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आगरा किले का दीवान-ए-आम: यहाँ ही सुनी जाती थी जनता की फरियाद

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आगरा किला मुगल शासनकाल का एक ऐसा किला है जिसे मुगलों की शान माना जाता है। यह मुगल काल का सबसे बड़ा किला कहा जाता है और यही एकमात्र किला था जिसे मुगल बादशाहों ने अपने रहने के लिए बनवाया था। मुगल काल में बादशाह अकबर ने आगरा को अपनी राजधानी बनाया था, इसी कारण आगरा का किला उस समय का सबसे महत्वपूर्ण और विशाल किला माना जाता है। इस किले के भीतर कई महल और कुछ अनोखी बनावटें हैं, जिनमें सबसे खास दीवान-ए-आम है। फाइव क्लास ऑफ ट्रैवल ब्लॉग में आपने आमेर किले का दीवान-ए-आम तो देखा होगा, लेकिन आज हम आपको आगरा किले के दीवान-ए-आम के बारे में बताएँगे, जो आमेर किले से कई गुना बड़ा और अधिक भव्य है। दीवान-ए-आम की बनावट और खूबसूरती दीवान-ए-आम एक बहुत बड़ा और खुला सा हॉल होता है जो चारों तरफ बड़े-बड़े खभों से गिरा होता है। जैसे ही आप इसके अंदर कदम रखते हैं, सबसे पहले आपकी नज़र इसकी ऊँची-ऊँची खूबसूरत खंभों और मेहराबों पर जाती है, जो इसे बेहद शाही लुक देती हैं। हॉल के ठीक बीच में संगमरमर से बना एक ऊँचा सा झरोखा है, जिसे तख्त-ए-मुरस्सा कहा जाता है। इसी जगह पर बैठकर मुगल बादशाह दरबार लगाते थे और लोगों की बातें सुनते थे। बादशाह की सीट से थोड़ा नीचे एक छोटी सी संगमरमर की बैठक बनी हुई है, जहाँ वज़ीर बैठता था। आम लोग अपनी शिकायतें और अर्ज़ियाँ वज़ीर को बताते थे और वज़ीर वही बातें आगे बादशाह तक पहुँचाता था। आज भी दीवाने आम का पूरा माहौल ऐसा लगता है जैसे आज भी वहाँ बादशाह आम जनता के फैसले सुना रहे हो। दीवाने आम में कैसे होता था इंसाफ? इस जगह का सबसे बड़ा और खास काम था लोगों को इंसाफ दिलाना। दूर-दूर के इलाकों से लोग अपनी परेशानी और शिकायतें लेकर यहाँ आते थे। बादशाह खुद सबकी बातें ध्यान से सुनते थे और फिर जो सही लगता था, उसका फैसला सुनाते थे। अगर कोई बहुत वफादार होता या किसी ने अच्छा काम किया, तो उसे यहीं सबके सामने इनाम दे के सम्मानित किया जाता था। दरबार के काफ़ी सख्त नियम होते थे हर अधिकारी अपनी हैसियत और ओहदे के हिसाब से तय जगह पर ही खड़ा होता था। बादशाह के पास कोई भी यूँ ही नहीं जा सकता था, इसलिए उनके और दरबारियों के बीच सोने की परत वाली एक रेलिंग लगी होती थी। पूरा माहौल बहुत अनुशासित और रुतबे वाला लगता होगा, जिससे साफ़ पता चलता था कि यहाँ कानून और व्यवस्था को कितनी अहमियत दी जाती थी। रानियों के लिए बनाया गया पर्दे के पीछे आम दरबार एक और दिलचस्प बात ये है कि बादशाह के सिंहासन के ठीक पीछे संगमरमर की जाली वाली खिड़कियाँ बनी हुई थीं। इन जालियों के पीछे से महल की शाही महिलाएँ बिना किसी की नज़र में आए पूरे दरबार को देख सकती थीं। उन्हें सब कुछ साफ़ दिखाई देता था, लेकिन बाहर खड़े लोगों को पता भी नहीं चलता था कि पीछे कोई मौजूद है। इससे साफ़ समझ आता है कि उस ज़माने में पर्दे और परंपराओं का कितना ध्यान रखा जाता था। साथ ही सुरक्षा का भी पूरा इंतज़ाम किया जाता था, ताकि शाही परिवार सुरक्षित रहे और दरबार की गरिमा बनी रहे। क्यों देखें दीवान-ए-आम? दीवान-ए-आम सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि यह मुगल शासन के दौर को साफ़ तौर पर दिखाता है, जहाँ बादशाह खुद को अपनी जनता का रक्षक मानते थे और उनकी बातें सीधे सुनते थे। आज की आसान भाषा में कहें तो यह उस ज़माने का Public Grievance Cell था, जहाँ राजा और आम लोगों के बीच बिना किसी रुकावट के सीधा संवाद होता था। इसलिए जब भी आप आगरा किला घूमने जाएँ, तो दीवान-ए-आम में थोड़ा समय ज़रूर बिताइए, कुछ पल रुककर आँखें बंद कीजिए और सोचिए कि कभी इसी जगह दरबार लगा करता था, लोग अपनी फरियाद लेकर आते थे और इतिहास के बड़े-बड़े फैसले लिए जाते थे। Five Colors of Travel की ओर से 5 सुझाव-