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नालंदा: हजारों साल का इतिहास दफ्न है यहां की मिट्टी में। कैसे पहुंचें? कहां रुकें? क्या-क्या देखें? यात्रा गाइड!

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नालंदा का इतिहास है कितना रोचक? बिहार के नालंदा जिले में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया की सबसे प्राचीन और महान शिक्षा संस्थाओं में से एक रहा है, जिसने भारत के गौरवशाली इतिहास को नई ऊंचाइयां दीं। यह स्थान आज भी उन स्वर्णिम दिनों की याद दिलाता है जब दुनिया भर के छात्र ज्ञान पाने के लिए हजारों मील की दूरी तय कर यहां आते थे। महान चीनी यात्री ह्वेन सांग Hiuen Tsang ने 7वीं शताब्दी में यहां शिक्षा ग्रहण की और नालंदा को ज्ञान का विश्व केंद्र बताया। आज, नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष पर्यटन, इतिहास और पुरातत्व प्रेमियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। नालंदा के खंडहरों की विशाल बनावट और अवशेष आज भी यह बताते हैं कि कभी यह विश्वविद्यालय कितना भव्य रहा होगा। यहां 10 विशाल मंदिर, 11 छात्रावास, ध्यान केंद्र, पुस्तकालय भवन, कुंड और मोनास्ट्री के अवशेष देखने को मिलते हैं। कहते हैं कि उस समय नालंदा में 10,000 से अधिक छात्र और 2000 आचार्य रहकर अध्ययन और अध्यापन करते थे। कई धर्म बौद्ध, जैन और हिंदू दर्शन यहां पढ़ाए जाते थे और दुनिया के कई देशों से छात्र यहां आने का सपना देखते थे।(नालंदा के खंडहरों की विशाल बनावट और अवशेष आज भी यह बताते हैं कि कभी यह विश्वविद्यालय कितना भव्य रहा होगा।) नालंदा में क्या-क्या देखें? यहां आयें तो नालंदा विश्वविद्यालय पुरातात्त्विक परिसर, नालंदा पुरातात्त्विक संग्रहालय, ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल, नव नालंदा महाविहार और सरोवर परिसर प्रमुख आकर्षण हैं। यहां संरक्षित मूर्तियां, बुद्ध प्रतिमाएं, तांबे की प्लेटें, पांडुलिपियां और खंडहरों में बौद्ध स्थापत्य शैली इंसान को इतिहास में खो जाने पर मजबूर कर देती है। शाम के समय परिसर की शांति और हल्की हवा इसका अनुभव और भी दिव्य बना देती है। नालंदा विश्वविद्यालय पुरातात्त्विक परिसर नालंदा का सबसे बड़ा आकर्षण इसका विश्वविद्यालय परिसर है, जहां आज भी मौजूद खंडहर कभी 10,000 छात्रों और 2000 आचार्यों की आवाज़ों से गूंजते थे। विशाल आवासीय विहार, शिक्षण कक्ष, मंदिर, स्तूप और पुस्तकालयों के अवशेष देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह स्थान कितना भव्य और विकसित रहा होगा। लाल ईंटों से बनी संरचनाएं और बौद्ध वास्तुकला की शैली मन को सैकड़ों वर्ष पीछे ले जाती है। परिसर में घूमते हुए ऐसा महसूस होता है कि इतिहास आज भी जीवित है और हवा में ज्ञान का स्पंदन महसूस होता है। 2. नालंदा पुरातात्त्विक संग्रहालय विश्वविद्यालय के ठीक सामने स्थित यह संग्रहालय इतिहास प्रेमियों के लिए एक समृद्ध खजाने जैसा है। यहां संरक्षित बुद्ध प्रतिमाएं, तांबे की प्लेटें, टेराकोटा मूर्तियां, पांडुलिपियां, मुद्राएं और अवशेष नालंदा के गौरवशाली शैक्षणिक युग की गवाही देते हैं। संग्रहालय की सबसे महत्वपूर्ण धरोहर 10वीं शताब्दी की विशाल बुद्ध प्रतिमा है, जो ध्यान मुद्रा में स्थापित है और जिसे देखते ही मन शांति से भर उठता है। यहां का प्रत्येक आर्टिफैक्ट इस बात का प्रमाण है कि नालंदा सिर्फ शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि कला और शोध का भी विश्वस्तरीय केंद्र रहा है। 3. ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल चीनी यात्री ह्वेनसांग ने नालंदा में कई वर्षों तक अध्ययन किया और अपने ग्रंथों में यहां की महानता को दर्ज किया। उनके सम्मान में बनाया गया ह्वेन सांग मेमोरियल हॉल चीन और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का खूबसूरत प्रतीक है। यहां ह्वेन सांग की जीवन यात्रा, उनके द्वारा लिखे ऐतिहासिक विवरण और बुद्ध धर्म से जुड़े चित्र देखने को मिलते हैं। यह स्थान आध्यात्मिकता और इतिहास के अद्भुत संगम का अनुभव कराता है और भारत-चीन रिश्तों में शिक्षा के महत्व की गहरी झलक देता है। 4. नव नालंदा महाविहार 1951 में स्थापित यह आधुनिक विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा की परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया। यहां बौद्ध अध्ययन, थेरवाद, महायान और पाली भाषा का शोध कार्य होता है। शांत परिसर, पुस्तकालय और अध्ययन केंद्र शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का केंद्र हैं। दुनिया भर से छात्र यहां आकर बौद्ध दर्शन और पूर्वी विचारधारा का अध्ययन करते हैं। 5. सरोवर परिसर परिसर के पास स्थित शांत और स्वच्छ सरोवर नालंदा यात्रा का भावनात्मक और आध्यात्मिक पड़ाव है। शाम के समय जब सुनहरी धूप पानी के ऊपर पड़ती है और हवा धीरे-धीरे बहती है, तो माहौल बिल्कुल दिव्य हो जाता है। यह जगह ध्यान, फोटोग्राफी और मन को शांत करने के लिए आदर्श है। नालंदा कैसे पहुंचें? नालंदा का सबसे नजदीकी बड़ा शहर राजगीर जो कि 12 किमी है। बोधगया यहां से 80 किमी और पटना 90 किमी है। पटना से बस, टैक्सी और ट्रेन द्वारा आसानी से नालंदा पहुंचा जा सकता है। निकटतम रेलवे स्टेशन बख्तियारपुर जंक्शन है, जहां से नालंदा के लिए लोकल ट्रेन और टैक्सी उपलब्ध रहती हैं। नजदीकी हवाईअड्डा पटना एयरपोर्ट और गया इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं। नालंदा में कहां रुकें? नालंदा और राजगीर में बजट से लेकर प्रीमियम कैटेगरी तक कई होटल उपलब्ध हैं। राजगीर में बिहार स्टेट टूरिज्म का होटल, बंगला और कई प्राइवेट रिसॉर्ट्स ट्रैवलर्स के बीच काफी लोकप्रिय हैं। बोधगया में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक होटल मिल जाते हैं। तो रहने के लिए आप अपनी सुविधा के हिसाब से यहां पर रह सकते हैं। नालंदा की खासियत नालंदा सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक ऊर्जा का स्थान है। यहां की शांति, वातावरण की पवित्रता और इतिहास की गूंज मन को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है। फोटोग्राफी, रिसर्च और मेडिटेशन करने वालों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं। अगर आप ऐसी जगह जाना चाहते हैं, जहां इतिहास जीवित महसूस हो और मन को सुकून मिले तो नालंदा की यह यात्रा आपके जीवन की सबसे खूबसूरत यात्राओं में से एक हो सकती है। अगली छुट्टियों में इस ज्ञान भूमि की खोज जरूर करें! फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से 5 यात्रा सुझाव 1. सफर से पहले गंतव्य की मौसम स्थिति और स्थानीय नियमों की जानकारी जरूर लें। 2. हल्का सामान रखें और जरूरी दस्तावेज़ आईडी, टिकट, वॉलेट हमेशा सुरक्षित स्थान पर रखें। 3. यात्रा के दौरान पानी पिएं, हेल्दी स्नैक्स साथ रखें और हाइजीन का ध्यान रखें। 4. मोबाइल में ऑफलाइन मैप, जरूरी फोन नंबर और चार्जर हमेशा तैयार रखें। 5. स्थानीय संस्कृति, लोगों और जगह की सफाई का सम्मान करें यात्रा का असली मज़ा तभी मिलेगा। यहां की खूबसूरती नालंदा की खूबसूरती सिर्फ इसके ऐतिहासिक खंडहरों में नहीं उस

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Chausath Yogini Temple: यह वही मंदिर है जिसकी थीम पर बना भारत का संसद भवन!

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Chausath Yogini Temple Chausath Yogini Temple: जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। अब आपका सवाल वाजिब है कि कैसे? तो आइए मैं बताता हूं कैसे? आज हम अपनी इस विशेष यात्रा में आपको ले चलते हैं, एक बेहद खास जगह। जो इतिहास का ऐसा उदाहरण है। जिसकी छवि आप भारत की पुरानी संसद भवन में देख सकते हैं। जी हां ग्वालियर शहर से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है एक ऐसी रहस्यमय जगह जिसको देखकर आप भी दंग रह जाएंगे। बिल्कुल हमारी तरह। क्योंकि हमने जब इस मंदिर की सैकड़ों सीढ़ियां चढ़ीं और इसके दर्शन किए तो हमारी वही प्रतिक्रिया थी, जो एक असमान्य चीज देख लेने से किसी की भी होती है। यहां की खूबसूरती यह इलाके आधुनिक चीजों से थोड़े पीछे हैं, पर यह जगह भारत की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए सबसे बढ़िया हैं। यहां आप शुद्ध हवा का लुत्फ उठा सकते हैं और पक्षियों की आवाजें सुन सकते हैं। साथ ही सूर्य उदय और अस्त देख पाना सौभाग्य का पल होगा। यह समय यहां बिताना किसी सपने से कम से नहीं है, आपके पास समय हो तो एक बार यहां के गांव में घूमें और लोकल लोगों से बात करें। आपको नए नए अनुभव देखने और सुनने को मिल सकते हैं। यहां के लोग बहुत प्यारे हैं। उनका बोलना और बात करना बहुत अच्छा है। बहुत ही सम्मान के साथ आपसे बात करते हैं और आपसे भी वह यही उम्मीद करते हैं। (जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। ) कैसे बना यह चौंसठ योगनियों का मंदिर? लगभग 100 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर गूढ़ रहस्यों का स्थान तो है ही और कमाल की बात यह है कि बहुत ही पवित्र भी। क्योंकि अभी तक यह मंदिर भीड़ भाड़ से बचा हुआ है। इस खास जगह को कच्छप राजा देवपाल द्वारा लगभग 1383 में बनाया गया था। कुछ किंवदंतियों का मानना है की इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में भौम वंश की रानी हीरा देवी ने की थी। जो अभी तक उसी अंदाज में इतिहास की कहानियों को बयां करते हुए खड़ा है। यहां जाने के बाद जब हमने यहां के लोकल लोगों से पूछा तो एक और बात पता चली कि यह मंदिर तंत्र मंत्र विद्या के लिए जाना जाता है। हालांकि आज के समय में यह चौसठ योगनियों के मंदिर वैसे ही बने हैं। जैसे इनका निर्माण हुआ था। चौसठ योगनियों का मंदिर इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस मंदिर में चौसठ कमरे हैं जो आप आज भी वैसे ही देख सकते हैं।  जैसे निर्माण के वक्त थे। चौसठ कमरे चौसठ योगनियों को समर्पित हैं जो भगवान शिव की आराधना करती थीं। या तप करती थीं। इन चौसठ कमरों के बिलकुल बीच में बना है भगवान शिव का मंदिर। जिसमें लगभग 2 फीट ऊंची शिवलिंग विराजमान है। एक और प्राचीन शिवलिंग बीचों बीच इस मंदिर के चबूतरे पर रखी हुई है। जिसको देखने पर ऐसा लगता है जैसे यह शिवलिंग मंदिर से भी ज्यादा प्राचीन है। सैकड़ों साल से कई भूकंप और आंधियां आईं पर इस चौसठ योगनियों के पवित्र मंदिर की नींव हिला न सकीं। यही खासियत है इतिहास के इस बेजोड़ नमूने की। कहां है और कैसे पहुंचे? यह मंदिर मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में आता है और मुरैना से लगभग 34 किलोमीटर दूर मितावली गांव में स्थित यह मंदिर इतिहास प्रेमियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आपको ग्वालियर या मुरैना से यहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं मात्र 1 घंटा लग सकता है। जैसा कि इतनी ही दूरी ग्वालियर की है तो बिल्कुल इतना ही समय यहां से भी आपको देना पड़ सकता है। ट्रेन के जरिए ग्वालियर एक ऐसा जंक्शन है जहां से देश के किसी भी कोने में आप कहीं भी आ जा सकते हैं। इसके अलावा आप मुरैना से भी यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना में भी रेलवे स्टेशन मौजूद है। पर बात आती है मुरैना या ग्वालियर से यहां तक कैसे पहुंचे? तो आप यहां से टैक्सी या ऑटो बुक कर सकते हैं। बस से कैसे पहुंचे? बस से आप मुरैना और ग्वालियर होते हुए यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना और ग्वालियर तक आपको कहीं से भी बस मिल जाएगी। लेकिन यहां से आपको टैक्सी या ऑटो ही बुक करना पड़ सकता है। यदि आप अपने ही वाहन से हैं तब तो बात अलग ही है। आप आराम से यहां पहुंच सकते हैं। रास्ता बढ़िया है, गाड़ी सरपट दौड़ती है। आस पास के आकर्षण जब भी आप यहां जाने का प्लान बना रहे हैं तो यहां के कुछ अदभुत स्थान आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल होने चाहिए जिनमें- बटेश्वर धाम वास्तव में जब भी आप ग्वालियर, मुरैना या मितावली के चौसठ योगनियों के मंदिर जाने का सोच रहें हैं, तो बटेश्वर धाम जाना बिल्कुल न भूलें। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जहां आप जाते ही अपने आपको प्राचीन युग में पाएंगे। 100 मंदिरों का यह गढ़ आज भी अपनी जीवंतता बनाए हुए है। यहां के हर पत्थर में आपको कुछ न कुछ गढ़ा हुआ मिलेगा। इन सैकड़ों मंदिरों में आप देख पाएंगे दिव्य शिवलिंग। इन सैकड़ों छोटे बड़े मंदिरों की अद्भुत कहानी है जो अगली पेशकश में आप पढ़ पाएंगे। शनि मंदिर जब आप ग्वालियर से मितावली या गढ़मुक्तेश्वर जाते हैं तो रस्ते में ही आपको मिलेगा, प्राचीन और दिव्य शनि मंदिर। माना जाता है कि यह मंदिर उल्का पिंड के पत्थर से निर्मित है। इसपर कई मतभेद हैं। जो आप यहां आकर ही सुलझा सकते हैं। गड़ी पढ़ावली यात्रा के दौरान जब आप गढ़मुक्तेशर से मितावली जाते हैं तो रस्ते में ही आप पाएंगे। गड़ी पढ़ावली जहां पर एक प्राचीन किले का दीदार आप कर पाएंगे। जो बेहद खास जगह है इतिहास प्रेमियों के लिए। यहां आकर आप यहां की सुंदरता और ग्रामीण जीवन को समझ पाएंगे। और इतिहास के इन पन्नो को पलटकर इनमें छिपे रहस्य जान पाएंगे। रुकने और खाने पीने का इंतजाम मितावली, गड़ी पढ़ावली या बटेश्वर ये छोटे छोटे गांव व कस्बे हैं। यहां आपको ज्यादा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाएंगी। इसलिए आप एक दो दिन के सफर पर निकले हैं तो ग्वालियर और मुरैना में आप