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मनिहारों का रास्ता : जहां लाख की चूड़ियों में दिखती है 300 साल की विरासत

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जयपुर की हर एक गली, हर एक रास्ता और बाज़ार अपने आप में बेहद ख़ास है, क्योंकि यहाँ आपको रंग-बिरंगी संस्कृति देखने को मिलती है। चाहे फिर बात हो यहाँ के गुलाबी बाज़ार की या रात में टिमटिमाते बाज़ारों की रोशनी की। इन सबमें सबसे ख़ास है मनिहारो का रास्ता। और आज five colors of travel आपको इसी खास बाजार के बारे में बताएगा कि यह बाजार कितना पुराना है और इस बाजार की खासियत क्या है। Lac Ki Choodiyan मणिहारों का रास्ता, सदियों पुरानी पहचान त्रिपोलिया बाजार के पास मौजूद मनिहारों का रास्ता सिर्फ एक गली नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत है। जयपुर का मनिहार समुदाय 1727 से लाख के काम में लगा हुआ है। यही लोग गुलाल गोटा और रंग-बिरंगी लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं, जिनसे जयपुर की पहचान जुड़ी है। मनिहारो का रास्ता देसी बाज़ार का एक ऐसा हिस्सा है जो सदियों पुराना माना जाता है। यहाँ राजस्थान की उस संस्कृति की झलक मिलती है जो हर एक राजस्थानी घर में मौजूद है। राजस्थानी महिलाओं के हाथों में सजने वाली लाख की चूड़ियाँ यहीं बनती हैं, जो न केवल राजस्थान में पहनी जाती हैं बल्कि पूरी दुनिया तक जाती हैं। यहाँ सदियों पुराने दुकानदार मौजूद हैं, जो अपनी पीढ़ियों की बातें बताते हैं और समझाने की कोशिश करते हैं कि लाख की चूड़ियाँ सिर्फ़ गहना नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति को संजोकर रखने वाली पहचान हैं। जयपुर की होली और गुलाल गोटा की परंपरा जयपुर की होली सिर्फ रंग खेलने का त्योहार नहीं, बल्कि एक शाही एहसास है। करीब 400 साल पुरानी परंपरा में गुलाल गोटा इसकी जान है। गुलाल गोटा बनाना आसान काम नहीं है। सबसे पहले लाख को उबालकर नरम किया जाता है, फिर उसमें प्राकृतिक रंग मिलाए जाते हैं। इसके बाद कारीगर एक खास धातु की पाइप, जिसे फूँकनी कहते हैं, से उसमें हवा फूँककर बेहद पतला गोला बनाते हैं। गरम गोले को तुरंत पानी में डालकर ठंडा किया जाता है। इसके बाद उसमें अरारोट से बना इको-फ्रेंडली गुलाल भरा जाता है और आखिर में उसे सुनहरी पन्नी से सील कर दिया जाता है। और क्योंकि इतने पतले होते हैं यह बिल्कुल कागज की तरह पतले होते हैं इसलिए अगर इन्हें दूसरों पर फेककर मारा जाता है तब भी यह कोमल ही लगते हैं मनिहारों की सबसे बड़ी चुनौतियां राजस्थानी संस्कृति में लाख की चूड़ियों का एक अलग ही महत्व है, खासकर नई दुल्हन के लिए इन्हें पहनना बहुत शुभ माना जाता है। ये चूड़ियाँ दिखने में तो सुंदर होती ही हैं, साथ ही ये बिना किसी केमिकल के इस्तेमाल से बनती हैं, इसलिए पर्यावरण के लिए भी बेहतर मानी जाती हैं। लेकिन आज मनिहार कारीगरों को फैक्ट्री में बनी सस्ती और केमिकल वाली चूड़ियों से कड़ी टक्कर मिल रही है, ऊपर से गुलाल गोटा इतने नाज़ुक होते हैं कि ज़रा सी गर्मी या दबाव में टूट सकते हैं, जिससे इन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी मुश्किल हो जाता है। अच्छी बात ये है कि सोशल मीडिया और वायरल वीडियोज़ की वजह से गुलाल गोटा फिर से ट्रेंड में आ गए हैं और नई पीढ़ी अब इन पारंपरिक चीज़ों को पसंद करने लगी है, जिससे कारीगरों की मेहनत को दोबारा पहचान मिल रही है। देखिये लाख की चूड़ियों पर फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की खूबसूरत डाक्यूमेंट्री