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चराइदेव मोईदाम: इतिहास की गोद में सोई अहोम विरासत, जिन्हें कहते हैं असम के पिरामिड!

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चराइदेव मोईदाम क्या है? चराइदेव मोईदाम: असम के शिवसागर जिले की हरी-भरी पहाड़ियों पर बसा एक ऐसा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थल है, जिसे अक्सर असम के पिरामिड कहा जाता है। यूं तो हमारे देश में कई राजवंशों की कहानियां किले और महलों में लिखी गईं लेकिन च राइदेव में इतिहास मिट्टी और मौन की परतों में गहरी नींद में सोया हुआ है। यहां मौजूद मोईदाम या मैदाम असल में शाही समाधियां हैं जहां अहोम राजाओं, रानियों और प्रमुख सरदारों को दफनाया जाता था। यह स्थान न केवल पुरातन स्थापत्य का नमूना है बल्कि 600 वर्षों तक पूर्वोत्तर भारत पर शासन करने वाले अहोम साम्राज्य की विराट सांस्कृतिक पहचान भी है। यहां फैले मिट्टी के टीले, गुहा-नुमा भूमिगत कक्ष और परिधि में फैली शांति, इतिहास प्रेमियों को जैसे किसी दूसरी दुनिया में ले जाती है। आज भी सैकड़ों मोईदाम पहाड़ियों पर बिछी हुई हरी चादर की तरह दिखते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि समय अपनी सांसे रोककर खड़ा है और उनके भीतर दफ्न हर पत्थर एक कहानी कहना चाहता है। कोई आश्चर्य नहीं कि लोग इसे असम का मिस्र भी कहते हैं क्योंकि मिस्र के पिरामिड की तरह यह भी शाही समाधि परंपरा का संग्रहीत नमूना है। क्यों कहा जाता है इसे असम का पिरामिड? चराइदेव मोईदाम की रहस्यमयी वास्तुकला, विशाल संरचना और दफन परंपरा इसे मिस्र के पिरामिडों से जोड़ती है। जहां भारत के अधिकतर हिस्सों में दाह-संस्कार की परंपरा थी, वहीं अहोम शासन मृतकों को दफन करने में विश्वास रखता था। उनका मानना था कि मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा अब भी यात्रा जारी रखती है और नई यात्रा में उसे वाहन, धातु, आवश्यक वस्तुएं और साथ देने वाले लोग चाहिए। इसलिए शाही समाधियों में मृत राजा-रानी के साथ विशेष वस्तुएं, सेवक, घोड़े और युद्ध के उपकरण भी दफन किए जाते थे।(चराइदेव मोईदाम असम के शिवसागर जिले की हरी-भरी पहाड़ियों पर बसा एक ऐसा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थल है) इन मोईदामों में एक भूमिगत कक्ष बनाया जाता था, जिसे ईंट और पत्थर से मजबूत किया जाता था। फिर उसके ऊपर मिट्टी की मोटी परतों से टीला बनाया जाता था, जो दूर से देखकर पिरामिड-नुमा दिखता है। आठ-कोणीय घेरे वाली दीवार और ऊपरी भाग में छोटी मंदिर जैसी संरचना, इसे पवित्र और आस्था से भरा प्रतीक बना देती थी। ये सब चराइदेव मोईदाम को एक असाधारण पुरातात्त्विक धरोहर बनाते हैं जहां इतिहास, परंपरा और रहस्य मानो एक साथ सांस लेते दिखाई देते हैं। आज भी यहां खड़े होकर सूरज ढलते देखना वैसा ही अनुभव देता है जैसे आप किसी भूले-बिसरे साम्राज्य की चुप्पी से संवाद कर रहे हों। यही शानदार स्थापत्य, अनोखी दफन संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य चराइदेव को पूरी दुनिया में अनोखा बनाता है। कैसे बनाए गए थे ये शाही मोईदाम? चराइदेव मोईदाम निर्माण की बारीकियां समझें तो महसूस होता है कि यह सिर्फ दफनाने की जगह नहीं एक पवित्र ब्रह्मांड व्यवस्था का मॉडल था। अहोम लोग ताई संस्कृति का पालन करते थे, जहां माना जाता था कि ब्रह्मांड पृथ्वी, पर्वत, जल और ऊर्जा के संतुलन से बना है और मोईदाम इन्हीं तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सबसे पहले एक गहरी भूमिगत गुहा बनाई जाती थी, जिसे मज़बूत ईंटों और पत्थर से तैयार किया जाता था। इसमें शव को धातु पात्र या लकड़ी की कलाकृतियों के ताबूत में रखा जाता था। कई मामलों में रानियां, सेवक, हथियार, सोने-चाँदी के सिक्के, शाही पोशाकें, पशु और भोजन तक दफन किया जाता था। इस विश्वास के साथ कि मरणोपरांत संसार में इन्हें आवश्यकता होगी। गुहा बंद करने के बाद ऊपर से बड़ी मात्रा में मिट्टी डालकर ऊंचा गोलाकार टीला बनाया जाता था। टीले के ऊपर एक छोटा चैम्बर या मंदिरनुमा ढांचा बनाया जाता था, जिसे पवित्र स्थान माना जाता था और जहां आज भी पूर्वज पूजन अनुष्ठान होते हैं। पूरी संरचना को आठ-कोणीय सुरक्षा दीवार से घेरा जाता था जो दिशाओं और प्रकृति की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती थी। इस स्तर के वास्तु ज्ञान, गणना और धार्मिक बारीकियों ने चराइदेव मोईदाम को समय से परे एक अमर धरोहर बना दिया। कहां स्थित हैं चराइदेव मोईदाम और कैसे पहुंचे? चराइदेव मोईदाम असम के शिवसागर जिले में स्थित हैं, जो कभी अहोम साम्राज्य की गौरवशाली राजधानी हुआ करता था। यह स्थान ब्रह्मपुत्र घाटी के पूर्वी भाग में, पटकाई पर्वत की तलहटी में बसा है जहां हरे-भरे जंगल, ठंडी हवाएं और शांत वातावरण मिलकर यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। कैसे पहुंचे? निकटतम हवाई अड्डा जोड़हाट जो लगभग 60–65 किमी दूरी पर है । निकटतम रेलवे स्टेशन शिवसागर टाउन या डिब्रूगढ़ सड़क मार्ग, गुवाहाटी से लगभग 370–400 किमी स्थानीय टैक्सी, बस या टूर गाइड की सहायता से चराइदेव मोईदाम तक सहजता से पहुंचा जा सकता है। घूमने का श्रेष्ठ समय नवंबर से फरवरी माना जाता है, जब मौसम सुहावना और वातावरण साफ-सुथरा होता है। अगर चाहें तो आप सिवसागर के अन्य ऐतिहासिक स्थल रंगघर, तलाताल घर, करेंगघर और शिवडोल मंदिर भी साथ में देख सकते हैं। किसने बनवाया और किस युग की हैं यह धरोहरें? चराइदेव मोईदाम का इतिहास 1253 ईस्वी से शुरू होता है जब अहोम वंश के संस्थापक राजा सुकाफा ने च राइदेव को अपनी पहली राजधानी बनाया। यहीं से मोईदाम बनाने की परंपरा शुरू हुई, जो 600 वर्ष तक 19वीं सदी के मध्य तक—चलती रही। इस दौरान लगभग 90 प्रमुख मोईदाम बनाए गए, जिनमें राजाओं और रानियों की समाधियां शामिल हैं। अहोम शासन को इतना गौरव प्राप्त था कि उन्होंने न केवल राजनीति बल्कि असम की संस्कृति, भाषा, समाज और भू-जीवन को नए सांचे में ढाला। मोईदाम इस बात का प्रमाण हैं कि उनकी वास्तुशिल्प तकनीक कितनी उन्नत थी। आज भी कई मोईदाम स्थानीय प्रशासन, पुरातत्व विभाग और UNESCO के संरक्षण में सुरक्षित रखे गए हैं क्योंकि यह पूर्वोत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों में से मानी जाती है। आज का महत्व, यात्रा अनुभव और भविष्य चराइदेव मोईदाम सिर्फ पुरानी कब्रें नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मि तीर्थस्थान हैं जहां प्रकृति और अतीत एक-दूसरे में घुलकर अद्भुत दृश्य रचते हैं। शांत वातावरण, मिट्टी के गुम्बदनुमा टीले और हवा में बसी गहरी चुप्पी यात्री को भीतर तक महसूस होने वाली अनुभूति देती है। यहां घूमते हुए लगता है जैसे हर टीला एक राजा की कहानी, एक युद्ध

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Chausath Yogini Temple: यह वही मंदिर है जिसकी थीम पर बना भारत का संसद भवन!

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Chausath Yogini Temple Chausath Yogini Temple: जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। अब आपका सवाल वाजिब है कि कैसे? तो आइए मैं बताता हूं कैसे? आज हम अपनी इस विशेष यात्रा में आपको ले चलते हैं, एक बेहद खास जगह। जो इतिहास का ऐसा उदाहरण है। जिसकी छवि आप भारत की पुरानी संसद भवन में देख सकते हैं। जी हां ग्वालियर शहर से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है एक ऐसी रहस्यमय जगह जिसको देखकर आप भी दंग रह जाएंगे। बिल्कुल हमारी तरह। क्योंकि हमने जब इस मंदिर की सैकड़ों सीढ़ियां चढ़ीं और इसके दर्शन किए तो हमारी वही प्रतिक्रिया थी, जो एक असमान्य चीज देख लेने से किसी की भी होती है। यहां की खूबसूरती यह इलाके आधुनिक चीजों से थोड़े पीछे हैं, पर यह जगह भारत की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए सबसे बढ़िया हैं। यहां आप शुद्ध हवा का लुत्फ उठा सकते हैं और पक्षियों की आवाजें सुन सकते हैं। साथ ही सूर्य उदय और अस्त देख पाना सौभाग्य का पल होगा। यह समय यहां बिताना किसी सपने से कम से नहीं है, आपके पास समय हो तो एक बार यहां के गांव में घूमें और लोकल लोगों से बात करें। आपको नए नए अनुभव देखने और सुनने को मिल सकते हैं। यहां के लोग बहुत प्यारे हैं। उनका बोलना और बात करना बहुत अच्छा है। बहुत ही सम्मान के साथ आपसे बात करते हैं और आपसे भी वह यही उम्मीद करते हैं। (जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। ) कैसे बना यह चौंसठ योगनियों का मंदिर? लगभग 100 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर गूढ़ रहस्यों का स्थान तो है ही और कमाल की बात यह है कि बहुत ही पवित्र भी। क्योंकि अभी तक यह मंदिर भीड़ भाड़ से बचा हुआ है। इस खास जगह को कच्छप राजा देवपाल द्वारा लगभग 1383 में बनाया गया था। कुछ किंवदंतियों का मानना है की इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में भौम वंश की रानी हीरा देवी ने की थी। जो अभी तक उसी अंदाज में इतिहास की कहानियों को बयां करते हुए खड़ा है। यहां जाने के बाद जब हमने यहां के लोकल लोगों से पूछा तो एक और बात पता चली कि यह मंदिर तंत्र मंत्र विद्या के लिए जाना जाता है। हालांकि आज के समय में यह चौसठ योगनियों के मंदिर वैसे ही बने हैं। जैसे इनका निर्माण हुआ था। चौसठ योगनियों का मंदिर इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस मंदिर में चौसठ कमरे हैं जो आप आज भी वैसे ही देख सकते हैं।  जैसे निर्माण के वक्त थे। चौसठ कमरे चौसठ योगनियों को समर्पित हैं जो भगवान शिव की आराधना करती थीं। या तप करती थीं। इन चौसठ कमरों के बिलकुल बीच में बना है भगवान शिव का मंदिर। जिसमें लगभग 2 फीट ऊंची शिवलिंग विराजमान है। एक और प्राचीन शिवलिंग बीचों बीच इस मंदिर के चबूतरे पर रखी हुई है। जिसको देखने पर ऐसा लगता है जैसे यह शिवलिंग मंदिर से भी ज्यादा प्राचीन है। सैकड़ों साल से कई भूकंप और आंधियां आईं पर इस चौसठ योगनियों के पवित्र मंदिर की नींव हिला न सकीं। यही खासियत है इतिहास के इस बेजोड़ नमूने की। कहां है और कैसे पहुंचे? यह मंदिर मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में आता है और मुरैना से लगभग 34 किलोमीटर दूर मितावली गांव में स्थित यह मंदिर इतिहास प्रेमियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आपको ग्वालियर या मुरैना से यहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं मात्र 1 घंटा लग सकता है। जैसा कि इतनी ही दूरी ग्वालियर की है तो बिल्कुल इतना ही समय यहां से भी आपको देना पड़ सकता है। ट्रेन के जरिए ग्वालियर एक ऐसा जंक्शन है जहां से देश के किसी भी कोने में आप कहीं भी आ जा सकते हैं। इसके अलावा आप मुरैना से भी यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना में भी रेलवे स्टेशन मौजूद है। पर बात आती है मुरैना या ग्वालियर से यहां तक कैसे पहुंचे? तो आप यहां से टैक्सी या ऑटो बुक कर सकते हैं। बस से कैसे पहुंचे? बस से आप मुरैना और ग्वालियर होते हुए यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना और ग्वालियर तक आपको कहीं से भी बस मिल जाएगी। लेकिन यहां से आपको टैक्सी या ऑटो ही बुक करना पड़ सकता है। यदि आप अपने ही वाहन से हैं तब तो बात अलग ही है। आप आराम से यहां पहुंच सकते हैं। रास्ता बढ़िया है, गाड़ी सरपट दौड़ती है। आस पास के आकर्षण जब भी आप यहां जाने का प्लान बना रहे हैं तो यहां के कुछ अदभुत स्थान आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल होने चाहिए जिनमें- बटेश्वर धाम वास्तव में जब भी आप ग्वालियर, मुरैना या मितावली के चौसठ योगनियों के मंदिर जाने का सोच रहें हैं, तो बटेश्वर धाम जाना बिल्कुल न भूलें। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जहां आप जाते ही अपने आपको प्राचीन युग में पाएंगे। 100 मंदिरों का यह गढ़ आज भी अपनी जीवंतता बनाए हुए है। यहां के हर पत्थर में आपको कुछ न कुछ गढ़ा हुआ मिलेगा। इन सैकड़ों मंदिरों में आप देख पाएंगे दिव्य शिवलिंग। इन सैकड़ों छोटे बड़े मंदिरों की अद्भुत कहानी है जो अगली पेशकश में आप पढ़ पाएंगे। शनि मंदिर जब आप ग्वालियर से मितावली या गढ़मुक्तेश्वर जाते हैं तो रस्ते में ही आपको मिलेगा, प्राचीन और दिव्य शनि मंदिर। माना जाता है कि यह मंदिर उल्का पिंड के पत्थर से निर्मित है। इसपर कई मतभेद हैं। जो आप यहां आकर ही सुलझा सकते हैं। गड़ी पढ़ावली यात्रा के दौरान जब आप गढ़मुक्तेशर से मितावली जाते हैं तो रस्ते में ही आप पाएंगे। गड़ी पढ़ावली जहां पर एक प्राचीन किले का दीदार आप कर पाएंगे। जो बेहद खास जगह है इतिहास प्रेमियों के लिए। यहां आकर आप यहां की सुंदरता और ग्रामीण जीवन को समझ पाएंगे। और इतिहास के इन पन्नो को पलटकर इनमें छिपे रहस्य जान पाएंगे। रुकने और खाने पीने का इंतजाम मितावली, गड़ी पढ़ावली या बटेश्वर ये छोटे छोटे गांव व कस्बे हैं। यहां आपको ज्यादा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाएंगी। इसलिए आप एक दो दिन के सफर पर निकले हैं तो ग्वालियर और मुरैना में आप

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हजारीबाग – झारखंड की शांत वादियों, झीलों और जंगलों से भरे एक खूबसूरत शहर का सफर

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हजारीबाग का इतिहास–बगीचों, संस्कृति और वीरता की धरती हजारीबाग का इतिहास प्रकृति, संस्कृति और संघर्ष की कहानियों से पूरी तरह भरा हुआ है। इस क्षेत्र का नाम हजारीबाग दो शब्दों से मिलकर बना है हज़ार और बाग़, यानी हजारों बाग-बगीचों की धरती। प्राचीन काल में यह इलाका मगध साम्राज्य और बाद में नागवंशी राजाओं के नियंत्रण में रहा है। घने जंगल और ऊंची पहाड़ियां इसे हमेशा से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते रहे। ब्रिटिश काल में हजारीबाग एक प्रमुख सैन्य छावनी और प्रशासनिक केंद्र बना, जहां से चुटूपालू घाटी और आसपास के जनजातीय क्षेत्रों पर नियंत्रण रखा जाता था। आजादी के आंदोलन में भी हजारीबाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष भी किया। समय के साथ हजारीबाग एक शांत, प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हुआ। यहां की झीलें, म्यूरल पेंटिंग, जंगल और आदिवासी कला इस इतिहास को आज भी ज़िंदा रखती हैं। हजारीबाग की पहली झलक में मोहित हो जाएंगे आप! झारखंड का हजारीबाग एक ऐसी जगह है जिसे देखने के बाद हर यात्री को लगता है कि वह किसी छुपे हुए समुद्री टापू पर पहुंच गया है। यहां की हवा में एक अलग ही फ़ील है। हरे-भरे जंगल, साफ-सुथरा मौसम, शांत झीलें और पहाड़ों से घिरी घाटियां इस जगह को बेहद खास बनाती हैं। हजारीबाग की खासियत यह है कि यह न तो ज़्यादा भीड़ वाला है और न ही बहुत बिज़ी। यह उन यात्रियों के लिए परफेक्ट प्लेस है, जो शहर के शोर से दूर कुछ समय प्रकृति के बीच बिताना चाहते हैं। जैसे ही आप यहां पहुंचते हैं, सबसे पहले महसूस होता है कि हवा कितनी साफ है और आसमान कितना नीला। सड़कें पेड़ों से घिरी हुई हैं और दोनों तरफ हरियाली देखकर दिल खुश हो जाता है। हजारीबाग में घूमते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि यह शहर नहीं, बल्कि एक मां की गोद है! जहां आपको आराम भी मिलता है, प्यार भी।   हजारीबाग नेशनल पार्क जंगल और जीवन की झलक अगर आप नेचर और वाइल्ड लाइफ प्रेमी हैं, तो हजारीबाग नेशनल पार्क आपकी ट्रैवल लिस्ट में सबसे ऊपर होना चाहिए। यह पार्क हजारीबाग की शान है। यहां का जंगल घना और गहरा है, जहां सूरज की किरणें भी पत्तों के बीच से छनकर जमीन पर पड़ती हैं। पार्क में घुसते ही एक अलग ही सन्नाटा मिलता है पक्षियों की आवाजें, हवा की सरसराहट और दूर से आती किसी जानवर की गर्जना मन को रोमांच से भर देती है। यहां टाइगर, सांभर, नीलगाय, भालू, लकड़बग्घा और कई तरह के दुर्लभ पक्षी मिलते हैं। हालांकि यह पार्क अब “हजारीबाग वाइल्ड लाइफ सेंचुरी” के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी खूबसूरती बिल्कुल वैसी ही है। सुबह-सुबह सफारी पर निकलना एक अनोखा अनुभव देता है। हवा ठंडी होती है, पेड़ों पर ओस जमी होती है और चारों तरफ धुंध का हल्का पर्दा फैलता है, जिससे जंगल किसी रहस्यमयी फिल्म जैसा लगता है।(यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष भी किया।) कैनारी हिल की ऊंचाइयों से हजारीबाग का खूबसूरत नज़ारा हजारीबाग आने वाले हर यात्री को कैनारी हिल जरूर जाना चाहिए। यहां ऊपर पहुंचने पर जो नज़ारा मिलता है, वह पूरे सफर की थकान मिटा देता है। सड़क थोड़ी घुमावदार है लेकिन बेहद खूबसूरत। दोनों तरफ पेड़ों की कतारें हैं और जैसे-जैसे आप ऊपर बढ़ते जाते हैं, हवाएं ठंडी होती जाती हैं। कैनारी हिल टॉप पर पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे पूरा हजारीबाग आपकी आंखों के सामने खुला पड़ा हो। पहाड़ों की रेखाएं, दूर-दूर तक फैली हरियाली, शहर की छोटी-छोटी इमारतें और खुला आसमान यह सब मिलकर तस्वीर जैसा खूबसूरत दृश्य बनाते हैं। यहां खड़े होकर फोटो खींचना हर यात्री का फेवरेट काम होता है। पहाड़ की चोटी पर बैठकर कुछ देर हवा में सांस लेना खुद को रीसेट करने जैसा है। यह जगह ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी शानदार है। यहां का शांत माहौल मन को पूरी तरह से रिलैक्स कर देता है और यही वजह है कि हजारीबाग का नाम आते ही लोग कैनारी हिल को जरूर याद करते हैं। झील की शाम, ठंडी हवा और पानी के किनारे का आनंद हजारीबाग झील यहां की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। शहर के बीच में बनी यह झील हर किसी को अपनी तरफ खींच लेती है। दिन हो या शाम यहां का माहौल हमेशा सुहाना रहता है। झील के किनारे पत्थर की बेंचें बनी हैं, जहां बैठकर लोग धूप का मजा लेते हैं। शाम ढलते ही यहां काफ़ी भीड़ जम जाती है। जोड़े हाथ में हाथ डालकर टहलते हैं, बच्चे दौड़ते-फिरते हैं, और बुज़ुर्ग शांतिपूर्वक हवा का आनंद लेते हैं। झील में बोटिंग करना भी हजारीबाग की सबसे पसंदीदा एक्सपीरियंस में से एक है। पानी में नाव की धीमी-धीमी आवाज और आसमान में उड़ते पक्षी एक खूबसूरत माहौल बना देते हैं। झील के आसपास बने छोटे-छोटे चाय के स्टॉल और कॉर्न बेचने वाले दुकानदार इस शाम को और भी खास बना देते हैं। गरम चाय हाथ में लेकर झील के किनारे बैठना और दूर तक फैले पानी को देखना यह एक ऐसा शांत अनुभव है जिसे शब्दों में पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता। हजारीबाग की संस्कृति में छिपे हैं जीवन के राज! हजारीबाग सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और लोगों की सादगी के लिए भी जाना जाता है। यह शहर कई आदिवासी परंपराओं और लोक संगीत से भरा है। यहां के लोग बेहद दिलदार और सरल होते हैं। यहां की बोली में एक अलग मिठास है धीमी, सहज और अपनेपन से भरी हुई। हजारीबाग की कुटुम्ब कला tribal art और यहां की पारंपरिक पेंटिंग “सोहराय” दुनिया भर में मशहूर है। दीवारों पर बने इन चित्रों में प्रकृति, जानवर, खेती और लोकजीवन का सुंदर वर्णन मिलता है। भोजन की बात करें तो यहां की देसी थाली में चावल, दाल, साग, ढेंकिया, तिल का खाना, माड़ और थोड़ा-सा लाल मिर्च का स्वाद एकदम घर जैसा एहसास देता है। सफर की यादें जो बरसों दिल में रहती हैं हजारीबाग का सफर ऐसा होता है जिसे भूलना मुश्किल है। चाहे आप सोलो ट्रैवलर हों, फैमिली के साथ आए हों या दोस्तों के साथ। यह जगह हर किसी को अपना बना लेती है।