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Humayun’s Tomb-कब जाएं और क्या देखें: Delhi’s Mini Taj Mahal

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दिल्ली को सिर्फ देश की राजधानी कहना शायद कम होगा, क्योंकि यह शहर अपने अंदर कई सदियों की कहानियाँ छुपाए हुए है। यहाँ ऐसी कई जगहें मौजूद हैं जहाँ पहुँचते ही लगता है जैसे इतिहास आज भी जिंदा हो। उन्हीं खास जगहों में से एक है Humayun’s Tomb। दिल्ली के बीचों-बीच मौजूद यह ऐतिहासिक मकबरा सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि मुगल काल की शान, कला और वास्तुकला का शानदार उदाहरण माना जाता है। हर साल हजारों लोग यहाँ घूमने आते हैं। कोई इतिहास जानने आता है, कोई तस्वीरें लेने आता है और कई लोग यहाँ सिर्फ कुछ समय शांति से बिताने के लिए आते हैं। पहली बार जब कोई इस मकबरे को देखता है, तो उसके मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि आखिर इसे “Mini Taj Mahal” क्यों कहा जाता है। जब आप इस इमारत को ध्यान से देखते हैं, तब इसकी खूबसूरती और डिजाइन कहीं न कहीं ताजमहल की याद दिलाती है। सफेद संगमरमर, विशाल गुंबद, चारों तरफ बने बगीचे और पानी के रास्ते इसे बेहद खास बनाते हैं। Humayun’s Tomb का इतिहास: मुगल बादशाह की याद में बना यह खूबसूरत मकबरा Humayun’s Tomb का निर्माण 16वीं शताब्दी में करवाया गया था। यह मकबरा मुगल बादशाह हुमायूं की याद में उनकी पत्नी हमीदा बानो बेगम ने बनवाया था। कहा जाता है कि उस समय इस मकबरे को बनाने में कई साल लगे और इसे बनाने के लिए फारसी और भारतीय वास्तुकला का मिश्रण इस्तेमाल किया गया। इतिहासकारों के अनुसार यह भारत का पहला बड़ा गार्डन टॉम्ब माना जाता है। इसका मतलब यह है कि मकबरे के चारों तरफ बड़े-बड़े बगीचे और पानी के रास्ते बनाए गए थे। बाद में यही शैली ताजमहल में भी देखने को मिली। इसी कारण कई लोग Humayun’s Tomb को ताजमहल की प्रेरणा भी मानते हैं। जब आप इस इमारत को करीब से देखते हैं, तो महसूस होता है कि उस दौर में वास्तुकला कितनी शानदार रही होगी। लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का मेल इसे और भी खूबसूरत बनाता है। पत्थरों पर बनी नक्काशी और पुराने मेहराब उस समय की बेहतरीन कारीगरी को दिखाते हैं। यह मकबरा सिर्फ एक कब्र नहीं, बल्कि मुगल साम्राज्य की कला और उस दौर की सोच का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि आज भी यह जगह इतिहास प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय है। आखिर Humayun’s Tomb को Mini Taj Mahal क्यों कहा जाता है? बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर Humayun’s Tomb को “Mini Taj Mahal” क्यों कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी वास्तुकला और डिजाइन है। जब आप इस मकबरे को देखते हैं, तो इसकी बनावट काफी हद तक ताजमहल जैसी महसूस होती है। सफेद संगमरमर का इस्तेमाल, ऊँचा गुंबद, चारों तरफ बने बगीचे और पानी के रास्ते इसे बेहद खूबसूरत बनाते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि ताजमहल की डिजाइन बनाने से पहले इसी मकबरे की शैली को आधार माना गया था। इसलिए कई लोग इसे ताजमहल का शुरुआती रूप भी कहते हैं। हालांकि Humayun’s Tomb और ताजमहल दोनों की अपनी अलग पहचान है, लेकिन दोनों की वास्तुकला में काफी समानता दिखाई देती है। यही कारण है कि यह जगह लोगों के बीच Mini Taj Mahal के नाम से मशहूर हो गई। यहाँ पहुँचते ही सबसे पहले क्या महसूस होता है दिल्ली की भीड़-भाड़ और ट्रैफिक से निकलकर जब आप Humayun’s Tomb के अंदर प्रवेश करते हैं, तो सबसे पहले यहाँ की शांति महसूस होती है। बाहर की भागदौड़ से बिल्कुल अलग यह जगह काफी शांत और सुकून भरी लगती है। चारों तरफ फैली हरियाली, लंबे रास्ते और पुराने पेड़ों की छांव पूरे माहौल को खास बना देती है। लोग यहाँ जल्दीबाजी में नहीं घूमते, बल्कि आराम से बैठकर इस जगह को महसूस करते हैं। सुबह और शाम के समय यहाँ का वातावरण और भी ज्यादा खूबसूरत हो जाता है। हल्की हवा और सूरज की बदलती रोशनी पूरे मकबरे को एक अलग ही रूप दे देती है। यही वजह है कि कई लोग यहाँ सिर्फ घूमने नहीं, बल्कि कुछ समय खुद के साथ बिताने भी आते हैं। Humayun’s Tomb के अंदर क्या-क्या देखें? कई लोगों को लगता है कि यहाँ सिर्फ एक मकबरा देखने को मिलता है, लेकिन असल में पूरा परिसर इतिहास और वास्तुकला से भरा हुआ है। अंदर जाते ही विशाल बगीचे और लंबे रास्ते दिखाई देते हैं। बीच में बना मुख्य मकबरा सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। इसकी ऊँचाई और डिजाइन दूर से ही लोगों को आकर्षित करती है। इसके अलावा यहाँ कई छोटी ऐतिहासिक इमारतें और कब्रें भी मौजूद हैं। पत्थरों पर बनी नक्काशी और पुराने मेहराब उस दौर की शानदार कारीगरी को दिखाते हैं। जब आप धीरे-धीरे पूरे परिसर में घूमते हैं, तो महसूस होता है कि यह जगह सिर्फ घूमने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को करीब से महसूस करने के लिए भी बहुत खास है। पूरा परिसर घूमने में आराम से 2 से 3 घंटे लग सकते हैं। अगर आप फोटोग्राफी पसंद करते हैं, तो यहाँ और भी ज्यादा समय बिताना चाहेंगे। सुबह या शाम? कब जाना सबसे अच्छा रहता है अगर आप Humayun’s Tomb घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो सही समय चुनना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे आपका पूरा अनुभव बदल सकता है। गर्मियों में दोपहर के समय यहाँ काफी तेज धूप और गर्मी महसूस होती है, इसलिए उस समय घूमना थोड़ा थकाने वाला लग सकता है। सुबह का समय यहाँ आने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि उस समय मौसम ठंडा और शांत रहता है। कम भीड़ होने की वजह से आप आराम से पूरे परिसर को देख सकते हैं और हर हिस्से को अच्छे से महसूस कर सकते हैं। वहीं शाम के समय भी यहाँ का माहौल काफी खूबसूरत हो जाता है। सूरज की हल्की सुनहरी रोशनी जब लाल पत्थरों और सफेद गुंबद पर पड़ती है, तब पूरा दृश्य बहुत आकर्षक दिखाई देता है। यही वजह है कि ज्यादातर लोग तस्वीरें लेने और आराम से समय बिताने के लिए शाम का समय पसंद करते हैं। अगर आप भीड़ से बचना चाहते हैं, तो छुट्टी वाले दिनों की बजाय सामान्य दिनों में आना ज्यादा अच्छा रहेगा। टिकट और प्रवेश शुल्क की

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Humayun’s Tomb, Delhi

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Humayun’s Tomb- हुमायूँ का मकबरा : मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना मुगलों ने अपने शासन के दौरान मकबरों का निर्माण करते वक़्त शायद यही सोचा होगा की एक दिन वे दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन उनके बनाए गए ये मकबरें उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे। क्योंकि मुगलों द्वारा बनाई हर विरासत बेहद भव्य और आकर्षक है और ऐसे ही एक उत्कृष्ट विरासत की बात आज हम अपनी इस यात्रा में करेंगे। बाबर के सबसे बड़े बेटे हुमायूँ को हम सभी ने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा है। लेकिन क्या आपने हुमायूँ का मकबरा देखा है? अगर अब आप ये सोच रहे हैं कि हुमायूँ का मकबरा भी इतिहास के अध्याय की तरह उबाऊ है तो आप गलत हैं, क्योंकि हुमायूँ का मकबरा भारत का पहला उद्यान-मकबरा है जो मुगल स्थापत्य के बेहतरीन उदहारणों में से एक है जिसे 1993 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में घोषित किया गया था।(Humayun’s Tomb) दिलवालों की दिल्ली में 1565 ई. में बना हुमायूँ का मकबरा मथुरा रोड़ पर स्थित है। एक बात गौर करने वाली है कि हर हेरिटेज की तरह हुमायूँ का मकबरा किसी बादशाह द्वारा नहीं बल्कि हुमायूँ की बेगम रानी हमीदा बानो ने अपने शोहर की याद में बनवाया था। साथ ही आपको बता दें ताजमहल का निर्माण इसी मकबरे से प्रभावित होकर किया गया था।(Humayun Tomb) टिकट घर और यहाँ कैसे पहुंचे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम मेट्रो स्टेशन से हुमायूँ का मकबरा लगभग 2 किलोमीटर दूर है. अब 2 किलोमीटर का रास्ता आपको 11 नंबर गाड़ी से पार करना है या ऑटो से, ये आप पर और आपकी जेब पर निर्भर करता है।  मकबरे में एंट्री के लिए भारतीय नागरिक की 35 रुपये  और विदेशी सैलानियों के लिए 550 रुपए की टिकट लगती है. टिकट खरीदने के लिए कैशलेस माध्यम अपनाना पड़ता है क्यूंकि नकद भुगतान का विकल्प फिलहाल कोरोना काल के कारण मौजूद नहीं है। टिकट लेते ही सफर शुरू हो जाता है, जिसमें मुसाफिर होते हैं हम, आप और हमारी दिलचस्पी।(Humayun’s Tomb) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों  का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। सर्दियों में ऐतिहासिक इमारतों का दीदार मन को भाता है। ईसा खान का मकबरा To watch video of this blog, you can visit our YouTube channel- Five colors of travel – Like & Subscribe हुमायूँ के मकबरे तक पहुंचने की शुरुवात ईसा खान के मकबरें और मस्ज़िद के साथ होती है जो हुमायूँ के मकबरे से 20 साल पहले बनाया गया था। ईसा खान शेरशाह सूरी के दरबार में एक अफगान रईस था। यह मकबरा अष्टकोणीय मकबरा है जो अपनी आकर्षक वास्तुकला से किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है।  इसमें लगी छतरियां, चमकदार टाइल्स और जालीदार जालियां इसकी खूबसूरती  को और अधिक  बढ़ाती हैं। ईसा खान के मकबरे के बाहर लगे एक सूचना बोर्ड को पढ़ने के बाद पता चला कि 20वी शताब्दी में यहां पूरा एक गांव आबाद था। वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण देखने के बाद अब हम आगे बढ़ें।  चारों तरफ बस हरियाली ही हरियाली पसरी हुई थी जो पूरी धरोहर को चार-चाँद लगा रही थी। बू हतीमा गेट ईसा खान के मकबरे के बाद आता है बू हतीमा गेट। यह विशाल दरवाजा बू हतीमा के मकबरे-बगीचे तक जाता है। रास्ते का अग्रभाग कत्तलदार है और टाइल कार्य के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। बगीचे की दीवार के दो उत्तरी बुर्ज़ गुम्बदी छतरियों से सुसज्जित हैं। 19वीं शताब्दी में बगीचे की पश्चिमी दीवार के कुछ हिस्से को तोड़कर प्रवेश द्वार बनाया गया था। अरब सराय दरवाज़ा बू हतीमा गेट पार करते ही दाएं हाथ पर अरब सराय दरवाज़ा दिखता है जो लगभग 14 मीटर बड़ा है। इस दरवाज़े को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम इतिहास के पन्नो पर वापस लौट गए हों। यह दरवाज़ा हुमायूँ के मकबरे के निर्माण के लिए शिल्पकारों के अहाते की ओर जाता है। लाल पत्थर, सफ़ेद सांगमंरमर, झरोखें और चमक़दार टाइलों के अवशेष से बना ये दरवाज़ा पर्यटकों  को खूब आकर्षित करता है। थोड़ा आगे चलने पर एक और दरवाज़ा आता है।  जिसमें घुसते ही दोनों तरफ हुमायूँ के मकबरे से जुड़े इतिहास के बोर्ड और पुस्तकें देखने को मिलती है। इसी दरवाज़े से सामने देखने पर खूबसूरती के सारे पैमाने लांघता हुमायूँ का मकबरा दिखाई देता है। हुमायूँ का मकबरा यकीन मानिये, हुमायूँ का मकबरा तस्वीरों में जितना खूबसूरत लगता है वास्तव में उससे कही ज्यादा है। इतना की शायद ही कोई इसकी ख़ूबसूरती बखान कर पाए।  लाल और सफ़ेद सेंड स्टोन से बनी ये इमारत उतनी ही नायाब है जितना आगरा में बना ताजमहल।  मकबरे के सामने बने फव्वारे की ठंडक को महसूस करते हुए आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगें, आपका मन इसकी सुंदरता के वश में कैद होता चला जाएगा।  इस दो मंजिला स्मारक की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते आप महसूस करेंगे की मकबरा पहले से दुगना आकर्षक होता जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं फारसी और तुर्की स्थापत्य शैली के मिश्रण से बना हुआ ये मकबरा लगभग 27 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। हुमायूँ के मकबरे को मुगलों का ‘शयनागार’ भी कहा जाता है। सच मानिए लाल और काले बलुआ पत्थर से बना ये मकबरा बहुत उम्दा विरासत है जिसे आप सभी को देखना चाहिए। आप इस मकबरे के सामने बने उद्यान में बैठकर अपनी थकान मिटाते हुए इसकी मोहकता का रसपान कर सकते हैं। मन ऐसा हो रहा था मानो इस अद्भुत विरासत को एक बार शुरू से दुबारा घूमूँ।लेकिन 3 घंटे होने में बस 5 मिनट ही बाकी थे जिसके कारण मुझे न चाहते हुए भी मकबरे को अलविदा कहना पड़ा। आपको बता दूं इन दिनों शायद कोरोना महामारी की वजह से एंट्री के बाद मकबरे में 3 घंटे तक ही रहने की अनुमति है। शायद मकबरें में ज्यादा भीड़ न हो इस वजह से। बाहर निकलते ही चटनी और भुट्टे की ख़ुश्बू आ रही थी। मैंने भुट्टा लिया और मकबरे को अलविदा कह अपने कदम बढ़ा दिए घर की तरफ। (Humayun’s Tomb) Written & Edited by Pardeep Kumar glimpse of Humayun Tomb…best monument of Mughals. The world heritage