Mukteshwar Travel Guide: मंदिर,झरने,पहाड़ों की पूरी जानकारी
अगर आप पहाड़ों पर घूमने के लिए ऐसी जगह ढूंढ रहे हैं जहां बहुत ज्यादा भीड़ न हो, सुबह उठते ही सामने पहाड़ दिखाई दें और शाम को बादलों के बीच सूरज ढलता हुआ नजर आए, तो Mukteshwar आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में बसा यह पहाड़ी इलाका अपनी शांत वादियों, देवदार और बांज के जंगलों, पुराने मंदिर, खूबसूरत Viewpoint और आसपास के झरनों के लिए जाना जाता है। यहां घूमने का मजा सिर्फ एक-दो जगह देखकर वापस आने में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे इस पूरे पहाड़ी माहौल को महसूस करने में है। समुद्र तल से करीब 2,286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित Mukteshwar से साफ मौसम में हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। नंदा देवी, त्रिशूल, नंदा घुंटी और नंदाकोट जैसी चोटियां यहां से दिखाई दे सकती हैं। यही वजह है कि अगर आप Nainital की भीड़ से कुछ अलग और थोड़ा शांत पहाड़ी अनुभव चाहते हैं, तो Mukteshwar को अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। आखिर मुक्तेश्वर का नाम पड़ा कैसे? Mukteshwar का नाम यहां मौजूद प्रसिद्ध मुक्तेश्वर धाम मंदिर से जुड़ा हुआ है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां पहुंचने के साथ ही आपको धार्मिक माहौल के साथ-साथ आसपास की पहाड़ियों का खूबसूरत नजारा भी मिलता है। मुक्तेश्वर नाम को लेकर एक पौराणिक मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने यहां एक असुर का वध किया था और उसे मुक्ति प्रदान की थी। इसी मान्यता से इस जगह का नाम मुक्तेश्वर पड़ा। हालांकि ऐसी धार्मिक कथाएं आस्था और स्थानीय परंपराओं से जुड़ी होती हैं, इसलिए इन्हें उसी रूप में समझना चाहिए। 350 साल पुराने मुक्तेश्वर धाम में क्या खास है? Mukteshwar का सबसे खास धार्मिक स्थल मुक्तेश्वर धाम मंदिर है। इसे करीब 350 साल पुराना शिव मंदिर बताया जाता है। मंदिर बहुत बड़ा या भव्य होने के बजाय अपनी जगह और शांत माहौल के कारण ज्यादा खास लगता है। मंदिर के गर्भगृह में सफेद संगमरमर का शिवलिंग स्थापित है और इसके साथ तांबे की योनि बताई जाती है। मंदिर परिसर में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। पहाड़ की ऊंचाई पर बने इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, इसलिए यहां जाते समय थोड़ा आराम से चलना बेहतर रहता है। पांडवों से जुड़ी कहानी कितनी पुरानी है? मुक्तेश्वर मंदिर से पांडवों को जोड़ने वाली एक स्थानीय धार्मिक मान्यता भी सुनने को मिलती है। कहा जाता है कि अपने वनवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा की थी और इसी दौरान इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी कथा प्रचलित हुई। Mukteshwar में घूमते हुए आपको ऐसी कई स्थानीय कहानियां सुनने को मिल सकती हैं। पहाड़ों की यात्रा की खासियत भी यही है कि यहां किसी जगह का महत्व सिर्फ उसके दृश्य से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी लोक मान्यताओं और पुरानी कहानियों से भी बनता है। मंदिर में दर्शन का समय और प्रवेश शुल्क कितना है? मुक्तेश्वर धाम मंदिर में प्रवेश के लिए आमतौर पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता और श्रद्धालुओं के लिए मंदिर सुबह करीब 5 बजे से शाम 7:30 बजे तक खुला रहता है। हालांकि धार्मिक स्थलों के समय त्योहार, मौसम या स्थानीय व्यवस्था के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए यात्रा वाले दिन स्थानीय स्तर पर समय की पुष्टि कर लेना अच्छा रहेगा। Mukteshwar आने वाले यात्रियों के लिए सुबह का समय मंदिर दर्शन के साथ आसपास का शांत माहौल देखने के लिए भी अच्छा रहता है। सुबह के समय भीड़ कम होने की संभावना रहती है और पहाड़ों की हवा भी काफी अलग महसूस होती है। मंदिर के पीछे है चौली की जाली, जहां से दिखता है खुला आसमान मुक्तेश्वर मंदिर के पीछे थोड़ी ही दूरी पर चौली की जाली नाम की प्रसिद्ध चट्टानी जगह है। मंदिर के प्रवेश क्षेत्र से यह करीब 250 मीटर की पैदल दूरी पर बताई जाती है। यहां पहाड़ की चट्टानों में बना प्राकृतिक छेद और उसके आसपास की ऊंची चट्टानें इस जगह को अलग रूप देती हैं। Mukteshwar आने वाले बहुत से यात्रियों के लिए चौली की जाली मंदिर के बाद देखने वाली सबसे खास जगहों में से एक होती है। यहां से आसपास की घाटियों और दूर तक फैली पहाड़ियों का खुला दृश्य दिखाई देता है। साफ मौसम में हिमालय की चोटियां भी नजर आ सकती हैं। चौली की जाली से जुड़ी हैं कई स्थानीय मान्यताएं चौली की जाली को लेकर कई पौराणिक और स्थानीय कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता में इसे देवी और दानव के युद्ध से जोड़ा जाता है, जबकि दूसरी कथा में भगवान शिव और सम देव से जुड़ी कहानी सुनाई जाती है। कुछ स्थानीय मान्यताओं में इस चट्टान के प्राकृतिक छेद को धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यताओं को आस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। यहां आने वाले यात्रियों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि चट्टान के किनारे खड़े होते समय सुरक्षा का ध्यान रखें। भालूगाड़ Waterfall के लिए निकलें तो जंगल भी मिलेगा और झरना भी अगर मंदिर और चौली की जाली देखने के बाद आप प्रकृति के बीच कुछ समय बिताना चाहते हैं, तो भालूगाड़ Waterfall की तरफ जा सकते हैं। यह Mukteshwar के आसपास का एक खूबसूरत प्राकृतिक झरना है, जहां पहुंचने के लिए सड़क के बाद पैदल चलना पड़ता है। भालूगाड़ तक जाने वाला जंगल का रास्ता इस यात्रा को और खास बना देता है। करीब 1 से 2 किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद झरना सामने आता है। सामान्य गति से चलें तो करीब 30 से 45 मिनट लग सकते हैं, हालांकि फोटो और रास्ते में रुकने पर समय बढ़ सकता है। भालूगाड़ Waterfall को Rainbow Waterfall क्यों कहते हैं? भालूगाड़ को स्थानीय तौर पर Rainbow Waterfall भी कहा जाता है। जब सूरज की रोशनी झरने से गिरती पानी की बूंदों पर सही कोण से पड़ती है, तो फुहारों में इंद्रधनुष जैसा नजारा दिखाई दे सकता है। Mukteshwar की यात्रा में अगर आप भालूगाड़ जाते हैं तो सुबह का समय रखना अच्छा रहेगा। हालांकि इंद्रधनुष दिखाई देना मौसम, धूप और पानी