से दूर बेहद इत्मीनान से बिताना चाहते हैं तो आप कोई अच्छा-सा रिवर व्यू रिज़ॉर्ट पहले से बुक कर लें। जहाँ आप बहुत सारे एडवेंचर्स के बाद भी कम्फर्ट महसूस करेंगे।  इसके अलावा जंगल में भी रात्रि ठहराव के लिए रेस्ट हाउस बनाये गए हैं जिनकी ऑनलाइन बुकिंग आपको काफी पहले से करनी पड़ती है। इसके लिए और अधिक जानकारी के लिए आप उत्तराखंड टूरिज्म की वेबसाइट पर सर्च कर सकते हैं। नेशनल पार्क का इतिहास और नामकरण आपकी जानकारी के लिए बता दूं 1936 में ब्रिटिश शासन के दौरान संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैल्कम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। देश के आज़ाद होने के बाद इस पार्क का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया। सके बाद 1957 में एक बार फिर इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया था। जिम कॉर्बेट एक प्रसिद्ध ब्रिटिश शिकारी, प्रकृतिवादी और फोटोग्राफर था। बताते हैं जिम कॉर्बेट ने उस बाघ का शिकार किया था जिसने कथित तौर पर बेहरमी से 400 लोगों की जान ले ली थी। साल 1907 से 1929 के वर्षों के दौरान कार्बेट ने अनेक नरभक्षियों को मारा जिनसे स्थानीय निवासी बेहद ख़ौफ़ज़दा थे। कार्बेट भारत से बहुत प्यार करते थे और उन्होंने इस पर काफी किताबें भी लिखी। कार्बेट ने यहीं पर रहकर मानवाधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाई और संरक्षित जीवों के लिए आंदोलन आरम्भ किया। कार्बेट ने अपने करियर के आखिरी दौर में नैनीताल जिले के कालाढूंगी में रहना शुरू किया, यहाँ छोटी हल्द्वानी गांव से उन्हें वन्य जीवों की समझ हुई जिसे अब पर्यटन गांव के रूप में बनाया गया है। यहाँ कार्बेट की छवि ब्रिटिश शोषकों की बजाय स्थानीय निवासियों के हितैषी, मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत और प्रकृतिविद के रुप में स्थापित है। बताते हैं जब वो देश छोड़ कर गए तब उन्होंने अपनी सैंकड़ों एकड़ जमीन छोटे हल्द्वानी के ग्रामीणों को दान स्वरुप दे दी थी। प्रकृति प्रेमियों के लिए जन्नत दरअसल यह कॉर्बेट पार्क उन सभी लोगों के लिए जन्नत है जो प्रकृति की गोद में थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं। इस पार्क में बंगाल टाइगर, तेंदुए, हाथी, जंगली सुअर, बारहसिंगा, हिरण और मगरमच्छ जैसे अनेक जानवर हैं। हमनें एक सप्ताह पहले ही थोड़ा रिसर्च करके एक अच्छा-सा रिज़ॉर्ट बुक कर लिया था, इसलिए रिज़ॉर्ट पहुँचते ही सबसे पहले तरो ताज़ा हुए, चाय पी, उसके बाद थोड़ा आराम किया। मुख्य सेंटर पॉइंट- जंगल सफारी क्योंकि जंगल सफारी के लिए जीप पहले से ही बुक थी और उसे दो बजे के करीब रिज़ॉर्ट से हमें पिक करना था इसलिए हमनें डेढ़ बजे के करीब लंच कर लिया था और हम तैयार थे जंगल सफारी के लिए। मेरे लिए यह जंगल सफारी का पहला अवसर था इसलिए रोमांच का चर्म पर होना स्वाभाविक था। तय समय पर हमें जिप्सी के ड्राइवर वसीम ने रिज़ॉर्ट से पिक किया और हम बढ़ चले ढेला जोन की तरफ जो हमारे रिज़ॉर्ट से लगभग 16 किलोमीटर दूर था। एक बात का ध्यान रहे कि जिम कॉर्बेट में सिर्फ जिप्सी सफारी ही वो मुख्य सेंटर पॉइंट है जो आपकी पूरी यात्रा को हमेशा के लिए यादगार बना सकता है। इसलिए अगर कॉर्बेट पार्क जा रहे हैं तो जिप्सी सफारी भूल कर भी मिस न करें। वैसे इन दिनों एक जिप्सी का किराया 4200 रुपए है जिसमें से  700 रुपए गाइड के होते हैं। हर जिप्सी में प्रशासन के आदेशानुसार एक गाइड का होना जरूरी है। आप ये जिप्सी सफारी ऑनलाइन बुक करवा सकते हैं या फिर आप जो भी होटल या रिज़ॉर्ट बुक करें वो भी आपके लिए जिप्सी सफारी बुक कर देंगे। हाँ, किराया जरूर थोड़ा ऊपर नीचे हो सकता है। बस ध्यान रखिये कि मध्य जून से सितम्बर  के बीच कॉर्बेट भ्रमण की योजना न बनायें तो बेहतर होगा, क्योंकि बरसात में  पर्यटकों के लिए यह बन्द रहता है। यह कॉर्बेट पार्क जंगल सफारी के लिए एक दिन में दो बार खुलता है। सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजे तक और दोपहर में 2.30 से लेकर 5.30 बजे तक। हालाँकि मौसम के अनुसार समय में बदलाव होता रहता है। यह नेशनल पार्क जंगल सफारी के लिए पांच जोन में बांटा गया है – ढिकाला, झिरना, ढेला, बिजरानी और दुर्गा देवी। अभी कोरोना गाइड लाइन के कारण ढेला और झिरना ज़ोन ही खुले थे। बाकि 15 नवंबर के आसपास खुलते हैं ऐसा हमें हमारे जंगल सफारी के गाइड महेंद्र प्रताप ने बताया। लेकिन फिर भी सुंदरता में आपको हर ज़ोन में लैंडस्केप और वाइल्ड लाइफ के अद्भुत दृश्य दिखाई देंगे। तकरीबन ढाई बजे के करीब हमने गेट पर सभी औपचारिकता पूरी करके ढेला ज़ोन में एंट्री की। मैं पहली बार किसी जंगल सफारी का अनुभव कर रहा था इसलिए रोमांच सातवें आसमान पर था साथ ही एक अजनबी सा डर भी। प्राकृतिक ख़ूबसूरती यहाँ एक बात और आपसे शेयर करना जरूरी है वो ये कि जब भी आप कॉर्बेट पार्क  घूमने की योजना बनायें तो टाइगर देखने की लालसा या इच्छा