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Amer fort: जयपुर का सबसे शानदार और हिस्टोरिकल प्लेस

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जयपुर के रंग-बिरंगे बाज़ार और रॉयल वाइब्स के बीच एक जगह ऐसी है जो आपको सीधे पास्ट में ले जाती है और वो है आमेर किला। यहाँ कदम रखते ही महसूस होता है कि हिस्ट्री सिर्फ किताबों तक ही नहीं है, बल्कि यहां की हर दीवार, हर आँगन और हर नज़ारे में आज भी ज़िंदा है। इसी एहसास को और करीब से दिखाने के लिए Five Colors of Travel आपके लिए यह ब्लॉग लेकर आया है, जिसमें आमेर किले की पूरी कहानी, इसे बनाने के पीछे जुड़ी दिलचस्प बातें और वे खास जगहें जिन्हें देखकर आप खुद इस किले के दीवाने हो जाएंगे। इसके साथ ही अगर आपको ट्रैवल करना पसंद है, नई जगहों को एक्सप्लोर करना अच्छा लगता है और आप ऐसी लोकेशन ढूंढते हैं जहाँ रॉयल वाइबस के साथ कमाल की फोटोस भी मिलें, तो यह ब्लॉग आपके लिए ही है। (Amer Fort Jaipur) History of Amer fort आमेर किला जयपुर से करीब 11 किलोमीटर दूर, आमेर नाम की जगह पर एक ऊँची पहाड़ी पे बना हुआ है और इसे देखते ही ऐसा लगता है जैसे आप सीधे हिस्ट्री में कदम रख रहे हों। इसको 1592 में राजा मान सिंह प्रथम बनवाना शुरू किया था और बाद में सवाई जय सिंह द्वितीय ने इसमें कई बदलाव किए। यह किला राजपूत वास्तुकला का बेहतरीन एग्जाम्पल है, जिसमें मुगल शैली की झलक भी देखने को मिलती है। लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बना यह किला देखने में बहुत ही आई कैचिंग लगता है, और इसके हर कोने में हिस्ट्री की कहानियां और रियल लाइफ़ की झलकियाँ नजर आती हैं। Amer Fort-एंट्री जो पहली नज़र में ही दिल जीत ले आमेर किले में एंट्री सूरज पोल से होती है, जो आपको सीधे जलेब चौक यानी इस महल के मेन आँगन तक ले जाती है। पुराने ज़माने में यहीं पर सेनाओं की परेड होती थी और शाही स्वागत भी यहीं किया जाता था, इसलिए इसकी हिस्ट्री बड़ी ही खास है। इसी आँगन के पास शीला देवी मंदिर भी है, जिसे 1604 में राजा मान सिंह ने बनवाया था और यहां आज भी एक अलग ही शांति और पॉज़िटिव वाइब्स मिलती हैं, जलेब चौक के चारों तरफ किले की पुरानी दीवारें देखने लायक हैं और इस महल के हर कोने में हिस्ट्री की कहानियां छुपी हुई है। दीवान-ए-आम–जहाँ राजा जनता से मिलते थे अगला पड़ाव है दीवान-ए-आम, यानी वो जगह जहाँ राजा सीधे आम लोगों की बातें सुनते थे और उनके मसलों का हल निकालते थे। यहाँ खंभों पर हाथियों और दूसरे जानवरों की बेहद खूबसूरत नक्काशी बनी हुई है, जो इस जगह को और भी खास बना देती है। यहां खड़े होकर आप महसूस कर सकते हैं कि उस ज़माने में यहाँ कैसे बड़े-बड़े फैसले लिए जाते होंगे, और किस तरह राजा और उनके सलाहकार यहाँ बैठकर लोगों की परेशानियों पर चर्चा करते होंगे।दीवान-ए-आम की खुली और शानदार जगह को देखकर ये समझ आता है कि राजाओं की शान और ताकत सिर्फ उनके महलों तक ही नहीं, बल्कि उनके कामकाज की जगहों में भी साफ दिखती है। शीश महल आमेर किले का सबसे खास हिस्सा आमेर किले का सबसे खास हिस्सा माना जाता है शीश महल को जहाँ लगी छोटी-छोटी शीशों की सजावट इतनी शानदार है कि इसे देखते ही नज़रें वहीं ठहर जाती हैं। कहा जाता है कि सिर्फ एक मोमबत्ती जलाने से पूरा महल चमक उठता था। शीश महल को दीवान-ए-ख़ास भी कहा जाता है, जहाँ केवल राजा-महाराजा, उनकी रानियाँ और खास मेहमानों को ही आने की इजाज़त थी। शीश महल के सामने ही सुख निवास बना हुआ है। दीवारों और छतों पर बने अलग-अलग डिज़ाइन लोगों को इतना अट्रेक्ट करते हैं कि ज़्यादातर लोग यहीं रुक जाते हैं और फोटो क्लिक करने लगते हैं, वहीं सामने चारबाग शैली इस जगह की खूबसूरती को और भी बढ़ा देती है। सुरक्षा और प्राइवेसी किले का आख़िरी हिस्सा रानी महल है, जहाँ पुराने ज़माने में शाही परिवार की महिलाएँ रहा करती थीं। इसी इलाके में राजा मान सिंह का महल भी मौजूद है, जिसे आमेर किले का सबसे पुराना हिस्सा माना जाता है। किले के बाकी हिस्सों के मुकाबले यहाँ का माहौल काफ़ी शांत और प्राइवेट सा लगता है, जैसे यहाँ आकर शोर-शराबा अपने आप ही पीछे छूट जाता हो। चारों तरफ बनी जालियाँ, बंद रास्ते और सादा लेकिन शाही बनावट ये दिखाती है कि उस दौर में सुरक्षा और प्राइवेसी का कितना ध्यान रखा जाता था। ये जगह भले ही कम दिखावटी हो, लेकिन हिस्ट्री और शांति से भरी हुई है। लोकेशन और नज़ारे जो याद रह जाएँ आमेर किले के ठीक नीचे माओटा झील है, जो पहले के समय में महल के लिए पानी का मेन ज़रिया हुआ करती थी। किले के ऊपर से इस झील और आसपास की पहाड़ियों का नज़ारा सच में बहुत खूबसूरत लगता है और यहाँ खड़े होकर फोटो लेने का मन अपने आप करने लगता है। एक और मज़ेदार बात ये है कि आमेर किले और जयगढ़ किले के बीच एक गुप्त सुरंग भी है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर शाही परिवार इस्तेमाल करते थे। ये सारी बातें आमेर किले को और भी ज़्यादा दिलचस्प बना देती हैं। आज का आमेर किला एक्सपीरियंस पहले टूरिस्ट हाथी की सवारी करके किले तक जाया करते थे, लेकिन अब जानवरों की देखभाल को ध्यान में रखते हुए ज़्यादातर लोग जीप राइड से ऊपर जाते हैं, जो काफ़ी आरामदायक और आसान भी है। इसके अलावा, 2013 में आमेर किले को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट की लिस्ट में शामिल किया गया, जिससे इसकी हिस्टोरिकल अहमियत और भी ज़्यादा बढ़ गई है जिससे दुनिया भर में इसकी पहचान बनी है।

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Bangle Market: जानिए क्यों देश विदेश के पर्यटकों की पहली पसंद है जयपुर की लाख की चूड़ी मार्किट

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“कुछ शहर खूबसूरत होते हैं और कुछ सुन्दर बनने की चाहत रखते हैं। लेकिन राजस्थान का जयपुर शहर तो शायद सुंदरता के लिए बनाया गया है जिसका नाम जेहन में आते ही मन गुलाबी हो उठता है। चाहे दिन का समय हो या रात का, इस शहर की चमक और बनावट मन से उतरती ही नहीं। चारों और अरावली की पहाडयों से घिरा, चौड़ी और साफ़ सुथरी सड़कों और अपने चमकीले और सैकड़ों साल पुराने बाज़ारों के कारण यह शहर किसी भी पर्यटक के मन को खुश करने में पूरी तरह सक्षम हैं। जयपुर अपने पर्यटन स्थलों के वजह से तो दुनिया भर में मशहूर है ही, इसके साथ ही यह शहर लाख की चूड़ियों (Lac Bangle Market Jaipur) के लिए भी काफी मशहूर है। यहां आने वाले पर्यटक अपने या अपने लव्ड वन्स लिए लाख की चूड़ियाँ जरूर बनवाते हैं। आज के इस ब्लॉग में हम आपको इन्हीं लाख की चूड़ियों के बारे में बताने वाले हैं।” क्यों खास है जयपुर के लाख की चूड़ियाँ ? जयपुर का बाजार लाख की चूड़ियों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहां हर तरह की लाख की चूड़ियाँ बनवायी जाती है। आप यहां अपनी आंखों के सामने लाख की चूड़ियों को बनते हुए देख सकते हैं। चूड़ियां महिलाओं की खास पसंद होती है। इंडियन कल्चर को मानने वाली हर विवाहित महिला अपने हाथों में चूड़ियाँ पहनती हैं। …और सिर्फ विवाहित हीं नहीं अविवाहित लड़कियां भी अपने हाथ में चूड़ियाँ पहनना पसंद करती हैं। और अगर यह चूड़ियाँ उन्हें उपहार में दे दी जाए तो इससे बेहतर गिफ्ट उनके लिए और कुछ हो ही नहीं सकता है। सामने बनाई जाती हैं चूड़ियाँ अगर आपको भी अलग-अलग रंगों की चूड़ियाँ पहनना पसंद है तो आप जयपुर के चूड़ी मार्केट का रुख सकती हैं। जहां आप रंग बिरंगी चमचमाती चूड़ियाँ कस्टमाइज्ड करवा सकते हैं और अपने सामने इन चूड़ियों को बनता हुआ देख सकते हैं। यहां पर लाख की चूड़ियाँ बनाने वाले कलाकार आने वाले पर्यटकों के सामने चूड़ी बनाकर उन्हें दिखाते हैं। यह आपको काफी फैशिनेटिंग लगेगा। दूर से देखने पर लाख की चूड़ियाँ बनाना आसान काम लगता है। लेकिन इन कलाकारों से पूछने पर पता चलता है कि गर्म लाख को चूड़ी के खांचे में डालना एक चैलेंजिंग काम होता है। ये कलाकार बताते हैं कि इन लाख की चूड़ियों को बनाने के लिए सही तकनीक आना काफी जरूरी है। कोई भी व्यक्ति ऐसे ही फिनिशिंग के साथ चूड़ियों को नहीं बना पाएगा अगर उसे वह तकनीक पता ना हो। कलाकार बताते हैं कि लाख की चूड़ियाँ बनाने का यह तकनीक सिखाई नहीं जाती बल्कि अनुभव से आती है। करवा सकते हैं कस्टमाइज पर्यटक अपने हिसाब से इन लाख की चूड़ियों को डिजाइन करवा सकते हैं। अगर आप भी लाख की चूड़ियाँ बनवाना चाहते हैं तो आप अपने हिसाब से इन लाख की चूड़ियों के रंग, डिजाइन आदि को कस्टमाइज करवा सकते हैं। यहां आने वाले पर्यटक अपनी डिमांड्स चूड़ी निर्माता के सामने रखते हैं और चूड़ी बनाने वाले कारीगर उनकी डिमांड्स के अनुसार उनके सामने हीं चूड़ी बनाकर उन्हें पहना देते हैं। सबसे खास है नाम वाली चूड़ियाँ आप कस्टमाइज्ड नाम वाले चूड़ियों का भी यहां ऑर्डर दे सकते हैं। लाख की चूड़ियों पर नग से लोगों के नाम को उकेर कर यह खास चूड़ियाँ तैयार की जाती है। यह चूड़ियाँ अक्सर नव विवाहिताओं के लिए डिजाइन करवाई जाती है। जिसमें उस नव विवाहिता के साथ उसके पति का नाम उसकी चूड़ी में लिखा गया होता है। लाख की ऐसी चूड़ियों की डिमांड काफी दूर-दूर से आती है।

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Amer Fort

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Amer Fort : राजस्थान की आन-बान और शान- आमेर का ऐतिहासिक किला by Pardeep Kumar गुलाबी शहर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर से कोई विरला ही होगा जो वाकिफ न हो। भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक राजस्थान की राजधानी जो अपने खानपान से लेकर समृद्ध इतिहास, संस्कृति और कला के कारण भी दुनिया भर में फेमस है। you can watch this blog on YouTube कहा जाता है कि इस शहर को वेल्स के राजकुमार के स्वागत की खुशी में गुलाबी रंग से रंगा गया था और तभी से इसे गुलाबी शहर (पिंक सिटी ) के नाम से जाना जाता है। जयपुर शहर का नाम आते ही यहाँ के बड़े-बड़े और भव्य किले दिलोदिमाग में तैरने लगते हैं। और इन्हीं किलों में निसंदेह सबसे पहले जिस किले की छवि उभरती है वो है खूबसूरत आमेर का किला। राजस्थान के जयपुर शहर को और ज्यादा खूबसूरत बना देने वाला ये आमेर का किला, अम्बर किला के नाम से भी जाना जाता है। ये किला ना केवल जयपुर शहर बल्कि पूरे राजस्थान के शानदार पर्यटन स्थलों में से एक है। आमेर का किला इतना प्रसिद्ध है कि यहाँ पर हर रोज छह हजार से भी अधिक लोग घूमने के लिए आते हैं। यह किला राज्य की राजधानी जयपुर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है। आमेर जाने का सबसे अच्छा समय अगर आप इस किले की खूबसूरती का आनंद लेना चाहते हैं, तो सर्दियों के समय में नवंबर से मार्च महीने के बीच यहां जाना सबसे अच्छा माना जाता है। इसका कारण ये है कि रेतीले राजस्थान में दिन के समय मौसम गर्म ही रहता है। ऐसे में धूप और सूरज की गर्मी कभी-कभी आपको बहुत ज्यादा परेशान कर सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि आप सर्दियों में ही जयपुर जैसे शहर की यात्रा करने की प्लानिंग करें। आमेर कैसे पहुंचे इस किले तक पहुंचने के लिए जयपुर से बस, ऑटो-रिक्शा, टैक्सी या कैब ली जा सकती है। आप अजमेरी गेट और एमआई रोड से आमेर शहर के लिए रोडवेज या प्राइवेट बसों से भी जा सकते हैं। आमेर का किला एक पहाड़ी पर है, इसलिए किले का दीदार करने के लिए आपको किले के थोड़ी दूर पहले से ही या तो पैदल चलना होगा या फिर आप टैक्सी या जीप से भी किले के मुख्य द्वार तक पहुँच सकते हैं। या फिर आप अपनी पर्सनल गाड़ी से भी यहां जा सकते हैं। किले के मुख्य द्वार के पास थोड़ी सपाट चढ़ाई है, इसलिए अगर आप एक्सपर्ट ड्राइवर हैं तो ही अपनी पर्सनल गाड़ी से किले तक जाने का रिस्क लें। अगर आप सीजन के दौरान यहां जा रहे हैं, तो खुद की गाड़ी से जाने से बचना ही बेहतर होगा, क्योंकि ट्रैफिक जाम आपके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। हालांकि ऐसा सीजनल टाइम में ही ज्यादा होता है। अंदर प्रवेश करके आप हाथी की सवारी का भी अपना आनंद और रोमांच ले सकते हैं। हाथी सवारी आपके लिए तब और ज्यादा फायदेमंद साबित हो जाती है, जब आप परिवार के साथ किला घूमने गए हो, हालांकि अगर आप हाथी की सवारी करते हुए किले की सैर करना चाहते है, तो एक हाथी की सवारी के लिए आपको लगभग 1000-1,200 रुपये का तक देना पड़ सकता है। याद रहे कि एक हाथी पर दो से ज्यादा पर्यटक सवार नहीं हो सकते। हाथियों की ये सवारी सुबह से ही शुरू हो जाती है। टिकट और लागत आमेर के किले के लिए विदेशी सैलानियों से 250 रुपये और भारतीयों सैलानियों से टिकट के 50 रुपये लिए जाते हैं। अगर आप स्टूडेंट हैं, तो जयपुर शहर की यात्रा करते समय अपना स्कूल या कॉलेज आईडी कार्ड ले जाना कभी मत भूलिए, किले की सैर के लिए मिलने वाली टिकटों पर स्टूडेंट्स को भारी छूट दी जाती है, इसके अलावा सात साल से कम उम्र के बच्चे के लिए यहां ज्यादातर जगहों पर टिकट निःशुल्क हैं। आमेर के किले में टिकट काउंटर सूरज पोल के सामने जलेब चौक प्रांगण में मौजूद है। आप वहां एक ऑफिसियल टूरिस्ट गाइड भी ले सकते हैं। इसके अलावा लंबी लम्बी लाइनों से बचने के लिए आप टिकट ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। आमेर का इतिहास आमेर के किले की इतिहास की बात करें, तो यह कभी जयपुर रियासत की राजधानी हुआ करती थी। यह किला राजपूत शासकों का निवास स्थान हुआ करता था। मुगल सम्राट अकबर की सेना का नेतृत्व करने वाले महाराजा मान सिंह प्रथम ने 1592 में 11वीं सदी के किले के अवशेषों पर इसका निर्माण शुरू करवाया था। राजस्थान में छह पहाड़ी किलों के समूह के हिस्से के रूप में किले को 2013 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी घोषित किया गया। इस किले की वास्तुकला राजपूत (हिंदू) और मुगल (इस्लामी) शैलियों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। माना जाता है कि 967 ई. में मीणाओं के एक उप कुल में आमेर शहर और आमेर का किला राजा एलन सिंह चंदा द्वारा बसाया और बनाया गया था. चूंकि मीना अंबा माता की भक्त थीं, इसलिए उन्होंने अपने किले का नाम उनके नाम पर आमेर का किला रखा. पहाड़ी पर ऊंचे स्थान पर स्थित इस किले से माओटा झील दिखाई देती है, यह झील ही आमेर पैलेस के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। आपको बता दें आमेर और जयगढ़ किले को एक ही संरचना के रूप में माना जाता है, क्योंकि ये दोनों किले लगभग एक ही परिसर में हैं और खास बात ये कि एक ही भूमिगत मार्ग दोनों किलों को आपस में जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि किसी युद्ध के समय या जब कभी दुश्मन हमला कर दें तो उन हमलों से बचने के लिए इस मार्ग का उपयोग किया जाता था। किले का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। बाद में, अन्य राजपूत शासकों द्वारा इसका आगे विस्तार किया गया। अपनी अद्भुत वास्तुकला के साथ, जो मुगल और हिंदू शैलियों को जोड़ती है, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना किला, अपने उच्च प्राचीर, कई द्वारों, पत्थरों वाले रास्तों और शानदार दृश्यों के कारण खासा प्रसिद्ध है। वैसे आमेर का यह किला चार भागों में बँटा है जिसका प्रत्येक