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Shimla Travel Guide: स्नोफॉल देखने जा रहे हैं शिमला? ये ट्रैवल गाइड बनाएगी आपकी ट्रिप आसान

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अगर आप सर्दियों में बर्फबारी देखने, पहाड़ों की खूबसूरती महसूस करने और ठंडी हवा में सुकून भरे पल बिताने का सपना देख रहे हैं, तो शिमला आपके लिए सबसे बेहतरीन डेस्टिनेशन है।हर साल हजारों टूरिस्ट सिर्फ Snowfall in Shimla देखने के लिए यहां पहुंचते हैं। लेकिन सही जानकारी न होने की वजह से कई बार ट्रिप मुश्किल भी हो जाती है। इसीलिए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे –शिमला में बर्फबारी का सही समय, कैसे पहुंचें, कहां ठहरें, क्या देखें, क्या खाएं, बजट कितना रखें और किन बातों का ध्यान रखें, ताकि आपकी शिमला ट्रिप पूरी तरह आसान और यादगार बन सके। शिमला में बर्फबारी कब होती है? (Best Time to Visit Shimla for Snowfall) सबसे जरुरी सवाल ! शिमला में बर्फबारी आमतौर पर दिसंबर के आखिरी हफ्ते से फरवरी तक देखने को मिलती है। महीनों के हिसाब से स्नोफॉल- जब शिमला आये तो यह जानकार जरुर आयें अगर आपका मकसद सिर्फ बर्फ देखना और स्नो एक्टिविटीज करना है, तो जनवरी में शिमला जाना सबसे सही समय है। शिमला कैसे पहुंचें? (How to Reach Shimla Easily)  हवाई मार्ग से  ट्रेन से शिमला कैसे जाएं कालका–शिमला टॉय ट्रेन दुनिया की सबसे खूबसूरत ट्रेन यात्राओं में गिनी जाती है। यह ट्रेन पहाड़ों, सुरंगों और हरियाली से होकर गुजरती है और UNESCO World Heritage में शामिल है। पहाड़ों की ख़ूबसूरती देखनी हो तो इससे बेहतर कुछ भी नहीं. सड़क मार्ग से बर्फबारी के दौरान सड़कें फिसलन भरी हो सकती हैं, इसलिए सावधानी जरूरी है। शिमला में बर्फ देखने की सबसे अच्छी जगहें 1. मॉल रोड और द रिज शिमला का दिल कहा जाने वाला मॉल रोड और रिज बर्फबारी के दौरान बेहद खूबसूरत हो जाता है। यहां आप बर्फ में टहल सकते हैं, फोटोग्राफी कर सकते हैं और कैफे में बैठकर गरम कॉफी का मजा ले सकते हैं। 2. कुफरी – बर्फ का असली मजा कुफरी शिमला से लगभग 16 किलोमीटर दूर है और यहां बर्फ ज्यादा पड़ती है।यह जगह स्कीइंग, स्लेजिंग और स्नो एडवेंचर के लिए फेमस है। साथ ही यहाँ की ग्रीन वैली आपको यही ठहरने पर मजबूर कर देगी. 3. नारकंडा अगर आप भीड़ से दूर ज्यादा बर्फ देखना चाहते हैं तो नारकंडा बेस्ट है।यहां स्कीइंग के साथ-साथ नेचर फोटोग्राफी का शानदार मौका मिलता है। शिमला से कुछ घंटे की दूरी पर आप यहाँ पहुँच सकते हैं . 4. मशोबरा और फागू ये जगहें शांत, साफ और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर हैं।यहां कम भीड़ होती है और स्नोफॉल का असली आनंद मिलता है। 5. जाखू मंदिर शिमला की सबसे ऊंची जगह पर स्थित जाखू मंदिर से पूरा शहर बर्फ में ढका हुआ दिखाई देता है। शिमला ट्रिप में क्या-क्या पैक करें? (Packing Tips for Shimla Snowfall Trip) भारी जैकेट और ऊनी कपड़े, थर्मल इनरवियर, दस्ताने, टोपी और मफलर, वाटरप्रूफ जूते, सनग्लास (बर्फ की तेज चमक से बचाव), लिप बाम और मॉइस्चराइज़र, जरूरी दवाइयां. अगर आपके पास सही उपयुक्त गर्म कपड़े नहीं हैं तो कुफरी में किराए पर भी मिल जाते हैं। शिमला में कहां ठहरें? (Best Places to Stay in Shimla) रहने के लिए बेस्ट एरिया सर्दियों में शिमला पीक टूरिस्ट सीजन होता है, इसलिए होटल पहले से बुक करें। शिमला में खाने के लिए क्या मशहूर है? सिड्डू, हिमाचली धाम, मोमोज और थुकपा, गरम गुलाब जामुन और चाय. सर्दी में गरम खाने का मजा शिमला में दोगुना हो जाता है। शिमला में करने वाली मजेदार एक्टिविटीज -बर्फ में फोटो और रील बनाना, स्नोमैन बनाना, स्नोबॉल फाइट, स्कीइंग और स्लेजिंग टॉय ट्रेन की सवारी– अगर शिमला की यात्रा को सच में यादगार और खास बनाना है, तो कालका–शिमला टॉय ट्रेन की सवारी जरूर करनी चाहिए। कालका से शिमला तक यह ट्रेन लगभग 102 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इस छोटे से सफर में आपको मिलते हैं—100 से ज्यादा सुरंगें, 800 से अधिक पुल, गहरी घाटियां और ऊंचे पहाड़, ब्रिटिश दौर के खूबसूरत स्टेशन. यही वजह है कि कालका–शिमला रेलवे लाइन को UNESCO World Heritage Site का दर्जा मिला है। शिमला ट्रिप के लिए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के जरुरी सुझाव -मौसम का अपडेट रोज चेक करें– बहुत ज्यादा ठंड में देर तक बाहर न रहें– फिसलन से बचने के लिए सही जूते पहनें– ट्रैफिक और रोड ब्लॉक की जानकारी पहले लें

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जानिए हिमाचल प्रदेश का वह महोत्सव जिसमें किया जाता है सर्दियों का स्वागत!

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हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियां और बर्फीली चोटियां देखना कितना दुर्लभ है। लेकिन जब सितंबर का महीना आता है, तो यहां का माहौल एक अलग ही रंगारंग हो जाता है। यहां का सैर महोत्सव, जिसे हिमाचल सैर महोत्सव भी कहते हैं, इसी समय मनाया जाता है। यह त्योहार नई फसल की खुशी और सर्दियों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। हिमाचल के विभिन्न जिलों जैसे शिमला, सोलन, कुल्लू, मंडी और कांगड़ा में इसे बड़े उत्साह से और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। आओ जानें इतिहास! सैर महोत्सव की जड़ें सदियों पुरानी हैं। यह पर्व हिमाचल की आदिवासी और लोक संस्कृति से जुड़ा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह समय देवताओं के स्वागत का समय है। वे स्वर्ग से आते हैं और फसल की रक्षा करते हैं। वैसे इस त्योहार की शुरुआत गांवों में पूजा से होती है। लोग साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं, और घरों को कई तरह से सजाते हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष पकवान भी बनाती हैं, जैसे सिड्डू और बाबरू। हिमाचल का यह महोत्सव सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक माना जाता है। हिमाचल के लोग फसल को देवताओं का आशीर्वाद मानते हैं। इसलिए सैर के दिन वे नाचते-गाते हैं और देवताओं का स्वागत करते हैं। हिमाचल के लगभग सभी गांव सहारों में इस त्यौहार के प्रति उत्सुकता देखी जा सकती है। वे ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और हवा में लोकगीतों की धुन गूंजती है तो मन खुश हो जाता है। दरअसल, यह त्योहार पारिवारिक और सामुदायिक दोनों रूपों में मनाया जाता है। कुल्लू और मंडी में घर-घर में जश्न होता है, जबकि सोलन और शिमला में बड़े-बड़े मेले लगते हैं। कहा जाता है की महोत्सव की शुरुआत 20वीं शताब्दी में लोकप्रिय हुई, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन काल से जमीं हुई हैं। राज्य सरकार भी इसे बढ़ावा देने में पीछे नहीं, हिमाचल सरकार इसे पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रमोट करती है जो हिमाचल के लिए बहुत जरूरी है। पर्यटक यहां आकर स्थानीय जीवन को करीब से देख पाते हैं। सच में यह महोत्सव हिमाचल की विविधता दिखाता है। यहां की संस्कृति में हिंदू, बौद्ध और आदिवासी सभी मिल-जुलकर त्यौहार को मनाते हैं। सांस्कृतिक रस्में जैसे फिर ज़िंदा हो जाती हैं.. सैर के दिन लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगी शॉल और चूड़ियां पहनकर सजती हैं। पुरुष टोपी और कुर्ता पहनते हैं। जो बहुत की रोमांचक माहौल बना देता है। त्योहार में बैल दौड़, लोक नृत्य और हस्तशिल्प मेला भी लगता है। अगर आप हिमाचल घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो सैर महोत्सव को मिस न करें। यह एक ऐसा अनुभव है जो आपको हमेशा याद रहेगा। यकीनन सैर महोत्सव हिमाचल की आत्मा है। और यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ जुड़ना कितना महत्वपूर्ण है। नाच-गाने इतने खास कि इनमें रम जाएंगे आप! वैसे तो सैर महोत्सव के मुख्य आकर्षण लोक नृत्य और संगीत हैं। लेकिन सोलन के अर्की में बैल दौड़ बड़ा रोमांच भरा होता है। जब ऊंचे पहाड़ों के बीच सरपट दौड़ते बैल दिखाई देते हैं तो किसी फिल्म के नजारे से कम् नहीं लगता। इस दौरान दर्शक चिल्लाते हैं, तो उत्साह का माहौल बन जाता है। वास्तव में यह दौड़ किसानों की मेहनत का प्रतीक है। और इस महोत्सव में नाटी नृत्य भी होता है जो दर्शकों का ध्यान खींचता है। बात दूं की यह नृत्य हिमाचल का प्रसिद्ध नृत्य है। लोग हाथ पकड़कर घेरा बनाते हैं और सब मिलकर नाचते हैं। महिलाएं लाल-पीले कपड़ों में सजती हैं। तो वहीं पुरुष ढोल बजाते हुए नाचते हैं। यह नृत्य एकता का संदेश देता है। इसके अलावा कुल्लू और मंडी में देवताओं की पालकी यात्रा निकलती है जो पूरे गांव में खुशी की बहार सी ला देती है। लोग देवताओं को स्वागत करते हैं, यही इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण है। पालकी पर रंगीन झंडे लहराते हैं हुए, गीत गाते हुए गलियों गलियों में घुमाया जाता है। जो लोक गीत इस महोत्सव में गाए जाते हैं ये गीत असल में फसल, प्रकृति और जीवन की कहानियां कहते हैं। इन्ही गीतों के बीच कलाकार फ्लूट बजाते हैं, और दर्शक तालियां। हस्तशिल्प मेला और बोटिंग का अनुभव एक और बात हस्तशिल्प मेला भी यहां का आकर्षण ही मानिए। इन मेलों में ऊनी शॉल, मोहरी के जूते और चांदी के आभूषण बिकते हैं इन्हें खरीदकर शैलानी अपनी यादें संजोते हैं। इसी दौरान शिमला के आसपास के झीलों पर बोटिंग भी होती है इसे भी आप देख सकते हैं। इसके अलावा सैर महोत्सव में विशेष पूजा भी की जाती है, और भगवान से आशीर्वाद मांगा जाता है। बहुत से लोग उत्सव के समय मंदिरों में जाकर भी प्रसाद चढ़ाते हैं। कुल मिलाकर यह सब दुर्लभ चीजें महोत्सव को मजेदार बनाते हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे पहाड़ खुद नाच रहे हों, वादियाँ खुद गुनगुना रही हों। पर्यटक इन नृत्यों और गीतों में शामिल हो सकते हैं और यहां की संस्कृति का एहसास कर सकते हैं। सांस्कृतिक रस्मों और परंपराओं में छिपा है प्रकृति का आदर सैर महोत्सव में सांस्कृतिक रस्में मुख्य भूमिका निभाती हैं। त्योहार की शुरुआत पूजा से होती है और गांव का पुजारी जो होता है वह देवताओं को बुलाता है। तो लोग फूल, चावल और फल चढ़ाकर अपने लिए आशीर्वाद मांगते हैं। मान्यता है कि यही देवता जिनकी तयोऊहसार के समय पूजा की जाती है वही देवता फसल की रक्षा करते हैं। त्यौहार में महिलाएं विशेष पकवान बनाती हैं। सिड्डू जैसे पकवान जो चावल के आटे से बनता है। और इसे भाप में पकाया जाता है। दूसरा जो पकवान है वह बाबरू जिसे चना दाल से भरा जाता है। ये पकवान देवताओं को चढ़ाए जाते हैं, फिर बाद में पूजा होने के बाद खाए जाते हैं। मतलब यह है कि इसी का फिर प्रसाद बांटा जाता है। इन सभी परंपराओं में एक और खास परंपरा है जिसमें में बैल को सजाना भी है। किसान बैलों को साफ करते हैं। उन्हें घंटियां बांधते हैं। और फिर पूजा के समय उनकी भी पूजा की जाती है। यह सारी रस्म फसल के लिए आशीर्वाद मांगने की है। हिमाचल के सैर महोत्सव की यह परंपरा संस्कृति को जीवित रखने का काम करती है।