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Bengaluru Mangaluru Train: घाट सेक्शन का बिजलीकरण पूरा

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अगर आपने कभी बेंगलुरु से मंगलूरू तक Train में सफर किया है, तो आपको रास्ते में आने वाले पश्चिमी घाट के खूबसूरत नज़ारे जरूर याद होंगे। कहीं घने जंगल दिखाई देते हैं, कहीं पहाड़ों के बीच से गुजरती ट्रेन और कहीं ऐसी सुरंगें आती हैं, जिनमें कुछ देर के लिए बाहर की रोशनी गायब हो जाती है। यह सफर जितना खूबसूरत है, रेलवे के लिए उतना ही चुनौती भरा भी रहा है। अब इसी रास्ते से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। भारतीय रेलवे ने साकलेशपुर से सुब्रह्मण्य रोड के बीच 55 किलोमीटर लंबे कठिन घाट सेक्शन का बिजलीकरण पूरा कर लिया है। इसके साथ ही पूरा बेंगलुरु-मंगलूरू रेल मार्ग बिजली से चलने वाली ट्रेनों के संचालन के लिए तैयार हो गया है। Bengaluru Mangaluru Train से सफर करने वाले यात्रियों के लिए यह बदलाव काफी अहम है। पहले इस घाट सेक्शन में ट्रेनों को चलाने के लिए डीजल इंजन की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब इलेक्ट्रिक इंजन भी इस हिस्से से गुजर सकते हैं। इससे इंजन बदलने की जरूरत कम हो सकती है और ट्रेन संचालन ज्यादा सुगम बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि, बिजलीकरण पूरा होने का मतलब यह नहीं है कि हर ट्रेन का समय तुरंत कम हो जाएगा या वंदे भारत एक्सप्रेस का संचालन शुरू हो चुका है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इस बदलाव के पीछे की कहानी क्या है और आने वाले समय में यात्रियों को इससे क्या फायदा मिल सकता है। बेंगलुरु से मंगलूरू का रेल मार्ग क्यों है खास? बेंगलुरु कर्नाटक का बड़ा शहरी और तकनीकी केंद्र है, जबकि मंगलूरू राज्य का एक प्रमुख तटीय शहर है। दोनों शहरों के बीच लोगों का आना-जाना नौकरी, पढ़ाई, व्यापार, पर्यटन और परिवार से मिलने जैसे कई कारणों से होता है। सड़क से यात्रा करने के अलावा ट्रेन भी इस दूरी को तय करने का एक अहम साधन है। रास्ते में पश्चिमी घाट का पहाड़ी इलाका आता है, जो इस रेल मार्ग को दूसरे कई रास्तों से अलग बनाता है। Bengaluru Mangaluru Train Bengaluru Mangaluru Train का यह सफर केवल दो शहरों को जोड़ने तक सीमित नहीं है। यह कर्नाटक के अंदरूनी इलाकों और तटीय क्षेत्र के बीच संपर्क मजबूत करता है। इसी रास्ते से आसपास के पर्यटन स्थलों तक पहुंचने वाले यात्रियों को भी सुविधा मिलती है। लेकिन पहाड़ी ढलान, तीखे मोड़ और सुरंगों की वजह से यहां ट्रेन चलाना आसान नहीं रहा। इसी कारण इस रेल मार्ग पर बिजलीकरण का काम पूरा करना रेलवे के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 55 किलोमीटर के घाट सेक्शन का बिजलीकरण पूरा दक्षिण पश्चिम रेलवे के मैसूरु मंडल ने साकलेशपुर और सुब्रह्मण्य रोड के बीच 55 किलोमीटर लंबे घाट सेक्शन का बिजलीकरण पूरा किया। इस काम की शुरुआत दिसंबर 2023 में हुई थी और परियोजना पर करीब 93.55 करोड़ रुपये खर्च हुए। 28 दिसंबर 2025 को इस हिस्से में इलेक्ट्रिक इंजन का सफल परीक्षण किया गया। इसके बाद रेलवे ने इस सेक्शन को इलेक्ट्रिक ट्रेन संचालन के लिए तैयार होने की जानकारी दी। इससे बेंगलुरु से मंगलूरू तक के पूरे रेल मार्ग पर बिजली से चलने वाले इंजनों के संचालन का रास्ता खुल गया। Bengaluru Mangaluru Train इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब इस कठिन हिस्से को पार करने के लिए ट्रेनों को केवल डीजल इंजन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। पहले कुछ ट्रेनों में घाट सेक्शन पार करने के लिए इंजन बदलने या अतिरिक्त इंजन लगाने की जरूरत पड़ सकती थी। बिजलीकरण से ऐसे संचालन को आसान बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि, किसी ट्रेन में इलेक्ट्रिक इंजन कब लगाया जाएगा, यह रेलवे की परिचालन योजना पर निर्भर करेगा। इसलिए Bengaluru Mangaluru Train से यात्रा करने वालों को ट्रेन के वास्तविक संचालन और समय की जानकारी आधिकारिक रेलवे स्रोतों से ही देखनी चाहिए। पश्चिमी घाट में रेलवे के लिए काम करना इतना मुश्किल क्यों था? साकलेशपुर से सुब्रह्मण्य रोड के बीच का इलाका सामान्य मैदानी रेल मार्ग जैसा नहीं है। यहां पहाड़ों की ऊंचाई, ढलान और घुमावदार पटरियां निर्माण कार्य को काफी कठिन बनाती हैं। इस 55 किलोमीटर के हिस्से में 57 सुरंगें, 226 से अधिक पुल और 108 तीखे मोड़ बताए गए हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में पुलों की संख्या 226 से 258 तक दी गई है, लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि यह रेलवे के सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सों में से एक है। यहां ढलान भी काफी तीखी है। रेलवे की भाषा में इसे 1-इन-50 का ग्रेडिएंट कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें, तो ट्रैक की ऊंचाई में बदलाव काफी कम दूरी में होता है। ऐसी स्थिति में ट्रेन के वजन, ब्रेक और इंजन की क्षमता को ध्यान में रखकर संचालन करना पड़ता है। Bengaluru Mangaluru Train के इस मार्ग पर बिजलीकरण करना इसलिए भी कठिन था, क्योंकि ऊपर लगे बिजली के तारों और उनसे जुड़े उपकरणों को पहाड़ी वातावरण में सुरक्षित तरीके से स्थापित करना जरूरी था। 57 सुरंगों में बिजली के तार लगाना आसान काम नहीं था इस परियोजना का एक बड़ा हिस्सा सुरंगों के भीतर बिजली की व्यवस्था तैयार करना था। सामान्य रेल मार्ग पर बिजली के तार लगाने के लिए खंभों और उपकरणों की स्थापना की जाती है, लेकिन सुरंग के अंदर जगह सीमित होती है। यहां तारों को इस तरह लगाया जाना जरूरी था कि ट्रेन सुरक्षित रूप से गुजर सके और उपकरण लंबे समय तक काम करते रहें। इसके लिए रेलवे को हर सुरंग की बनावट और वहां की चट्टानों की स्थिति को ध्यान में रखना पड़ा। Bengaluru Mangaluru Train उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सुरंगों में बिजली के उपकरणों को सहारा देने के लिए मुख्य और अतिरिक्त ब्रैकेट लगाए गए। इनके मजबूत तरीके से टिके होने की जांच भी की गई। राष्ट्रीय शैल यांत्रिकी संस्थान और बेंगलुरु विश्वविद्यालय की मदद से सुरंगों के भूगर्भीय हिस्सों का अध्ययन किया गया। इस तरह का काम बताता है कि Bengaluru Mangaluru Train के रास्ते को इलेक्ट्रिक बनाने के लिए केवल तार लगाना ही काफी नहीं था, बल्कि सुरंगों की सुरक्षा और उपकरणों की मजबूती का ध्यान रखना भी जरूरी था। बारिश, भूस्खलन और सड़क की कमी ने बढ़ाई चुनौती पश्चिमी घाट का इलाका अपनी हरियाली और बारिश के लिए जाना जाता