भारत की वो Saree, जिन्हें बनाने में लगते हैं महीनों
साड़ी को सिर्फ एक कपड़ा कहना इसके साथ नाइंसाफी होगी। भारत में साड़ी पहनने का तरीका, उसका कपड़ा, रंग, डिजाइन और बुनाई हर जगह अलग दिखाई देती है। कहीं साड़ी पर महीन जरी का काम होता है, कहीं कपड़े को धागों से बांधकर रंग दिया जाता है और कहीं पूरा डिजाइन हाथ से करघे पर बुना जाता है। यही वजह है कि भारत की Saree सिर्फ पहनावे का हिस्सा नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों और समुदायों की पहचान भी बन चुकी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बनने वाली हर साड़ी की अपनी एक कहानी है। वाराणसी की बनारसी साड़ी शादियों में खास पहचान रखती है। कांचीपुरम की सिल्क साड़ी दक्षिण भारत की पारंपरिक पहचान से जुड़ी है। गुजरात की पटोला अपनी जटिल बुनाई के लिए जानी जाती है और ओडिशा की संबलपुरी इकत तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। खास बात यह है कि इनमें से कई Saree आज भी मशीन से नहीं, बल्कि हाथ से करघे पर तैयार की जाती हैं। एक साड़ी को पूरा करने में कई दिन, कई हफ्ते और कुछ मामलों में कई महीने तक लग जाते हैं। इसलिए जब कोई व्यक्ति हाथ से बनी साड़ी खरीदता है, तो वह केवल कपड़ा नहीं खरीदता, बल्कि एक कारीगर की मेहनत और पीढ़ियों पुरानी परंपरा को भी अपने घर लेकर जाता है। बनारसी साड़ी: शादी से लेकर पीढ़ियों तक चलने वाली पहचान उत्तर प्रदेश के वाराणसी की बनारसी साड़ी भारत की सबसे मशहूर साड़ियों में गिनी जाती है। इसकी पहचान बारीक रेशमी बुनाई और जरी के खूबसूरत काम से होती है। बनारसी साड़ी पर फूल, बेल, बूटी और जाल जैसे डिजाइन बनाए जाते हैं। इनमें से कई डिजाइन मुगल दौर की कला से प्रभावित माने जाते हैं। बनारसी साड़ी तैयार करना आसान काम नहीं है। डिजाइन जितना ज्यादा बारीक और भारी होगा, इसे बनाने में उतना ही ज्यादा समय लगेगा। एक साड़ी को तैयार करने में 15 दिन से लेकर कई महीने तक लग सकते हैं। वाराणसी के बुनकर परिवारों में यह काम पीढ़ियों से चलता आया है। एक ही परिवार में कोई धागा तैयार करता है, कोई डिजाइन बनाता है और कोई करघे पर बुनाई करता है। इसी मेहनत के बाद एक पूरी Saree तैयार होती है। शादियों में बनारसी साड़ी की खास मांग रहती है। दुल्हन के अलावा परिवार की दूसरी महिलाएं भी शादी और बड़े समारोहों में इसे पहनना पसंद करती हैं। इसकी खासियत यह है कि पुरानी बनारसी साड़ी भी कई साल बाद दोबारा पहनी जा सकती है। सही रख-रखाव के साथ यह लंबे समय तक अच्छी स्थिति में बनी रहती है। लखनऊ की चिकनकारी साड़ी: हल्की और बेहद महीन लखनऊ की चिकनकारी सिर्फ कुर्तों तक सीमित नहीं है। चिकनकारी का काम साड़ियों पर भी किया जाता है। इस कढ़ाई में कपड़े के ऊपर हाथ से बहुत बारीक डिजाइन बनाए जाते हैं। आमतौर पर हल्के सूती या मलमल जैसे कपड़ों पर यह काम ज्यादा पसंद किया जाता है। फूल, पत्तियां और छोटे-छोटे पैटर्न चिकनकारी साड़ी की पहचान हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका हल्का और आरामदायक होना है। गर्मी के मौसम में चिकनकारी Saree पहनना काफी आसान रहता है। ऑफिस, छोटे पारिवारिक कार्यक्रम या दिन के किसी समारोह के लिए यह साड़ी अच्छी पसंद हो सकती है। इसकी कढ़ाई हाथ से होने के कारण हर साड़ी में थोड़ी-बहुत अलग बारीकी दिखाई दे सकती है। यही हाथ का काम इसे मशीन से बनी साड़ी से अलग बनाता है। भागलपुरी सिल्क: बिहार की रेशमी पहचान बिहार के भागलपुर को सिल्क बुनाई के लिए लंबे समय से जाना जाता है। यहां बनने वाली भागलपुरी सिल्क साड़ी अपनी प्राकृतिक चमक और मजबूत कपड़े के लिए पसंद की जाती है। भागलपुरी सिल्क को कई जगह तसर सिल्क से भी जोड़ा जाता है। इसके कपड़े में एक अलग तरह की प्राकृतिक बनावट दिखाई देती है। बहुत ज्यादा चमकदार होने के बजाय इसमें हल्की और सधी हुई चमक होती है। यही सादगी इसे खूबसूरत बनाती है। भागलपुरी Saree को पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरीकों से पहना जा सकता है। हल्के रंगों वाली साड़ी रोजमर्रा या छोटे कार्यक्रमों के लिए अच्छी रहती है, जबकि गहरे रंग और ज्यादा काम वाली साड़ियां समारोहों में पहनी जाती हैं। भागलपुर के बुनकरों के लिए यह सिर्फ कपड़ा बनाने का काम नहीं है। कई परिवारों की रोजी-रोटी इसी बुनाई से जुड़ी हुई है। कश्मीर की पश्मीना साड़ी: ठंड में पहनने का अलग अंदाज कश्मीर की पश्मीना अपनी मुलायम बनावट और गर्माहट के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। पश्मीना से बने कपड़ों पर हाथ की कढ़ाई का काम भी किया जाता है, जिससे उनका रूप और खास हो जाता है। पश्मीना साड़ी सामान्य सूती या हल्की रेशमी साड़ी से अलग होती है। इसका कपड़ा ठंडे मौसम के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है। कई साड़ियों पर कश्मीरी कढ़ाई के छोटे और बारीक डिजाइन बनाए जाते हैं। हाथ से की गई कढ़ाई के कारण एक अच्छी पश्मीना Saree तैयार करने में काफी समय लग सकता है। यही वजह है कि असली और अच्छी गुणवत्ता वाली पश्मीना की कीमत भी अधिक होती है। पश्मीना खरीदते समय कपड़े की गुणवत्ता और उसकी प्रमाणिकता जरूर जांचनी चाहिए। कांजीवरम: दक्षिण भारत की सबसे पहचान वाली सिल्क साड़ी तमिलनाडु के कांचीपुरम की कांजीवरम साड़ी दक्षिण भारत की सबसे प्रसिद्ध साड़ियों में से एक है। इसे आमतौर पर शुद्ध रेशम से बनाया जाता है। इसकी पहचान भारी बॉर्डर, मजबूत बुनाई और चमकदार रंगों से होती है। कांजीवरम साड़ी के बॉर्डर पर मंदिरों से प्रेरित डिजाइन, मोर, तोता, कमल और दूसरे पारंपरिक मोटिफ देखने को मिलते हैं। इसके पल्लू में भी काफी बारीकी से काम किया जाता है। इस Saree की एक खास तकनीकी विशेषता इसका बॉर्डर और पल्लू है। कई पारंपरिक कांजीवरम साड़ियों में बॉर्डर और पल्लू को अलग तरह से बुना जाता है और फिर मुख्य कपड़े से जोड़ा जाता है। इससे साड़ी मजबूत बनती है और उसका बॉर्डर लंबे समय तक अपनी जगह पर बना रहता है। दक्षिण भारत में कांजीवरम साड़ी को शादी और धार्मिक अवसरों पर खास महत्व दिया जाता है। दुल्हन के लिए इसे आज भी सबसे पसंदीदा पारंपरिक कपड़ों में गिना जाता है। मैसूर सिल्क: हल्की चमक और आरामदायक कपड़ा कर्नाटक की मैसूर सिल्क साड़ी कांजीवरम