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हरियाणा के इस जिले में आज भी जिंदा है, दुनिया का सबसे पुराना भाप इंजन, गदर फिल्म की हुई थी शूटिंग

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बात हरियाणा के ऐतिहासिक शहरों की हो और इसमें रेवाड़ी का जिक्र ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है। रेवाड़ी का संबंध महाभारत काल से बताया जाता है। पहले यह शहर रेवत के नाम से जाना जाता था, उसके बाद इसका नाम रेवाड़ी पड़ा। बताते हैं कि महाभारत में राजा रेवत की बेटी रेवती के नाम पर शहर का नाम रखा गया था। राजकुमारी का विवाह भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम से हुआ था और राजा ने दहेज में यह नगर दिया था। राजा हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू के कारण भी रेवाड़ी काफी प्रसिद्ध है। हेमू ने रेवाड़ी में पीतल की तोपें और हथियार बनाने का काम शुरू किया था, उसके बाद इसका नाम पीतल नगरी पड़ा। आज भी इसे पीतल नगरी के नाम से जाना जाता है। मौजूदा समय में रेवाड़ी पर्यटन का भी आकर्षण केंद्र रहा है, यहां पर पुराने भाप इंजनों का संग्रहालय है। 17वीं शताब्दी में बनाई हए सोलहाराही और बड़ा तालाब भी रेवाड़ी में स्थित है्, जोकि अपनी प्राचीन कलाकारी के लिए जानी जाती है। रेवाड़ी लोको शेड रेलवे स्टेशन के पास स्थित लोको शेड भारत में एकमात्र जीवित भाप लोको शेड है। दुनिया की सबसे पुरानी अभी भी कार्यात्मक 1855 में निर्मित स्टीम लोकोमोटिव फेयरी क्वीन आकर्षण का केंद्र है। यह रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार के 400 मीटर उत्तर में स्थित है। लोको शेड सोमवार के दिन बंद रहता है। मंगलवार से लेकर रविवार तक लोको शेड खुला होता है। इसके खुलने का समय सुबह 10 से लेकर शाम 4 बजे तक का है। जहां पर भाप के इंजन रखे हुए हैं, वहां घूमने के लिए बड़ों का किराया 50 रुपये और बच्चों का किराया 25 रुपये रखा गया है। म्यूजियम में घूमने के लिए बड़ों का किराया 20 रुपये और बच्चों का किराया 10 रुपये है। फेयरी क्वीन इंजन खास मौकों पर ही चलता है, जब विदेशी पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं। इसका किराया 3 हजार रुपये से अधिक है। यह ट्रेन रेवाड़ी और दिल्ली कैंट तक चलती है। ये भाप इंजन भी हैं आकर्षण का केंद्र इसके अलावा रेवाड़ी किंग, साइब, सुल्तान, सिंध, अंगद, अकबर, आजाद, शेर-ए-पंजाब, विराट और शक्तिमान नाम के भाप इंजन पर्यटकों के लिए संभाल कर रखे गए हैं। यहां पर एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए रेलवे के अबतक के सफर को पर्यटकों को दिखाया जाता है। भारतीय भाप का इंजन अकबर, गदर एक प्रेम कथा, भाग मिल्खा भाग, गांधी माई फादर, गैंग्स ऑफ वासेपुर समेत कई बड़ी सुपरहिट फिल्मों में इस इंजन का उपयोग किया गया है। 800 मीटर का लगाया हुआ है टॉय ट्रेक लोको शेड इंचार्ज ओम प्रकाश मीणा ने बताया कि रेवाड़ी लोको शेड में एक म्यूजियम भी बनाया हुआ है, जहां भाप के इंजन की यादों को जिंदा रखा गया है, ताकि युवा पीढ़ी भारतीय रेल का शुरू से लेकर अब तक का सफर जान सकें। लोको शेड के भीतर ही पर्यटकों को लुभाने के लिए टॉय ट्रेन भी चलाई जाती है, जिसका 800 मीटर का ट्रैक लगाया हुआ है। इसके अलावा लोको शेड के अंदर ही एक ऐसी जगह बनाई गई है, जिसे देखकर आप यहीं से ही भारतीय रेल का मानचित्र देख सकते हैं कि कैसे-कैसे स्थानों पर भारतीय रेल सेवाएं दे रही है। यहां पर एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए रेलवे के अब तक के सफर को पर्यटकों को दिखाया जाता है। बड़ा तालाब लोको शेड से 800 मीटर की दूरी पर बड़ा तालाब स्थित है। सर्कुलर रोड से होते हुए आसानी से तालाब देखने के लिए पहुंचा जा सकता है। यह तालाब 17वी् शताब्दी में बनाया गया था। रेवाड़ी के राजा राव राम सिंह ने पानी की किल्लत के कारण इस तालाब को बनवाना शुरू किया था, लेकिन उसी समय राजा माधव राव सिंधिया ने रेवाड़ी पर धावा बोल दिया और प्रजा हितैषी राजा राम सिंह शौर्य दिखाते हुए शहीद हो गए थे। इसके बाद तालाब निर्माण कार्य बंद हो गया। रेवाड़ी निवासी जब पानी की कमी से तंग होने लगे तो एक और राजा राव तेज सिंह ने अपने शासनकाल में तालाब निर्माण के रुके कार्य को वर्ष 1772 में शुरू करवाया जो 1776 में तैयार हुआ। इस तालाब की निर्माण कला और कारीगरी अद्भुत है। इसमें गऊ घाट, इमली घाट, प्राचीन हनुमान मंदिर व शिव मंदिर प्रतिष्ठित हैं। राजा राव तेज सिंह द्वारा इस तालाब को पूरा करवाने के कारण ही इसका नाम तेज सरोवर पड़ गया। सोलहाराही तालाब बड़ा तालाब से मात्र 500 मीटर की दूरी पर सोलहाराही तालाब स्थित है। बड़ा तालाब से सर्कुलर रोड को पार करके नेहरू पार्क के पास आसानी से पहुंचा जा सकता है।सोलहाराही तालाब शहर के सेक्टर में स्थित प्राचीनतम तालाब है। 17वीं व 18वीं सदी के मुगल साम्राज्य की दास्तान का मूक गवाह रहा यह तालाब जनता ने सामूहिक प्रयासों से चंदा इकट्ठा करके बनवाया था। समाजसेवी गंगाराम भगत की देखरेख में निर्माण कार्य हुआ था। उस समय सोलह मार्ग यहां आकर मिलते थे, इसलिए इसका नाम सोलह राही पड़ गया। शहर का पानी खारा था, इसलिए पहले लोग सोलह राही स्थित कुओं से पेयजल लाते थे। कुछ दंत कथाओं के अनुसार, रुद्र सिंह ने इस ऐतिहासिक तालाब का निर्माण कराया था। 16 रास्तों के मिलान पर ढलान में स्थापित इस सरोवर को सोलहराही से ही जाना जाता है। कैसे पहुंचे रेवाड़ी अगर आप रेवाड़ी में घूमने के लिए आते हैं तो रेवाड़ी रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। रेलवे स्टेशन से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी में सभी पर्यटन स्थल देखने को मिलेंगे। ऑटो टैक्सी का किराया भी ज्यादा नहीं है। ऑटो 24 घंटे यहां पर मिलते हैं, जिनका किराया 20 रुपये से लेकर 50 रुपये के आसपास का है। रेवाड़ी में बस स्टैंड भी है। रेवाड़ी से दिल्ली की दूरी करीब 80 किलोमीटर के आसपास की है। दिल्ली से ट्रेन और बस के माध्यम से रेवाड़ी आसानी से पहुंचा जा सकता है। सड़क माध्यम की बात करें तो दिल्ली जयपुर हाईवे 48 से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर रेवाड़ी शहर बसा हुआ है। सबसे निकटतम बस अड्डा दिल्ली का आईजीआई एयरपोर्ट है। आईजीआई एयरपोर्ट के मुख्य मार्ग महिपालपुर के पास आपको सीधी बस सेवा रेवाड़ी के लिए मिल जाएगी।

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Cultural dances of Haryana

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भारत के सबसे प्रसिद्ध राज्यों में से एक है हरियाणा। यह एक ऐसा राज्य है जहां की म्यूजिक इंडस्ट्री ने कुछ सालों में पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान हासिल की है। आज के फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल (Five Colors Of Travel) के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं इसी छोटे से खूबसूरत राज्य के नृत्यों की संस्कृति के बारे में। हम आपको इस छोटे से राज्य के अलग-अलग नृत्यों (Cultural dances of Haryana) के प्रकार और उसके महत्व के बारे में बताएंगे। हरियाणा की संस्कृति भरी है गहराई और विविधता से। ये उत्तर भारतीय राज्य, अपनी पारंपरिक विरासत और विकसित विचारों के लिए प्रसिद्ध है। हरियाणवी लोक संस्कृति में गिद्धा, बोली और खट्टा मीठी भाषा का महत्व है। यहां के लोग गन्ने के खेतों में मेहनत करते हैं और शादी, टीला, और झूमर जैसे नृत्यों से अपनी आनंद भरी जिंदगी का मजा लेते हैं। हरियाणा की संस्कृति का सबसे प्रमुख हिस्सा उनका उत्सव और त्यौहारों का मेल है, जिसमें लोहड़ी, होली और बैसाखी शामिल हैं। यहां पारंपरिक खाना जैसे मक्के की रोटी, सरसों का साग, और लस्सी भी हरियाणवी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। हरियाणा के लोग गौरवपूर्ण तरीके से अपने इतिहास और विरासत को समझते हैं और उसे अनमोल मानते हैं। हरियाणा के नृत्य कलाओं की संस्कृति उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, और एतिहासिक परिचय से गहरा जुड़ाव है। ये नृत्य कलाएं हरियाणा की ऋचा विरासत को दर्शाती हैं और उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं। हरियाणा के नृत्य कलाओं में उसकी परम्परागत संस्कृति का प्रभाव प्रकट होता है। ये नृत्य कलाएँ शादी, त्यौहार, और अन्य सांस्कृतिक अवसर पर प्रस्तुति की जाती हैं, जिसे लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को महत्व देते हैं। हरियाणा की संस्कृति में कई प्रमुख नृत्य हैं, जो लोकप्रिय और महत्वपूर्ण हैं। यहाँ उनके विस्तृत रूप का परिचय है: 1.गिद्धा: गिद्धा नृत्य, हरियाणा की प्रमुख लोक नृत्य कलाओं में से एक है। यह मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और समाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर प्रदर्शित किया जाता है। गिद्धा नृत्य एक प्रकार की लोक कला है जो हरियाणा की समृद्ध लोक सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। गिद्धा नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं के समूह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह नृत्य उत्सवी और आनंददायक गतिविधि होती है जिसमें महिलाएं गाती हैं, नृत्य करती हैं, और कहानियाँ सुनाती हैं। इसमें विभिन्न मुद्राओं, तालों और लहजों का प्रयोग होता है जो इसे आकर्षक और रंगीन बनाता है। गिद्धा नृत्य का मुख्य उद्देश्य समुदाय को सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर जोड़ना होता है। इसके माध्यम से महिलाएं अपने सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का प्रयास करती हैं और समुदाय के साथ मेल-जोल और एकता को बढ़ावा देती हैं। गिद्धा नृत्य के द्वारा हरियाणा की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत किया जाता है, जो इसे एक अनूठा और महत्वपूर्ण नृत्य रूप में बनाता है। 2.बोली: बोली नृत्य, हरियाणा की प्रमुख लोक नृत्य कलाओं में से एक है। यह एक सामूहिक नृत्य है जो पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। बोली नृत्य के दौरान नृत्यकार गाने के साथ स्टेप करते हैं और साथ ही गीत को गाकर अपनी कविताएँ साझा करते हैं। इसमें गाने, नृत्य, और कविता का संगम होता है जो इसे एक अद्वितीय और मनोरंजनात्मक अनुभव बनाता है। बोली नृत्य के द्वारा हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक जीवन, और लोक कथाओं को उजागर किया जाता है। इसके माध्यम से लोग अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को समझने और महसूस करने का अवसर प्राप्त करते हैं और समुदाय के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। बोली नृत्य हरियाणा की संवेदनशीलता, समृद्धि, और सांस्कृतिक गहराई का प्रतिनिधित्व करता है और इसे एक विशेष और महत्वपूर्ण नृत्य कला बनाता है। 3.तीला: तीला नृत्य, हरियाणा की एक अन्य प्रमुख लोक नृत्य कला है। यह नृत्य विशेष रूप से विवाह समारोहों में प्रस्तुत किया जाता है और इसमें पति-पत्नी एक साथ नृत्य करते हैं। तीला नृत्य में आधुनिक और पारंपरिक संगीत का प्रयोग होता है, जिसमें ढोल, ताशा, और अन्य लोक वाद्यों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। तीला नृत्य के दौरान, पति और पत्नी एक साथ नृत्य करते हैं और अपनी खुशियों का इजहार करते हैं। इसके माध्यम से वे अपने सामाजिक और सांस्कृतिक बंधनों को मजबूत करते हैं और समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। तीला नृत्य न केवल हरियाणा की संस्कृति को प्रस्तुत करता है, बल्कि इसके माध्यम से समुदाय के लोग अपने संबंधों को समझते हैं और समर्थ बनते हैं। यह नृत्य भावनात्मक और सामूहिक अनुभव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो हरियाणा की रोमांचक और उत्साहजनक सांस्कृतिक विरासत को व्यक्त करता है। 4.झूमर: झूमर नृत्य, हरियाणा की महत्वपूर्ण लोक नृत्य कलाओं में से एक है। यह नृत्य विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है और लोगों के द्वारा उत्सवों, समारोहों और अन्य सामाजिक उपलक्ष्यों में प्रस्तुत किया जाता है। झूमर नृत्य के दौरान, पुरुष और महिलाएं एक साथ नृत्य करते हैं और अपने पारंपरिक लोक संगीत के साथ संगीत के बीते गाते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से खुशी, उत्साह और समृद्धि का संदेश लेकर आता है। झूमर नृत्य के द्वारा हरियाणा की समृद्ध और अनुपम संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया जाता है। इसमें प्रकृति, परंपरा और सामाजिक बंधनों के महत्व को दिखाने का उद्देश्य होता है। झूमर नृत्य के माध्यम से सामुदायिक सांस्कृतिक संघर्षों को भी अभिव्यक्ति मिलती है और यह एक विशेष प्रकार का सामाजिक सांगीतिक संवाद होता है जो समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 5.खोड़िया: खोड़िया नृत्य, हरियाणा की विशेष प्रकार की लोक नृत्य कला है। यह नृत्य विशेष रूप से हरियाणा के महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और वे अपनी कला के माध्यम से कहानियों, कथाओं, और लोक विचारों को दर्शाती हैं। खोड़िया नृत्य के दौरान, महिलाएं अलग-अलग चरित्रों को निभाती हैं और अपने नृत्य के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश को संवहनात्मक रूप से प्रस्तुत करती हैं। इसमें नृत्य के साथ-साथ विशेष वेशभूषा का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है, जो नृत्य को और भी आकर्षक बनाता है। खोड़िया नृत्य के माध्यम से हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय गाथा-कथा, और सामाजिक संदेशों को संजीवनी मिलती है। इस नृत्य के