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Droog Fort: कुन्नूर के जंगलों में छिपा टीपू सुल्तान का किला

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कभी-कभी किसी जगह को देखने का मजा सिर्फ वहां पहुंचने में नहीं, बल्कि वहां तक जाने वाले रास्ते में भी छिपा होता है। चारों तरफ हरे-भरे चाय के बागान, ठंडी हवा, पहाड़ियों पर तैरते बादल और जंगलों के बीच से गुजरता पैदल रास्ता। सोचिए, ऐसे सफर के आखिर में एक पुराना किला आपका इंतजार कर रहा हो, जिसके बारे में कई दिलचस्प किस्से सुनने को मिलते हैं। तमिलनाडु के कुन्नूर के पास स्थित Droog Fort ऐसी ही एक जगह है। यहां न तो बड़े-बड़े होटल हैं और न ही आम पर्यटन स्थलों जैसी भीड़भाड़। यहां आने का असली मजा उन लोगों को मिलेगा, जिन्हें पहाड़ों पर घूमना, पुराने किलों के बारे में जानना और प्रकृति के बीच कुछ समय बिताना पसंद है। करीब छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस किले तक पहुंचने के लिए पैदल चलना पड़ता है। रास्ते में चाय के बागान और हरियाली आपका साथ देते हैं, जबकि ऊपर पहुंचकर आसपास की पहाड़ियों और दूर तक फैली वादियों के नजारे देखने को मिलते हैं। Droog Fort आज भले ही खंडहर बन चुका है, लेकिन इसकी पुरानी दीवारें और इससे जुड़ी कहानियां इस जगह को खास बनाती हैं। अगर आप कुन्नूर घूमने का प्लान बना रहे हैं और कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, तो इस जगह के बारे में जानना आपके लिए दिलचस्प रहेगा। कुन्नूर के पास कहां है यह पुराना किला? कुन्नूर तमिलनाडु के नीलगिरि जिले का एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। यहां दूर-दूर तक फैले चाय के बागान, घुमावदार सड़कें और ठंडा मौसम पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। लेकिन कुन्नूर की पहचान सिर्फ चाय के बागानों और मशहूर व्यू पॉइंट्स तक सीमित नहीं है। इसके आसपास कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां पहुंचने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। Droog Fort Droog Fort कुन्नूर से लगभग 13 से 15 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाके में स्थित है। इसे स्थानीय रूप से बकासुर मलाई या पकासुरन मलाई के नाम से भी जाना जाता है। यहां पहुंचने का रास्ता आम पर्यटन स्थलों से थोड़ा अलग है, क्योंकि आखिरी हिस्से में पैदल चलना पड़ सकता है। इस जगह पर जाने से पहले रास्ते और ट्रेक की मौजूदा स्थिति की जानकारी लेना जरूरी है। जंगल और पहाड़ी इलाकों में कभी-कभी प्रवेश से जुड़े नियम बदल सकते हैं। इसलिए सीधे पहुंच जाने के बजाय स्थानीय लोगों या संबंधित वन विभाग से जानकारी लेकर निकलना बेहतर रहेगा। Droog Fort बकासुर मलाई नाम के पीछे क्या कहानी है? किसी जगह का नाम कई बार उसके इतिहास से जुड़ा होता है, तो कई बार उसके पीछे स्थानीय मान्यताएं और पुराने किस्से होते हैं। Droog Fort का दूसरा नाम बकासुर मलाई भी ऐसी ही एक लोककथा से जुड़ा हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस पहाड़ी का संबंध बकासुर नाम के एक दानव से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि9 पुराने समय में बकासुर इसी पहाड़ी पर रहता था। इसी वजह से इस जगह को बकासुर मलाई कहा जाने लगा। यहां मलाई का मतलब पहाड़ी से है। हालांकि, इस कहानी को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं, बल्कि स्थानीय लोकमान्यता के रूप में देखना चाहिए। भारत के कई पहाड़ी इलाकों में ऐसी कहानियां पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। इनसे किसी जगह की स्थानीय पहचान और लोगों की परंपराओं को समझने में मदद मिलती है। किले का इतिहास और उसका यह नाम, दोनों मिलकर इस जगह को और दिलचस्प बना देते हैं। यहां घूमते समय आपको सिर्फ पहाड़ और जंगल ही नहीं, बल्कि उस इलाके से जुड़ी पुरानी मान्यताओं के बारे में जानने का मौका भी मिलता है। Droog Fort टीपू सुल्तान से क्या है इस किले का संबंध? Droog Fort के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा इसके टीपू सुल्तान से जुड़े इतिहास को लेकर होती है। टीपू सुल्तान मैसूर के प्रसिद्ध शासक थे, जिनका शासन अठारहवीं सदी में रहा। उस समय दक्षिण भारत के कई इलाकों पर नियंत्रण को लेकर अलग-अलग शासकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष चल रहे थे। स्थानीय इतिहास और पर्यटन संबंधी विवरणों में इस किले का इस्तेमाल टीपू सुल्तान के सैन्य ठिकाने के रूप में किए जाने का जिक्र मिलता है। पहाड़ी पर इसकी स्थिति ऐसी थी कि यहां से आसपास के इलाके पर नजर रखी जा सकती थी। पुराने समय में ऊंचाई पर बने किले और चौकियां सुरक्षा के लिहाज से काफी उपयोगी माने जाते थे। हालांकि, इस किले की शुरुआत कब हुई और टीपू सुल्तान ने इसका इस्तेमाल किस सीमा तक किया, इस बारे में पूरी तरह स्पष्ट ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इससे जुड़ी हर बात को पक्का ऐतिहासिक तथ्य मानना ठीक नहीं होगा। इतना जरूर है कि Droog Fort की पहाड़ी पर मौजूद स्थिति इसे पुराने समय की सुरक्षा व्यवस्था को समझने के लिए दिलचस्प बनाती है। यहां पहुंचकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहले के दौर में पहाड़ी चौकियों का क्या महत्व रहा होगा। आज किले में क्या देखने को मिलता है? अगर आप किसी ऐसे किले की कल्पना कर रहे हैं, जहां बड़े-बड़े दरवाजे, ऊंची दीवारें और पुराने महल आज भी सुरक्षित हों, तो Droog Fort आपको वैसा नजारा नहीं दिखाएगा। समय के साथ यह किला काफी हद तक खंडहर में बदल चुका है। Droog Fort यहां पुराने किले की दीवारों के कुछ अवशेष ही दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि कभी इस जगह पर कोई सुरक्षा चौकी या किले जैसी संरचना रही होगी। लेकिन आज यहां किसी बड़े और पूरी तरह सुरक्षित किले की तरह घूमने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। किले के आसपास का प्राकृतिक नजारा इस यात्रा का बड़ा आकर्षण है। ऊंचाई से पहाड़ियां, हरियाली और दूर तक फैला इलाका दिखाई देता है। मौसम साफ हो तो नजारे और भी खूबसूरत लगते हैं, जबकि बादल और धुंध पूरे माहौल को अलग रूप दे सकते हैं। किले की दीवारों या टूटे हुए हिस्सों पर चढ़ने से बचें। पुराने पत्थर कमजोर हो सकते हैं और उनके पास फिसलने का खतरा रहता है। यहां घूमने का सबसे अच्छा तरीका है कि आसपास की जगह को आराम से देखें, तस्वीरें लें और ऐतिहासिक अवशेषों को नुकसान पहुंचाए बिना वापस लौटें। चाय के बागानों से जंगल तक का ट्रेक इस यात्रा