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Travel News: इंसान ही नहीं, भारत में इस जगह दी गई ‘पेड़ को समाधि’! एशिया के सबसे ऊंचे महावृक्ष की कहानी जान सैलानी भी रह जाते हैं हैरान

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Travel News देहरादून । हमारे देश को देवभूमि और रहस्यों की धरती कहा जाता है। खासकर उत्तराखंड के पहाड़ों में कदम-कदम पर ऐसी प्राचीन कहानियां और अनोखी परंपराएं बिखरी हुई हैं, जिन्हें सुनकर आधुनिक दुनिया के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। आपने आज तक महान संतों, राजाओं या वीरों की समाधि के बारे में तो खूब सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी किसी ‘पेड़ की समाधि’ के बारे में सुना है? Mahasu Devta Temple Hanol Travel Guide जी हां, उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के प्रसिद्ध हनोल में स्थित महासू देवता मंदिर (Mahasu Devta Temple) के पास एशिया के सबसे ऊंचे चीड़ के पेड़ यानी ‘महावृक्ष’ को पूरे आदर-सम्मान के साथ समाधि दी गई है। यह अनोखा स्थान अब देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और इतिहासकारों के लिए कौतूहल और आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र बन चुका है। आइए इस खूबसूरत ट्रैवल स्टोरी के जरिए जानते हैं इस अद्भुत पेड़ और इसकी समाधि का पूरा सच। Asia Tallest Chir Pine Tree Uttarakhand Travel News: 80 की उम्र में गजब का जज्बा! लद्दाख के 19 हजार फीट ऊंचे उमलिंग ला पास पहुंचीं दादी जी, युवाओं को मिला नया ट्रैवल गोल Travel News: एशिया का सबसे ऊंचा चीड़ का पेड़: कैसे बना ‘महावृक्ष’ उत्तराखंड के उत्तरकाशी और देहरादून जिले की सीमा पर स्थित टोंस वन प्रभाग (Tons Forest Division) के जंगलों में कभी एशिया का सबसे ऊंचा चीड़ का पेड़ (Chir Pine Tree) हुआ करता था। इस विशालकाय पेड़ को वन विभाग और स्थानीय लोग सम्मान से ‘महावृक्ष’ कहकर पुकारते थे। अविश्वसनीय ऊंचाई: इस महावृक्ष की ऊंचाई लगभग 60.65 मीटर (करीब 200 फीट) थी और इसका घेरा भी बेहद विशाल था। एशिया का गौरव: इस पेड़ का नाम आधिकारिक तौर पर एशिया के सबसे ऊंचे चीड़ के पेड़ के रूप में दर्ज था। दूर-दूर से ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमी सिर्फ इस एक पेड़ की भव्यता को निहारने के लिए पहाड़ों की खाक छाना करते थे। जब तूफान ने ढहाया कहर और शुरू हुई ‘समाधि’ की अनोखी कहानी साल 2007 में आए एक भीषण बर्फीले तूफान और तेज आंधी के कारण यह विशालकाय महावृक्ष जड़ से उखड़कर गिर गया। इस घटना से पूरे उत्तराखंड और खासकर स्थानीय जौनसार-बावर के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई, क्योंकि लोग इस पेड़ को केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और आस्था का एक जीवंत हिस्सा मानते थे। Unique Places to Visit in Uttarakhand, Tons Valley Touris आमतौर पर जब कोई पेड़ गिरता है, तो वन विभाग उसकी लकड़ी को बेच देता है या उसका इस्तेमाल कर लेता है। लेकिन इस ऐतिहासिक महावृक्ष के साथ ऐसा नहीं किया गया। स्थानीय लोगों की आस्था और इसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए वन विभाग और मंदिर समिति ने एक अनोखा फैसला लिया। इस विशालकाय पेड़ के अवशेषों को सुरक्षित रूप से हनोल लाया गया और प्रसिद्ध महासू देवता मंदिर परिसर के पास ही इसे ‘पेड़ की समाधि’ (Tree Samadhi) के रूप में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया गया। भारत के 10 सबसे पुराने Railway Station, जो आज भी History को ज़िंदा रखते हैं Travel News: महासू देवता मंदिर, जहां छिपा है आस्था का अनूठा संसार हनोल का महासू देवता मंदिर केवल इस समाधि के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी अद्वितीय वास्तुकला और चमत्कारों के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। जौनसार के आराध्य देव: महासू देवता को इस पूरे क्षेत्र का न्याय का देवता और शासक माना जाता है। यहाँ चार महासू भाइयों (बासिक, पिबासिक, बूठिया और चालदा) की पूजा की जाती है। अद्भुत मिश्रित शैली: यह मंदिर नागर और हूण वास्तुकला का एक बेहद खूबसूरत नमूना है। मंदिर के गर्भगृह में जलने वाली अखंड ज्योति और पत्थरों पर की गई नक्काशी को देखकर विदेशी सैलानी भी हैरान रह जाते हैं। अब मंदिर दर्शन के साथ-साथ इस ‘महावृक्ष की समाधि’ को देखना भी पर्यटकों के सफर का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। ट्रैवलर गाइड: हनोल और इस अनोखी समाधि को देखने कैसे पहुंचें? अगर आप भी पहाड़ों की इस अनसुनी और खूबसूरत कहानी को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं, तो अपनी यात्रा की तैयारी कुछ इस तरह करें: सड़क मार्ग (Road Route): हनोल देहरादून से लगभग 180 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप देहरादून, विकासनगर या मसूरी के रास्ते होते हुए बेहद खूबसूरत पहाड़ी रास्तों से होकर हनोल पहुंच सकते हैं। यहाँ के लिए नियमित बसें और टैक्सियां आसानी से मिल जाती हैं। मौसम का मजा (Best Time to Visit): हनोल की यात्रा के लिए मार्च से जून और फिर सितंबर से नवंबर तक का महीना सबसे बेहतरीन माना जाता है। इस दौरान मौसम बेहद सुहावना रहता है और टोंस नदी का नजारा देखते ही बनता है।