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Dilli Haat INA- जरूर देखें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की याद में बना ये म्यूजियम

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अगर आप इस वीकेंड दिल्ली घूमने का प्लान बना रहे हैं और दिल्ली की किसी यूनीक जगह या भीड़भाड़ से हटकर कुछ प्रेरणादायक देखना चाहते हैं, तो Dilli Haat INA के गेट नंबर 2 के पास स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल आपके लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल का उद्घाटन 30 जुलाई 2016 को किया गया था। यह मेमोरियल भारत के ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन से प्रेरित होकर बनाया गया है। इसी वजह से यहां आपको कलाम जी की सादगी और महानता की जीती-जागती मिसालें देखने को मिलती हैं। इसके साथ ही मेमोरियल में कलाम जी की कई निजी वस्तुएं और उनके द्वारा लिखे गए पत्र (लेटर्स) जैसी कई अहम चीजें भी देखने को मिलती हैं। तो आइए जानते हैं कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की कौन-सी निजी वस्तुएं इस मेमोरियल में रखी गई हैं और क्या खासियत है इस मेमोरियल की, जिसकी वजह से लोग इसे देखना पसंद करते हैं, और आखिर इसे दिल्ली हाट (INA) में ही क्यों बनाया गया। यह संग्रहालय दूसरे संग्रहालयों से क्यों अलग है? यह मेमोरियल दूसरे संग्रहालयों से इसलिए अलग है क्योंकि यहां आपको डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के पूरे जीवन की कहानी, या यूं कहें कि उनके जीवन की एक संक्षिप्त यात्रा देखने को मिलती है। यहां उनकी निजी वस्तुएं जैसे उनके जूते, चश्मा, कपड़े, पेन, यहां तक कि उनके इस्तेमाल किए गए बर्तन भी देखने को मिलते हैं। जिन लोगों के लिए कलाम जी एक प्रेरणा हैं, वे यहां आकर उन कई सवालों के जवाब पा सकते हैं, जो अक्सर उनके मन में होते हैं- जैसे कलाम जी किस तरह अपना जीवन व्यतीत करते थे या उन्हें कौन-सी चीजें ज्यादा पसंद थीं। अगर आप भी कलाम जी को अपना इंस्पिरेशन मानते हैं, तो यह संग्रहालय आपको जरूर विजिट करना चाहिए। इसके साथ ही इस संग्रहालय में आपको कुछ ऐसी बातें भी पता चलती हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। कलाम जी को संगीत का भी शौक था और वे एक बेहतरीन संगीतकार थे। इस मेमोरियल में उनकी पसंदीदा वीणा भी रखी गई है, जिसका वे अक्सर इस्तेमाल किया करते थे। मेमोरियल के फ्रंट में उनकी एक शानदार प्रतिमा लगी हुई है और दीवारों पर उनके लिखे हुए कोट्स और किताबों को बहुत ही खूबसूरत तरीके से प्रदर्शित किया गया है। इस मेमोरियल की थीम देखकर आपको रामेश्वरम की याद आ जाएगी, क्योंकि यहां का माहौल बिल्कुल साफ-सुथरा, शांत और सादगी से भरा हुआ है। सिर्फ मेमोरियल ही नहीं दिल्ली हाट और आस पास की जगहों को भी एक्सप्लोर करें क्योंकि यह मेमोरियल दिल्ली हाट के अंदर ही स्थित है, इसलिए यहां आपको एक ही जगह पर कई डेस्टिनेशन एक्सप्लोर करने का मौका मिल जाता है। अगर आप डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेमोरियल देखने जा रहे हैं, तो दिल्ली हाट (INA) में आप अलग-अलग राज्यों के फूड कोर्ट का मज़ा ले सकते हैं और साथ ही हस्तशिल्प की खरीदारी भी कर सकते हैं। इसके अलावा, अगर आप दिल्ली की और जगहें एक्सप्लोर करना चाहते हैं, तो इस इलाके के 2–3 किलोमीटर के दायरे में ही लोधी गार्डन और सफदरजंग का मकबरा जैसी मशहूर जगहें भी देखी जा सकती हैं। दिल्ली सरकार ने इस जगह को सिर्फ एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में विकसित किया है, जहां आपको पूरे भारत की संस्कृति, खान-पान और कला देखने को मिलती है। पर्यटकों के लिए जरूरी जानकारी यह मेमोरियल सुबह 11:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है, जबकि सोमवार को बंद रहता है। यहां पहुंचने के लिए सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन INA है, जो पिंक लाइन पर स्थित है। मेट्रो स्टेशन से यह मेमोरियल पैदल दूरी पर ही मौजूद है। इस मेमोरियल को देखने के लिए अलग से कोई टिकट लेने की आवश्यकता नहीं होती। जब आप दिल्ली हाट (INA) का टिकट लेते हैं, उसी टिकट के जरिए आप इस मेमोरियल में भी प्रवेश कर सकते हैं। Written by Shivani Pal

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ट्रैवल अलर्ट 2026 में इन देशों में घूमने का प्लान बनाने से बचें!

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साल 2026 में दुनिया के हालात तेजी से बदल रहे हैं। कहीं गृहयुद्ध चल रहा है, कहीं राजनीतिक अस्थिरता है, तो कहीं आतंकवादी गतिविधियां बढ़ गई हैं। ऐसे में विदेश घूमने का प्लान बनाते समय सिर्फ बजट या जगह की खूबसूरती नहीं, बल्कि सबसे पहले सुरक्षा को देखना जरूरी है। कुछ देश ऐसे हैं जहां हालात इतने खराब हैं कि वहां जाना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए इस साल अगर आप इंटरनेशनल ट्रैवल का सोच रहे हैं, तो नीचे दिए गए देशों के बारे में जरूर जान लें। बेहद खतरनाक क्षेत्र इन देशों में अभी हालात काफी खराब चल रहे हैं। कहीं लड़ाई-झगड़ा हो रहा है, कहीं गोलीबारी और हिंसा का माहौल है। वहां लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी ठीक से नहीं चल पा रही, क्योंकि कभी भी कुछ भी हो सकता है। ऐसे में अगर कोई पर्यटक वहां घूमने जाए, तो उसकी सुरक्षा की कोई पक्की गारंटी नहीं होती। मतलब साफ है कि वहां जाना इस समय बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है और जान-माल का खतरा बना रह सकता है। आईए जानते हैं कौन-कौन सी वह देश है जहां में जान का खतरा हो सकता है। अफगानिस्तान अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद से हालात बहुत ज्यादा सख्त और अनिश्चित हो गए हैं। यहां नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित हैं और कई इलाकों में अचानक हमले होने का खतरा बना रहता है। विदेशी नागरिकों के लिए यह जगह और भी ज्यादा जोखिमभरी है क्योंकि यहां अपहरण, गिरफ्तारी और निगरानी जैसी घटनाओं का डर रहता है। इसलिए अगर आप घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो अफगानिस्तान को 2026 में अपनी लिस्ट से दूर ही रखें। सूडान सूडान में सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच भयानक गृहयुद्ध चल रहा है, जिससे देश का बुनियादी ढांचा बुरी तरह टूट चुका है। कई जगहों पर अस्पताल, सड़कें, बिजली-पानी जैसी सुविधाएं तक प्रभावित हो गई हैं और सुरक्षा व्यवस्था लगभग खत्म हो चुकी है। ऐसे हालात में वहां जाना बेहद खतरनाक हो सकता है क्योंकि किसी भी समय हिंसा बढ़ सकती है और आम लोगों के साथ पर्यटक भी फंस सकते हैं। यमन यमन कई सालों से संघर्ष, विद्रोह और मानवीय संकट से जूझ रहा है, जिस कारण यह दुनिया के सबसे असुरक्षित देशों में गिना जाता है। यहां विद्रोही गतिविधियां और क्षेत्रीय तनाव लगातार बने हुए हैं, जिससे यात्रा करना जोखिम भरा हो जाता है। कई इलाकों में सड़क और हवाई यात्रा दोनों ही सुरक्षित नहीं मानी जातीं और पर्यटकों के लिए खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है, इसलिए इस देश में घूमने का प्लान बनाना फिलहाल ठीक नहीं है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के कुछ हिस्सों में हिंसा, विद्रोही गतिविधियां और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की स्थिति बनी रहती है। यहां कई जगहों पर कानून-व्यवस्था कमजोर है, जिसके कारण लूटपाट, हिंसा और अपहरण जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। अगर आप अफ्रीका यात्रा का सोच रहे हैं तो इस देश को अभी टाल देना ही बेहतर रहेगा, क्योंकि यहां सुरक्षा जोखिम बहुत ज्यादा है। वेनेजुएला वेनेजुएला में 2026 के दौरान राजनीतिक तनाव काफी बढ़ा हुआ है और हालात कई बार अचानक बिगड़ जाते हैं। यहां आंतरिक अस्थिरता के कारण हिंसक अपराध, अपहरण और विदेशी नागरिकों को गलत तरीके से हिरासत में लेने जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। इसलिए अगर आप विदेश यात्रा का प्लान कर रहे हैं, तो वेनेजुएला को इस समय टालना ज्यादा सुरक्षित रहेगा। हैती हैती में हालात बहुत खराब हो चुके हैं क्योंकि यहां कई इलाकों में गिरोहों का नियंत्रण बढ़ गया है और कानून-व्यवस्था लगभग टूट चुकी है। राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में हिंसा, लूटपाट और असुरक्षा का माहौल बना रहता है, जिससे आम लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में वहां घूमने जाना समझदारी नहीं होगी। म्यांमार और पाकिस्तान म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद से हालात लगातार बिगड़े हैं और कई जगहों पर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है, जिससे वहां यात्रा करना जोखिमभरा हो जाता है। वहीं पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के साथ सीमावर्ती इलाकों में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने के कारण सुरक्षा जोखिम बढ़ गया है, इसलिए इन दोनों देशों में जाने से पहले बहुत सावधानी बरतना जरूरी है और गैर-जरूरी यात्रा से बचना बेहतर है। रूस और बेलारूस रूस और बेलारूस में यूक्रेन युद्ध के कारण माहौल काफी संवेदनशील है और कई कड़े नियम लागू हैं। यहां विदेशी पर्यटकों के लिए परेशानी यह है कि स्थानीय कानून बहुत सख्त हैं और कई बार विदेशी नागरिकों को मनमाने ढंग से हिरासत में लेने या जासूसी जैसे आरोपों में फंसाने का खतरा बताया जाता है। ऐसे में 2026 में इन देशों की यात्रा करने से पहले सुरक्षा स्थिति को अच्छी तरह जांचना जरूरी है। ईरान और लेबनान ईरान और लेबनान में क्षेत्रीय तनाव बढ़ता जा रहा है और कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अस्थिरता भी देखी जा रही है। इजरायल से जुड़े तनाव के कारण भी हालात और ज्यादा बिगड़ने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में इन देशों में यात्रा करना जोखिमभरा हो सकता है, इसलिए यहां जाने से पहले पूरी तरह जांच-पड़ताल करना जरूरी है। यात्रा से पहले जरूरी सलाह किसी भी देश में घूमने का प्लान बनाने से पहले भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की ताजा यात्रा सलाह जरूर देखें, क्योंकि कई बार हालात अचानक बदल जाते हैं। सुरक्षा से जुड़ी जानकारी लेकर ही ट्रैवल करना समझदारी है, ताकि आपकी यात्रा मजेदार भी रहे और सुरक्षित भी।

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2026 से जापान का वीजा हो सकता है महंगा! 48 साल बाद बदलने जा रहे नियम, भारतीय होंगे प्रभावित

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अगर आपका भी मन है कि 2026 में जापान घूमने जाएंगे, टोक्यो की चमकती सड़कों पर घूमना, बुलेट ट्रेन का मजा लेना, पुराने मंदिर देखना और माउंट फूजी के सामने फोटो क्लिक करना.. तो अब आपको एक जरूरी अपडेट जरूर जान लेनी चाहिए। जापान सरकार अपने वीजा नियमों और फीस में बदलाव करने जा रही है। मतलब साफ है आने वाले समय में जापान ट्रिप का बजट थोड़ा बढ़ सकता है। भारतीय यात्रियों पर भी इसका असर पड़ने वाला है, इसलिए अगर आप जापान जाने की सोच रहे हैं तो ये जानकारी आपके लिए बहुत काम की है। 48 साल बाद क्यों बढ़ रही है जापान की वीजा फीस? जापान ने आखिरी बार साल 1978 में अपनी वीजा फीस में बदलाव किया था। यानी लगभग 48 सालों से फीस वही चल रही थी। लेकिन अब जापान में टूरिस्ट की भीड़ बहुत तेजी से बढ़ रही है और सरकार का मैनेजमेंट खर्च भी पहले से ज्यादा हो गया है। इसी वजह से जापान सरकार अब वीजा फीस बढ़ाने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जापान अपनी वीजा फीस को G7 और OECD जैसे विकसित देशों के लेवल पर लाने का प्लान कर रहा है। आसान भाषा में कहें तो जापान अब वीजा को पहले जैसा सस्ता नहीं रखना चाहता, और 2026 से फीस बढ़ने के पूरे चांस हैं। अभी कितनी फीस लगती है और 2026 में क्या बदलाव हो सकता है? अभी तक जापान का वीजा भारतीयों के लिए ज्यादा महंगा नहीं माना जाता। फिलहाल वीजा फीस करीब ₹500 के आसपास है और इसके अलावा VFS का सर्विस चार्ज लगभग ₹800 तक लगता है। लेकिन 2026 से ये खर्च बढ़ सकता है और लोगों को वीजा के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ सकते हैं। हालांकि अभी तक सरकार ने ये फाइनल नहीं बताया है कि नई फीस कितनी होगी, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि खर्च पहले से ज्यादा होगा। अधिकारियों का कहना है कि फीस बढ़ने के बावजूद टूरिस्ट की दिलचस्पी कम नहीं होगी, क्योंकि जापान अभी भी दुनिया की सबसे पसंदीदा ट्रैवल डेस्टिनेशन में से एक है। भारतीय यात्रियों के पास अभी कौन-कौन से वीजा ऑप्शन हैं? भारत से जापान जाने वाले यात्रियों के लिए इस समय दो तरीके के वीजा ऑप्शन मौजूद हैं। पहला है स्टिकर वीजा, जिसमें पासपोर्ट पर वीजा लगाया जाता है और आवेदन VFS Global के जरिए होता है। दूसरा ऑप्शन है ई-वीजा, जो डिजिटल वीजा होता है और इसमें पासपोर्ट पर स्टिकर की जरूरत नहीं पड़ती। ऑनलाइन प्रक्रिया होने की वजह से ई-वीजा वाला तरीका लोगों को ज्यादा आसान लग रहा है, इसलिए ये ऑप्शन तेजी से पॉपुलर हो रहा है। जापान का टूरिस्ट वीजा कौन ले सकता है? अगर आप जापान घूमने जा रहे हैं तो कुछ बेसिक शर्तें पूरी करना जरूरी है। सबसे पहले आपके पास वैध भारतीय पासपोर्ट होना चाहिए और आपकी यात्रा का मकसद केवल पर्यटन होना चाहिए। जापान में टूरिस्ट वीजा पर जाकर किसी भी तरह का पेड काम करना मना है। इसके अलावा आमतौर पर यात्रा हवाई मार्ग से ही होती है और जापान में ठहरने की अधिकतम अवधि 90 दिन तक सीमित रहती है। यानी ये वीजा सिर्फ घूमने-फिरने के लिए होता है, काम या कमाई के लिए नहीं। जापान वीजा के लिए कौन-कौन से कागज जरूरी होते हैं? जापान वीजा के लिए डॉक्यूमेंट्स सही और पूरे होने चाहिए, वरना आवेदन अटक सकता है। आमतौर पर वैध पासपोर्ट, नई पासपोर्ट साइज फोटो, यात्रा का उद्देश्य बताने वाला कवर लेटर, आने-जाने की कन्फर्म टिकट और होटल बुकिंग या ठहरने का प्रमाण मांगा जाता है। इसके साथ ही आपकी फाइनेंशियल स्थिति दिखाने वाले डॉक्यूमेंट भी जरूरी होते हैं ताकि यह साबित हो सके कि आप अपना खर्च खुद उठा सकते हैं। कई मामलों में पिछले दो साल का इनकम टैक्स रिटर्न या फिर पिछले छह महीने की सैलरी स्लिप भी मांगी जाती है। आवेदन कैसे करें और वीजा कितने दिन में मिल जाता है? भारत में जापान का वीजा ज्यादातर मामलों में VFS Global के जरिए ही अप्लाई किया जाता है। चेन्नई और बेंगलुरु को छोड़कर बाकी शहरों में कई बार पहले से अपॉइंटमेंट लेना जरूरी नहीं होता। आवेदन जमा करने के बाद आमतौर पर 5 दिनों के अंदर वीजा मिल जाता है। कई बार प्रोसेस इतना तेज होता है कि 48 घंटे के अंदर भी वीजा मिल जाता है, लेकिन ये आपके डॉक्यूमेंट्स और वेरिफिकेशन पर भी निर्भर करता है। ई-वीजा मिला है तो ये बात याद रखना जरूरी है अगर आपके पास जापान का ई-वीजा है तो एयरपोर्ट पर एक गलती बिल्कुल मत करना। बहुत से लोग सोचते हैं कि ई-वीजा का स्क्रीनशॉट या PDF दिखाकर काम चल जाएगा, लेकिन जापान में ऐसा नहीं होता। चेक-इन और इमिग्रेशन के समय आपको ऑफिशियल पोर्टल पर लॉग इन करके लाइव डिजिटल वीजा दिखाना पड़ता है। इसमें एक बारकोड और वैधता से जुड़ा काउंटडाउन टाइमर भी होता है, जिससे इमिग्रेशन अधिकारी वीजा की स्थिति और पहचान कन्फर्म करते हैं। इसलिए अगर ई-वीजा है तो इंटरनेट और लॉगिन डिटेल्स तैयार रखना बहुत जरूरी है। 2026 में जापान जाने वालों के लिए सलाह अगर आप 2026 में जापान जाने का प्लान बना रहे हैं तो सबसे पहले बजट बनाते समय ये मानकर चलिए कि वीजा का खर्च पहले से ज्यादा हो सकता है। इसलिए पैसे का हिसाब उसी हिसाब से रखें। डॉक्यूमेंट्स पहले से तैयार रखें ताकि आखिरी समय पर भागदौड़ न करनी पड़े। अगर आप ई-वीजा लेने वाले हैं तो एयरपोर्ट पर किसी परेशानी से बचने के लिए पोर्टल लॉगिन, पासवर्ड और इंटरनेट की व्यवस्था पहले से कर लें। कुल मिलाकर जापान की ट्रिप थोड़ी महंगी जरूर हो सकती है, लेकिन अगर आपने सही टाइम पर तैयारी कर ली तो आपकी यात्रा बिल्कुल आराम से और बिना टेंशन के हो जाएगी।

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Surajkund Mela 2026: 39वां सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट फेस्टिवल, मिस्र बनेगा Partner Nation

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हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित सूरजकुंड एक बार फिर रंग-बिरंगी संस्कृति, लोककला और देश-विदेश के हस्तशिल्प से गुलजार होने जा रहा है। दरअसल, 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट फेस्टिवल 2026 का आयोजन इस बार 31 जनवरी 2026 से 15 फरवरी 2026 तक किया जाएगा। यह मेला हर साल देशभर के पर्यटकों और कला प्रेमियों को आकर्षित करता है, क्योंकि यहां एक ही जगह पर आपको भारत की विविध संस्कृति, पारंपरिक कारीगरी, लोकनृत्य, संगीत और स्वादिष्ट व्यंजनों का शानदार मेल देखने को मिलता है। (Surajkund Mela 2026) इस बार भी मेला पहले से ज्यादा भव्य होने की उम्मीद है, जिसमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ दिल्ली-एनसीआर और देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों लोग पहुंचेंगे। उद्घाटन 31 जनवरी को, उपराष्ट्रपति करेंगे शुभारंभ मेले को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार इसका उद्घाटन 31 जनवरी को भारत के उप-राष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन करेंगे। उद्घाटन समारोह के बाद यह मेला पूरे 16 दिनों तक चलेगा, जहां हर दिन कुछ नया और खास देखने को मिलेगा। Surajkund Mela 2026 टाइमिंग: सुबह 10 बजे से शाम तक खुला रहेगा समय की बात करें तो यह मेला आम तौर पर सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक आगंतुकों के लिए खुला रहेगा। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि कुछ दिनों में मेले की टाइमिंग बढ़ाकर रात 8:30 या 10 बजे तक की जा सकती है। यही वजह है कि अगर आप दूर से जा रहे हैं तो वहां पहुंचने से पहले एक बार अपडेट जरूर देख लें ताकि घूमने में कोई परेशानी न हो। मिस्र बना Partner Nation, दिखेगी प्राचीन कला और संस्कृति की झलक इस बार सूरजकुंड मेले की पहचान को और इंटरनेशनल बनाने के लिए मिस्र (Egypt) को Partner Nation बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि इस बार मिस्र की पारंपरिक कला, वहां की संस्कृति और प्राचीन विरासत की झलक सूरजकुंड मेले में देखने को मिलेगी। मिस्र अपने यूनिक आर्टवर्क, क्राफ्ट और कल्चरल प्रेजेंटेशन के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, ऐसे में मेले में मिस्र की भागीदारी लोगों के लिए खास आकर्षण रहने वाली है। Surajkund Mela 2026 Theme State यूपी-मेघालय इस बार उत्तर प्रदेश और मेघालय को Theme State के रूप में चुना गया है। उत्तर प्रदेश अपने शिल्प और हस्तकला के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है, और इस बार वहां के ODOP यानी ‘एक जिला एक उत्पाद’ की झलक मेले में साफ नजर आएगी। फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां हों या लखनऊ की चिकनकारी, यूपी की कई खासियतें यहां देखने और खरीदने को मिलेंगी। वहीं मेघालय अपनी लोकसंस्कृति, पारंपरिक वस्त्र और अनोखे क्राफ्ट के जरिए मेले को और रंगीन बनाएगा। स्टॉल, देश-विदेश के शिल्पकार होंगे शामिल- Surajkund Mela 2026 सूरजकुंड मेला 2026 में इस बार 1200 से ज्यादा स्टॉल लगाए जाने की तैयारी है, जिनमें भारत के अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विदेशों से आए कारीगर भी शामिल होंगे। यहां पर आपको सिर्फ खरीदारी ही नहीं, बल्कि हर चीज के पीछे छिपी मेहनत और कला भी देखने को मिलेगी। बहुत सारे स्टॉल पर कारीगर मौके पर ही लाइव डेमो देकर दिखाते हैं कि कैसे मिट्टी के बर्तन बनते हैं, कैसे लकड़ी पर नक्काशी होती है, कैसे हाथ से कपड़ा बुना जाता है या फिर कैसे ट्रेडिशनल ज्वेलरी तैयार की जाती है। यही वजह है कि यह मेला सिर्फ एक बाजार नहीं बल्कि एक सीखने वाला अनुभव भी बन जाता है। यहां हैंडलूम कपड़े, एथनिक ड्रेस, होम डेकोर आइटम, हैंडमेड ज्वेलरी, पेंटिंग्स, मिट्टी और लकड़ी से बनी चीजें, ट्रेडिशनल आर्ट पीस और कई तरह के सजावटी सामान बेहद अच्छे दामों में मिल जाते हैं। हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम, बड़े कलाकारों की प्रस्तुति की चर्चा मेले में खरीदारी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हर दिन लोगों का ध्यान खींचते हैं। खासकर मुख्य चौपाल पर हर शाम रंगारंग प्रस्तुतियां होती हैं, जहां लोकनृत्य, लोकगीत और अलग-अलग राज्यों की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। इस बार चर्चा है कि कैलाश खेर, गुरदास मान और महाबीर गुड्डू जैसे बड़े कलाकार भी प्रस्तुति दे सकते हैं, जिससे मेले का माहौल और भी ज्यादा धमाकेदार हो जाएगा। ऐसे कार्यक्रमों की वजह से सूरजकुंड मेला फैमिली के लिए एक परफेक्ट आउटिंग स्पॉट बन जाता है, क्योंकि यहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई एंटरटेनमेंट का मजा ले सकता है। फूड कोर्ट में मिलेगा देश-विदेश का स्वाद खाने-पीने की बात करें तो सूरजकुंड मेला 2026 फूड लवर्स के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। मेले के फूड कोर्ट में भारत के अलग-अलग राज्यों के स्वाद एक ही जगह मिल जाते हैं। यहां राजस्थानी दाल बाटी चूरमा जैसी पारंपरिक डिश से लेकर पंजाबी छोले भटूरे जैसे फेमस स्ट्रीट फूड तक सब कुछ मिलेगा। इसके अलावा कई तरह के स्नैक्स, मिठाइयां और चटपटे आइटम भी मिलते हैं, जो मेले का मजा दोगुना कर देते हैं। इसके साथ ही इस बार इंटरनेशनल फूड ऑप्शन भी मौजूद रहेंगे, जिससे जो लोग अलग-अलग देशों का स्वाद ट्राय करना चाहते हैं, उनके लिए ये एक अच्छा मौका रहेगा। बच्चों-युवाओं के लिए झूले, गेम्स और एडवेंचर मनोरंजन के मामले में भी यह मेला पीछे नहीं है। युवाओं और बच्चों के लिए यहां एम्यूजमेंट एरिया में झूले, गेम्स और एडवेंचर एक्टिविटीज मौजूद रहेंगी। जो लोग फैमिली के साथ जाते हैं, उनके लिए यह एक ऐसा स्थान बन जाता है जहां शॉपिंग, फूड और एंटरटेनमेंट तीनों चीजें एक साथ मिल जाती हैं। टिकट की कीमत अब बात करें टिकट की तो सूरजकुंड मेला 2026 के लिए टिकट की कीमत वीकडेज यानी सप्ताह के दिनों में करीब ₹120 और वीकेंड यानी शनिवार-रविवार को करीब ₹180 रहने की उम्मीद है। टिकट को आप ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं और मेले के एंट्री काउंटर से भी ले सकते हैं। इसके अलावा कई लोग DMRC ऐप के जरिए भी टिकट खरीदते हैं, जिससे लाइन में लगने की झंझट कम हो जाती है। जानकारी के मुताबिक वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और छात्रों के लिए कुछ विशेष छूट भी उपलब्ध हो सकती है। कैसे पहुंचें सूरजकुंड मेला? मेट्रो-बस-फ्लाइट से आसान रास्ता अगर आप सोच रहे हैं कि सूरजकुंड मेला कैसे पहुंचें तो इसका रास्ता काफी आसान है। मेट्रो से जाने वालों के लिए सबसे नजदीकी स्टेशन बदरपुर (Violet Line) बताया जाता है, जहां

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Eco Tourism क्या है इको-टूरिज़्म? होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन!

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अगर आप शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और शोर से परेशान हो चुके हैं और आपका मन शहर से दूर कहीं शांत, हरी-भरी जगह पर जाने का करता है जहां आपको शहर के अशांत माहौल के मुकाबले थोड़ा सुकून मिल सके। तो इको-टूरिज़्म आपके लिए बिल्कुल सही चीज़ है। इको-टूरिज़्म का मतलब सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि उन जगहों पर जाना है जहाँ आप एनवायरनमेंट को बिना नुकसान पहुँचाए मज़ा लेते हैं और साथ ही गाँव के लोगों की रोज़ी-रोटी बढ़ाने में भी मदद करते हैं। यह ऐसा तरीका है जिससे नेचर भी बची रहती है और गाँव वाले भी कमाई कर लेते हैं जिससे दोनों का फायदा होता है। Eco Tourism गाँव की संस्कृति- Eco Tourism इको-टूरिज़्म का सीधा सा मतलब है नेचर के बीच घूमना, पर इस यात्रा के दौरान कुछ बातों का खास ध्यान रखना होता है जैसे जंगल, पहाड़, झरने या किसी भी गाँव में जाएँ तो वहाँ गंदगी न करें, कचरा इधर-उधर न फेंकें, पानी-बिजली बेवजह खराब न करें और जो भी स्थानीय नियम हों, उन्हें मानें। इसके साथ गाँव वालों की संस्कृति, उनका खाना-पीना, पहनावा और रीति-रिवाज़ को भी सम्मान दें। ऐसी यात्राओं में न केवल आपको शहर के अशांत माहौल से छुटकारा मिलेगा बल्कि गांव वालों को भी रोजगार मिलेगा। साफ हवा, शांति, नेचर का मजा यही तो इन गांवों की खासियत होती है। गांव वालों होमस्टे चला कर, गाइड बनकर, लोकल खाना खिलाकर या अपने हाथ के बनाए सामान को बेचकर ये लोग अपनी कमाई करते है। इसलिए इको-टूरिज़्म नेचर को भी बचाता है और गाँव वालों की जेब भी मजबूत करता है। मतलब मज़ा भी पूरा और भलाई भी पूरी। उत्तराखंड का होमस्टे मॉडल: महिलाएँ बदल रहीं अपनी दुनिया उत्तराखंड का होमस्टे मॉडल सच में एक ऐसी कहानी है जहाँ गाँव की महिलाएँ अपनी ज़िंदगी खुद बदल रही हैं। मुनस्यारी के पास सरमोली गाँव में 2004 में मल्लिका विर्दी ने हिमालयन आर्क होमस्टे कार्यक्रम शुरू किया, और खास बात ये है कि पूरा होमस्टे सिस्टम गाँव की महिलाएँ ही संभालती हैं। यहाँ आने वाले मेहमान मडुआ की रोटी, पहाड़ी राजमा जैसे बिल्कुल देसी और स्वादिष्ट खाने का मज़ा लेते हैं, खेतों में मदद करते हैं और गाँव की असली ज़िंदगी को करीब से महसूस करते हैं। इस मॉडल से सरमोली की महिलाएँ साल में करीब 1.5 लाख रुपये तक कमा लेती हैं, जो उनके लिए बहुत बड़ी बात है और इससे उनकी पहचान और आत्मविश्वास दोनों बढ़े हैं। राज्य सरकार ने भी ‘दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे योजना’ के ज़रिए पुराने पहाड़ी घरों को लकड़ी और पत्थर से बने सुंदर, पारंपरिक होमस्टे में बदलने में मदद की है। सरकार ट्रेनिंग, लोन और मार्केटिंग का पूरा सपोर्ट देती है, और आज लगभग 5,000 घर इस योजना से जुड़ चुके हैं। इससे गाँव में रोजगार बढ़ा है और लोग शहरों की ओर कम जा रहे हैं, क्योंकि अब उन्हें अपने ही गाँव में अच्छी कमाई का मौका मिल रहा है। इको-स्टे: नेचर के बीच एक ‘ग्रीन’ ठहराव Eco Tourism इको-स्टे असल में ऐसे ठहरने की जगह होती हैं, जहाँ आप नेचर के बीच आराम से रहते हैं और साथ ही पर्यावरण का ख्याल भी रखते है। यहाँ ज़्यादातर बिजली सोलर से आती है, बारिश का पानी इकट्ठा करके इस्तेमाल किया जाता है, और घर भी मिट्टी, लकड़ी या दूसरे इको-फ्रेंडली तरीक़े से बनाए जाते हैं। कचरा अलग करके कम्पोस्ट बनाया जाता है, पानी दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है मतलब हर काम सोच-समझकर किया जाता है। जैसे जिम कॉर्बेट के पास क्यारी गाँव में बने इको-स्टे बिल्कुल पुराने पहाड़ी घरों की तरह दिखते हैं। यहाँ रहने पर आप शांत माहौल का मज़ा लेते हैं, जंगल सफारी और एडवेंचर एक्टिविटी भी कर सकते हैं। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है जैसे आप नेचर की गोद में आराम कर रहे हों। क्यारी गाँव की चुनौती: इको-टूरिज़्म और बाघों का संघर्ष क्यारी गाँव का इलाका अपनी खूबसूरती की वजह से और भी खास बन जाता है। क्योंकि जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व बिलकुल पास में होने से यहाँ का जंगल घना है, हवा बिल्कुल ताज़ा लगती है और वाइल्डलाइफ़ का असली मज़ा मिलता है। यहाँ बाघों की अच्छी-खासी संख्या मिलती है, जो ये दिखाता है कि जंगल कितना हेल्दी और समृद्ध है। इसी वजह से क्यारी और उसके आस-पास का इलाका नेचर और वाइल्डलाइफ़ पसंद करने वालों के लिए एकदम परफेक्ट जगह है। यहाँ कई बढ़िया इको-स्टे और रिसॉर्ट भी बने हुए हैं, जो जिम कॉर्बेट के नेचर वाइब से मैच करते हैं लकड़ी और पत्थर के कमरे, चारों तरफ हरियाली, पंछियों की आवाज़ें और पूरा शांत माहौल सब मिलकर स्टे का अनुभव और भी खास बना देते हैं। गाँव वाले इको-टूरिज़्म को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें होमस्टे, लोकल गाइड, खेती और कारीगरी जैसे कामों में अच्छी कमाई मिलती है। लोग चाहते हैं कि इको-टूरिज़्म बढ़े, लेकिन ऐसे कि जंगल भी सुरक्षित रहे और गाँव वालों की खुशी और रोज़गार भी बना रहें। राष्ट्रीय रणनीति: ग्रामीण होमस्टे को बढ़ावा भारत सरकार भी अब ग्रामीण इको-टूरिज़्म को बढ़ावा देने में लगी है। कोशिश ये है कि गाँवों में बने होमस्टे भी पर्यटन का बड़ा हिस्सा बनें और वहाँ के लोगों को अच्छा रोज़गार मिले। सरकार चाहती है कि होमस्टे चलाने वालों को बिजली-पानी की वही दरें मिलें जो सामान्य घरों को मिलती हैं, ताकि उनका खर्च कम हो सके। NIDHI पोर्टल के ज़रिए हर होमस्टे की एक डिजिटल पहचान बनाई जा रही है, जिससे ऑनलाइन बुकिंग भी आसान हो जाएगी। आखिर में बात यही है कि इको-टूरिज़्म तभी सफल है जब तीनों चीज़ें एक साथ खुश रहें प्रकृति सुरक्षित रहे, गाँव वालों की कमाई और रोजगार बढ़े और पर्यटकों को अच्छा अनुभव मिले। क्यारी गाँव जैसी जगहें यही दिखाती हैं कि इको-टूरिज़्म सिर्फ कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि एक संतुलन है जहाँ नेचर, लोग और टूरिज़्म तीनों को बराबर महत्व दिया जाता है। अगर ये बैलेंस बना रहे, तो ग्रामीण भारत में इको-टूरिज़्म सच में कमाल कर सकता है।

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जहाँ आस्था मिलती है आज़ादी से वही तो है -Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – Gwalior

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ग्वालियर मध्य प्रदेश के दिल में बसा यह शहर जितना आधुनिक है, उतना ही प्राचीन कथाओं, राजसी गाथाओं और अनगिनत आध्यात्मिक अनुभवों से भरा हुआ हैं। लेकिन इस शहर का सबसे चमत्कारी रत्न है ग्वालियर का किला, जो ग्वालियर की एक ऊँची चट्टान पर शान से खड़ा है और यही तो वो किला है जिसे मुगल सम्राट बाबर ने “हिन्द के किलों में मोती” कहा था। किले की घुमावदार चढ़ाई, हवा का तेज़ बहाव, और ऊपर पहुँचकर खुलते विशाल आसमान का दृश्य यह सब मिलकर आपको किसी और समय में ले जाता है। और जब इन्हीं किले की दीवारों के बीच अचानक आपको सफेद संगमरमर से दमकता गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़ साहिब नज़र आता है, तो लगता है जैसे पूरी यात्रा किसी पवित्र मोड़ पर आकर ठहर गई हो। यह सिर्फ गुरुद्वारा नहीं बल्कि यह तो मुक्ति की कहानी, न्याय की विजय, और करुणा की शक्ति का ऐसा प्रतीक है, जिसे महसूस किए बिना इस जगह को समझा नहीं जा सकता। (Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – Gwalior) Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – वीरता और मुक्ति की कथा गुरु हरगोबिंद साहिब जी को ‘दाता बन्दी छोड़’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी खुद की रिहाई से पहले ग्वालियर किले में बंद 52 राजाओं को आज़ाद करवाया था। उनके बड़े दिल, दया और समझदारी ने उन्हें “कैदियों का दाता” बना दिया। यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि इंसानियत और करुणा की ऐसी मिसाल है जिसे जानकर आज भी हर कोई प्रभावित हो जाता है। 1606 में अपने पिता गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद वे बहुत छोटी उम्र में गुरु बने और उन्होंने ‘मीरी-पीरी’ यानी धर्म और शक्ति दोनों को साथ लेकर चलने की परंपरा शुरू की। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर मुगल बादशाह जहाँगीर ने उन्हें ग्वालियर किले में कैद कर दिया, और गुरु जी ने इसे ईश्वर की परीक्षा मानकर शांति से स्वीकार कर लिया। गुरु जी कई सालों तक इसी किले में रहे| पर एक रोज जब जहांगीर की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई और वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा, तो उसे इस हालत में देखकर उसकी पत्नी नूरजहां बहुत दुखी होने लगी। और तभी उसने एक फकीर से इसके पीछे का कारण पूछा। फकीर ने बताया कि जहांगीर ने सिखों के धर्मगुरु गुरु हरगोविंद जी को कैद कर रखा है, और अगर उन्हें जल्द रिहा नहीं किया गया तो बादशाह के पूरे कुल पर संकट आ सकता है। यह सुनकर नूरजहां डर गई और उसने सारी बात जाकर जहांगीर को बताई। जैसे ही जहांगीर को यह बात पता चली, उसने तुरंत गुरु हरगोविंद जी को रिहा करने का आदेश दे दिया। लेकिन जब यह संदेश गुरु जी तक पहुँचा, तो उन्होंने अकेले बाहर आने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा—”मेरे साथ जो 52 राजा कैद हैं, अगर उन्हें आज़ाद किया जाए तभी मैं बाहर जाऊंगा।” जहांगीर ने गुरु की बात तो मान ली पर एक शर्त रख दी कि गुरु जी के साथ वही राजा बाहर जा सकेंगे, जो गुरु जी की चोला (पोशाक) के किसी एक छोर को पकड़ेंगे। यह सुनकर गुरु जी ने 52 छोरों वाला एक खास चोला बनवाया। हर एक राजा ने एक छोर पकड़ा और इस तरह सभी 52 राजा गुरु जी के साथ जेल से बाहर निकल आए। यह घटना इस बात की मिसाल है कि कभी-कभी आज़ादी तलवार से नहीं, बल्कि बुद्धि, करुणा और सही सोच से मिलती है। Gurdwara Data Bandi Chor Sahib : एक पवित्र विरासत गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़ साहिब ग्वालियर किले की ऊँचाई पर बना ऐसा स्थान है, जहाँ पहुँचते ही मन खुद-ब-खुद शांत हो जाता है। पहले यह जगह सिर्फ एक साधारण संगमरमर का चबूतरा थी, लेकिन 1970–80 के दशक में इसे आज जैसा सुंदर गुरुद्वारा परिसर बनाया गया। चमकता हुआ सफेद संगमरमर, बड़ा सा शांत हॉल, भव्य दरबार साहिब और हवा में लगातार गूँजता कीर्तन—सब मिलकर इस जगह को बेहद खास बना देते हैं। ऊपर से पूरे ग्वालियर शहर का शानदार नज़ारा भी दिखाई देता है। किले की भीड़भाड़ से निकलकर जैसे ही आप गुरुद्वारे में कदम रखते हैं, तो ऐसा लगता है कि एकदम से माहौल बदल गया हवा भी धीमी हो जाती है और मन को एक अनोखी शांति महसूस होती है। बन्दी छोड़ दिवस- रोशनी और आज़ादी का त्योहार जब गुरु हरगोबिंद जी अमृतसर लौटे, तो लोगों ने दीयों से पूरा शहर सजा दिया और उनका ज़ोरदार स्वागत किया। तभी से इस दिन को “बन्दी छोड़ दिवस” कहा जाने लगा, जो ज़्यादातर दिवाली के दिन ही मनाया जाता है। ग्वालियर किले से जब हजारों दीये जलते दिखाई देते हैं और गुरुद्वारे में “सत नाम श्री वाहेगुरु” की आवाज गूंजती है, तो मन अपने आप ही हल्का हो जाता है जैसे अंदर की कोई पुरानी गाँठ खुल गई हो। यात्रा गाइड: कैसे पहुँचें?

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Hidden Leaf Homestay- रामनगर में घर से दूर भी घर जैसा एहसास

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जब भी हम कहीं बाहर जाने की प्लानिंग करते हैं तो हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि आखिर हम कहां रुकेंगे या कहाँ ठहरेंगे? उसमें भी बात अगर उत्तराखंड जैसे डेस्टिनेशन की हो, तो प्लानिंग और सॉलिड होनी चाहिए! आज फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में आप जानेंगे एक ऐसे होमस्टे Hidden Leaf Homestay के बारे में जहां रुकना किफायती भी होगा और मजेदार भी। आजकल होमस्टे रुकने और ठहरने के लिए एक बेहतर विकल्प माने जाते हैं क्योंकि यह न केवल आपको ठहरने की जगह देते हैं बल्कि ऐसा एहसास कराते हैं जैसे आप अपने ही किसी दूसरे घर में रुके हों। Hidden leaf Homestay यह होमस्टे रामनगर में जिम कॉर्बेट के पास स्थित है, जो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से लगभग 5 किमी दूर है। ये एक पहाड़ी घर है जिसे बने हुए बहुत लम्बा वक़्त नहीं हुआ है इसलिए ये बेहद सुंदर और नया-नया सा भी लगता है। इस होमस्टे की सबसे बड़ी खासियत है इसके आसपास का शांत माहौल। अगर आप यहाँ रुकते हैं तो आपके दिन की शुरुआत सुबह पक्षियों की चहचहाहट और ठंडी हवाओं के साथ होती है। कमरे और ठहरने की जानकारी यहाँ डीलक्स और सुपर डीलक्स कमरे उपलब्ध हैं, जिनके साथ आपको बालकनी और माउंटेन व्यू भी देखने को मिलता है। रोजाना कमरों की सफ़ाई और हॉउसकीपिंग की सुविधा मिलती है। कुछ कमरों में वर्क डेस्क भी मिलती है। कमरे में मिलेंगी ये सुविधाएँ-आरामदायक बेड और साफ बिस्तरएसी ACवाई-फाई Wi-Fiअटैच बाथरूम Attach Bathroomसीटिंग एरिया Seating Area खाने पीने की व्यवस्था (Hidden Leaf Homestay) इस होमस्टे की एक खासियत है कि यहाँ आपको बिल्कुल घर जैसा खाना मिलता है। इस होमस्टे में इन-हाउस रेस्टोरेंट है जहाँ लंच/डिनर, ब्रंच और हाई-टी सर्व की जा सकती है। साथ ही, यहाँ मेहमानों के अनुसार खाने में स्थानीय ऑप्शन्स में भी उपलब्ध कराए जाते हैं। पार्किंग और अन्य सुविधाएँ यहाँ पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। कार और बाइक दोनों के लिए सुरक्षित जगह मिल जाती है। और होमस्टे के मालिक राजदीप सिंह सूद से बातचीत कर आप अन्य सुविधाओं की पुष्टि भी कर सकते हैं क्योंकि यहाँ आपको बिल्कुल पारिवारिक माहौल मिलता है। Hidden Leaf Homestay में रुकना और यहां वक्त बिताना अपने आप में शानदार अनुभव होता है। इसकी लोकेशन ऐसी है कि आपको आसपास की प्रसिद्ध जगहों पर जाने के लिए बहुत दूर नहीं निकालना पड़ता, बल्कि कुछ किलोमीटर के अंदर ही आप जिम कॉर्बेट और अन्य विजिटिंग प्लेसेस पर जा सकते हैं। न सिर्फ Hidden leaf homestay बल्कि आजकल आपको लगभग हर राज्य में ऐसे होमस्टे मिल जाएंगे। ये एक बेहतर विकल्प होते हैं तो अब आप जब कहीं घूमने जाएं और ठहरने की जगह देखें तो अपनी लिस्ट में होमस्टे को ज़रूर शामिल करें। होमस्टे कैसे काम करते हैं और सरकार से इन्हें कैसे सहायता मिलती है? ये जानने के लिए अभी देखिए हमारे युट्यूब चैनल पर ये वीडियो-

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भारत में लॉन्ग वीकेंड के लिए पांच सुंदर रोड ट्रिप्स

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अगर आप रोमांच की तलाश में हैं और चाहते हैं कि आपका सफर मंजिल से भी ज्यादा यादगार हो, तो भारत में रोड ट्रिप्स से बेहतर कुछ नहीं है यहां की विशाल तटरेखा, घने जंगल, ऊंचे ऊंचे पहाड़ और ऐतिहासिक स्थल सड़क यात्रा के लिए एक स्वर्ग है। एक सही रोड ट्रिप आपको आपकी गति से चलने और रास्ते में मनपसंद जगह पर रुकने और हर मील को एक यादगार लम्हा बनाने की आजादी देता है फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल लाया है आपके लिए सबसे शानदार पांच रोड त्रिप्स जो निश्चित रूप से आपके दिमाग को चकित कर देगी। दिल्ली से लेह मनाली होते हुए हिमालय का कमाल अगर तुम्हें एडवेंचर पसंद है तो दिल्ली से लेह कि यह ट्रिप एकदम परफेक्ट है करीब 1,020 किलोमीटर लंबा ये सफर इतना शानदार है कि इसे पूरा करने में चार से पांच दिन लग जाते हैं लेकिन चार-पांच दिन में हर पल यादगार बन जाता है। ये रास्ता भारतीय हिमालय की सबसे मुश्किल और सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक है जहां सफर के दौरान तेज बहती नदियां, ऊंची ऊंची दर्रे जैसे रोहतांग पास और बारालाचा ला, और छोटे-छोटे दूरदराज गांव देखने को मिलते हैं। यहां की बर्फ से ढकी चोटियां, शांत घटियां और तिब्बती संस्कृति की झलक मन मोह लेती है। रास्ते में मैग्नेटिक हिल और नुब्रा वैली जैसी शानदार जगह भी आती है जो इस यात्रा को और भी खास बना देती है। दिल्ली से लेह जाने का सबसे बढ़िया समय जून से सितंबर तक का होता है क्योंकि उसी वक्त मौसम सुहावना रहता है और सड़के भी खुली होती है। सच कहें तो दिल्ली से लेह तक का यही तक का यह रोड ट्रिप हिमालय का एक कमाल है जहां ये मोड़ पर रोमांच और खूबसूरती का नया नजारा देखने को मिलता है। मुंबई से गोवा कोंकण का तटीय आकर्षण मुंबई से गोवा तक का सफर एकदम क्लासिक रोड ट्रिप है जो कोंकण खूबसूरत तटीय इलाकों से होकर गुजरता है करीब 590 से 630 किलोमीटर लंबा ये रास्ता हर ट्रैवल लवर का सपना होता है। NH66 हाईवे पर ड्राइव करते हुए चारों तरफ हरियाली, घुमावदार सड़के कई जगह से दिखता अरब सागर का नजारा इस सफर को और मजेदार बना देता है रास्ते में पुराने समुद्र तट, छोटे-छोटे मछुआरो के गांव और पुराने किले मिलते हैं, जो इस यात्रा को समुद्र, रेत और संस्कृति का एक बेहतरीन मिश्रण बना देते हैं। सफर के दौरान आप गणपतिपुले में समुद्र किनारे बने गणेश मंदिर में जा सकते हैं। रत्नागिरी में स्वादिष्ट अल्फोंसो आमो का मजा ले सकते हैं या फिर शांत और खूबसूरत अलीबाग में ठहर सकते हैं अगर आप मुंबई से शुरुआत कर रहे हैं, तो बीच में लोनावाला और खंडाला के हरे भरे पहाड़ों पर एक छोटा ब्रेक लेना बिल्कुल भी ना भूले। इस रोड ट्रिप के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी तक का होता है जब मौसम ठंडा और सफर के लिए एकदम परफेक्ट रहता है। गुवाहाटी से तवांग उत्तर पूर्व का रहस्य में सफर अगर तुम असली एडवेंचर और नेचर की खूबसूरती देखना चाहते हो, तो गुवाहाटी की तवांग तक की ये ट्रिप एकदम परफेक्ट है। करीब 520 किलोमीटर लंबा ये सफर अरुणाचल प्रदेश के रहस्यमय और खूबसूरत वादियों से होकर गुजरता है। रास्ते में घने जंगल, तेज बहती नदियां और ऊंचे ऊंचे खतरनाक पहाड़ी दर्रे आते हैं जो इस ट्रिप को रोमांस से भर देते हैं। सफर के दौरान तेजपुर जैसे खूबसूरत शहर भी पड़ते हैं, जो ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा है। इस यात्रा का सबसे खास हिस्सा है सेला पास, जो करीब 13,700 फीट की ऊंचाई पर है यहां बर्फ से ढकी चोटियां और शांत झीलें किसी सपने जैसी लगती हैं। तवांग पहुंचने पर वहां की शांत मठ और पहाड़ी नजारे मन को सुकून दे देते हैं इस ट्रिप के लिए सबसे अच्छा समय मार्च से मई या अक्टूबर से नवंबर तक होता है, जब मौसम साफ और यात्रा के लिए एकदम सही रहता है। चेन्नई से पांडिचेरी पूर्वी तट का आनंद चेन्नई से पांडिचेरी तक की ड्राइव साउथ इंडिया की सबसे प्यारी रोड ट्रिप्स में से एक है करीब 160 किलोमीटर की यह छोटी लेकिन बहुत मजेदार ट्रिप सिर्फ तीन से चार घंटे में पूरी हो जाती है यह सफर ईस्ट कोस्ट रोड से होकर गुजरता है जो बंगाल की खाड़ी के बिल्कुल किनारे किनारे चलता है पूरे रास्ते पर समुद्र की हवा और खूबसूरत नजारे मिलते रहते हैं। बीच में महाबलीपुरम के पुराने मंदिर देखने को मिलते हैं, जो इस ट्रिप को और भी खास बना देते हैं। पांडिचेरी पहुंचकर वहां की फ्रेंच स्टाइल की गलियां, कैफे और ऑरोविले की शांति दिल को छू जाती है। यह सफर उन लोगों के लिए एकदम परफेक्ट है जो वीकेंड में कहीं जल्दी घूमने जाना चाहते हैं इस रोड ट्रिप का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी तक का होता है। बेंगलुरु से ऊटी नीलगिरी की रानी बेंगलुरु से ऊटी तक की ड्राइव साउथ इंडिया की सबसे मशहूर और खूबसूरत रोड ट्रिप्स में गिनी जाती है। करीब 270 किलोमीटर लंबा ये सफर मैसूर से होकर नीलगिरी की हरी भरी पहाड़ियों तक जाता है। रास्ते में बांदीपुर और मुदुमलाई जैसे जंगलों से गुजरना होता है। जहां कभी-कभी हाथी या हिरण भी दिख जाते हैं ऊटी, जिसे ‘व्कीन ऑफ हिल्स’ कहा जाता हैसाथ ही ये जगह अपने पुराने ब्रिटिश माहौल और सुंदर बगीचों के लिए जानी जाती है। वहां तक पहुंचाने के रास्ते में 36 हेयरपिन बेंड्स आते हैं जो इस ट्रिप को और भी रोमांचक बना देते हैं ऊटी जाने का सबसे अच्छा समय जुलाई से सितंबर होता है। जब हर तरफ हरियाली होती है, या फिर नवंबर से मार्च जब मौसम ठंडा और सुहावना रहता है। चाहें आप हिमालय की बर्फीली ऊंचाइयां देखें या दक्षिण भारत के चाय बागानों और समुद्र किनारो की सैर करना, यह रोड ट्रिप्स तुम्हें जिंदगी भर याद रहने वाला अनुभव देगी। तो अब देर करो, गाड़ी की जांच कर लो और बैग पैक कर लो और इन शानदार रास्तों पर निकल पढ़ो,  क्योंकि असली मजा तो सफर में ही है। फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के पास सुझाव * निकलने से पहले टायर, ब्रेक, इंजन ऑयल और फ्यूल

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राजस्थानी कंदोरा बना नया फैशन ट्रेंड, Royal Twist with Tradition

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राजस्थान की पहचान उसके ट्रेडिशनल गहनों और शाही अंदाज़ से हमेशा जुड़ी रही है। यहां के पारंपरिक गहने न सिर्फ भारत में, बल्कि देश-विदेश में भी खूब मशहूर हैं। चाहे फिर वो कुंदन हार हो, पोलकी या भंवरकंडी नथ की बात हो, ये सभी राजस्थानी गहने अपनी खूबसूरती और कारीगरी के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। इन्हीं खास गहनों में से एक है राजस्थानी कंदोरा, जो कमर में पहना जाने वाला ट्रेडिशनल गहना है। फिर लौटा कंदोरा का ट्रेंड पहले के समय में कंदोरा ज़्यादातर राजा-महाराजाओं और सामंतों की शान हुआ करता था। यह उनकी खास पोशाक और रॉयल पहचान का हिस्सा माना जाता था। समय के साथ यह गहना महिलाओं के पहनावे में आ गया, लेकिन धीरे-धीरे इसका चलन कम होता चला गया और लोग इसे कम पहनने लगे। लेकिन अब एक बार फिर वही दौर लौट रहा है। आजकल महिलाएं कंदोरा को बड़े शौक से पहन रही हैं और यह गहना फिर से ट्रेंड में आ गया है। खासकर शादी-ब्याह और ट्रेडिशनल मौकों पर कंदोरा पहनना स्टाइल और परंपरा दोनों का खूबसूरत मेल बन गया है। आज के समय में कंदोरा को पहले के मुकाबले ज्यादा हल्का और आरामदायक बनाया जा रहा है। पहले जहां ये गहने भारी हुआ करते थे, वहीं अब इन्हें हल्के वज़न का बनाया जाने लगा है जिसकी वजह से कोई भी महिला इन्हें आसानी से पहन सकती है। कम वजन होने के कारण ये गहने पहनने में अनकंफर्टेबल भी नहीं लगते। ट्रेडिशनल लुक बिना किसी परेशानी के अब आप अपना ट्रेडिशनल लुक बिना किसी परेशानी के, पूरे कंफर्ट के साथ कैरी कर सकती हैं। यही वजह है कि राजस्थानी कंदोरा आज फिर से महिलाओं की पसंद बनता जा रहा है और फैशन के साथ-साथ परंपरा को भी आगे बढ़ा रहा है। एक समय हुआ करता था जब राजस्थानी कंदोरा सिर्फ चांदी में ही बनाया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, वैसे-वैसे इसमें भी कई तरह की वैरायटी जुड़ती चली गई। अब कंदोरा सिर्फ चांदी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सोने, पीतल और कई तरह के आर्टिफिशियल मटेरियल में भी बनने लगा है। हर बजट में उपलब्ध, राजस्थानी कंदोरा आजकल ऐसे कंदोरा भी बनाए जा रहे हैं जो देखने में बिल्कुल असली और ट्रेडिशनल लगते हैं, लेकिन उनकी कीमत काफी किफायती होती है। यही वजह है कि अब यह गहना सिर्फ खास या अमीर लोगों तक सीमित नहीं रहा। अब कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अमीर हो या साधारण परिवार से हो, अपनी पसंद और बजट के हिसाब से कंदोरा खरीद सकता है और बड़े आराम से पहन भी सकता है। यही बदलाव इस ट्रेडिशनल गहने को एक बार फिर लोगों के दिलों के करीब ला रहा है।

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जानिए कौन से होते है सोलह शृंगार, जिनके बिना अधूरी है हर शादी!

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सोलह शृंगार के बारे में तो आपने ज़रूर सुना होगा। भारत के कल्चर में सोलह शृंगार को जितनी अहमियत दी जाती है, उतनी शायद ही किसी और देश में दी जाती हो। हिंदू धर्म में जब शादी होती है, तो दुल्हन को पूरे सोलह शृंगार के साथ सजाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये 16 शृंगार आखिर होते कौन-कौन से हैं? अक्सर लड़कियाँ इस बात को लेकर कन्फ्यूज़ हो जाती हैं कि सोलह शृंगार में कौन-सी चीज़ें शामिल होती हैं और कौन-सी नहीं। इसी कन्फ्यूज़न को दूर करने के लिए फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल आपके लिए लेकर आया है ब्राइडल के 16 सिंगार के बारे में, जिसे पढ़ने के बाद आपको साफ समझ आ जाएगा कि दुल्हन के सोलह शृंगार आखिर होते कौन से हैं। तो आइए, जानते हैं ब्राइडल सोलह शृंगार के बारे में! 1. सिंदूर जब लड़की की शादी होती है, तब उसकी मांग में रेड या ऑरेंज कलर का सिंदूर लगाया जाता है। इसके बाद वह शादीशुदा कहलाती है। हिन्दू धर्म में सिंदूर पति की लंबी उम्र और सुहाग की पहचान माना जाता है। 2. बिंदी माथे पर एक प्यारी-सी बिंदी लग जाए तो खूबसूरती में जैसे चार चाँद लग जाते हैं। यह चेहरे को एक अलग ही चमक देता है जो लोगों की नजरों को माथे की ओर खींचती है। 3. बालों की सजावट सजे-संवरे बाल पूरे लुक की जान होते हैं। चाहे चोटी हो, जूड़ा हो या खुले बाल। बालों की अच्छी स्टाइलिंग से लुक और निखर जाता है। 4. काजल आँखों में लगाया गया काजल आँखों को बड़ा, गहरा और आकर्षक बनाता है। काजल बिना मेकअप के भी चेहरे में जान डाल देता है। और इसे इन सोलह सिंगर में खास भी माना गया है। 5. आईलाइनर आईलाइनर आँखों की शेप को उभारता है। हल्का हो या विंग स्टाइल इसे लगाने के बाद नजरों में एक अलग ही कॉन्फिडेंस आ जाता है। 6. नथ नाक में पहनी जाने वाली नथ दुल्हन के लुक को रॉयल टच देती है। यह चेहरे की खूबसूरती को खास बना देती है। यहां तक कि भारत के कई स्टेट में इसे सोलह सिंगारो में सबसे खास माना गया है। जैसे उत्तराखंड में नथ के बिना शादी नहीं हो सकती क्योंकि उत्तराखंड में नथ को सुहागन महिलाओं की पहचान माना जाता है। 7. कुंडल (झुमके) कानों के झुमके चेहरे के साथ-साथ गर्दन की सुंदरता भी बढ़ाते हैं। भारी या हल्के हर स्टाइल का अपना चार्म होता है। अगर हम यह कहे कि झुमकों या फिर कुंडलों के बिना एक ब्राइडल का लुक या फिर किसी सुहागन महिला का लुक अधूरा है तो हम कुछ गलत नहीं कहेंगे। 8. हार गले में पहना जाने वाला हार पूरे आउटफिट को कंप्लीट करता है। बिना हार के लुक अधूरा-सा लगता है। इसी लिए तो लगभग भारत के हर स्टेट के अपने हार होते है चाहे फिर राजस्थान का कुंदन हार हो या गुजरात का चोकर इनके बिना तो ब्राइडल का लुक अधूरा ही रहता हैं। 9. मेहंदी हाथों और पैरों में रची मेहंदी खुशियों और शुद्धता का प्रतीक है। और इसे तो सीधा दुल्हे के प्यार से जोड़ा जाता है कहा जाता है कि जितनी गहरी मेहंदी, उतना गहरा प्यार और तभी तो सदियों से इसे सोलह सिंगार की जान माना जाता है। 10. चूड़ियाँ हाथों में खनकती चूड़ियाँ ही तो महिलायों की खूबसूरती को दिखाती है और यही तो खुशीयो की पहचान मानी जाती हैं। दुल्हन के हाथ चूड़ियों के बिना अधूरे से लगते हैं,और शादियों तो हरी चूड़ियां दुल्हन को चढ़ाई भी जाती है क्योंकि जिस तरह सिंदूर शादीशुदा महिलाओं की पहचान होता हैं ठीक उसी तरह चूड़ियां भी महिलाओं के शादीशुदा होने की निशानी होती हैं। 11. कंगन कंगन चूड़ियों से थोड़े भारी होते हैं और हाथों को रिच और ग्रेसफुल लुक देते हैं। कंगन को अक्सर रिश्ता जोड़ने का प्रतीक माना जाता है। आपने देखा ही होगा कि जब भी कोई रिश्ता पक्का होता है तब दुल्हन को रिश्ता पका होने की निशानी के रूप में कंगन पहनाए जाते हैं। 12. अंगूठी उंगली में सजी अंगूठी हाथों की सुंदरता बढ़ाती है और सादगी के साथ एलिगेंस दिखाती है। इसके साथ अंगूठी ही तो हाथों का सबसे खास गहना मानी जाती है। जिसे पहने के बाद आपके हाथ खाली नहीं लगते। 13. कमरबंद कमर पर पहना जाने वाला कमरबंद साड़ी या लहंगे को परफेक्ट शेप देता है और ट्रेडिशनल लुक में चार्म जोड़ता है। कुछ महिलाएं तो कमरबंद को बतौर चाभी के झल्लो के रूप में भी इस्तेमाल करती हैं। 14. पायल पैरों में पहनी जाने वाली पायल की हल्की-सी छनक चलते समय बहुत मधुर लगती है और पायल ही तो महिलाओं की खूबसूरती को उभारती है। इसी के साथ पायल को नारी की सुंदरता का प्रतीक माना गया है। जिसके बारे में जाने कितने ही लेखकों ने कितनी ही बाते लिखी हैं। 15. बिछिया पैरों की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया शादीशुदा होने की पहचान होती है और इसे ही तो पारंपरिक श्रृंगार का जरूरी हिस्सा माना गया है। यहां तक ही ये भी माना जाता है कि महिलाएं इन बिछियों को अपनी शादी पे पहनती है उसके बाद जब तक वह सुहागन रहती है तब तक वह कभी भी इन्हें पूरी तरह से नहीं उतारती। 16. इत्र (परफ्यूम) हल्की-सी खुशबू पूरे श्रृंगार को पूरा करती है। अच्छी सुगंध से पर्सनालिटी और भी आकर्षक लगती है और यही तो नई ब्राइड्स की पहचान होती हैं।