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महरौली का अनसुना सच: जमाली कमाली मस्जिद और मकबरे की रहस्यमयी दास्तान

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दिल्ली… एक ऐसा शहर जहाँ हर गली, हर दीवार और हर खंडहर अपने भीतर सदियों की कहानी समेटे हुए है। अगर आप इस शहर को सिर्फ भीड़, ट्रैफिक और मॉडर्न लाइफस्टाइल के नजरिए से देखते हैं, तो आप इसकी असली खूबसूरती से अभी तक अनजान हैं। दक्षिणी दिल्ली के ऐतिहासिक इलाके में स्थित महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क इसी छिपे हुए इतिहास का सबसे खूबसूरत उदाहरण है। और इसी पार्क के भीतर मौजूद है एक ऐसी जगह, जो जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रहस्यमयी—जमाली कमाली मस्जिद और मकबरा। अगर आप इतिहास के शौकीन हैं, वास्तुकला प्रेमी हैं या बस दिल्ली के छिपे हुए खज़ानों(Hidden Places) को खोजना चाहते हैं, तो यह ब्लॉग आपको 16वीं सदी के उस दौर में ले जाएगा जहाँ लोधी वंश का अंत और मुग़ल साम्राज्य का आगाज़ हो रहा था।(जमाली कमाली मस्जिद) कौन थे जमाली और कमाली?  इस परिसर का नाम दो व्यक्तियों—जमाली और कमाली—के नाम पर रखा गया है, लेकिन इन दोनों की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही अधूरी भी। शेख जमाली: इनका असली नाम शेख फ़ज़लुल्लाह (या जलाल खान) था। ‘जमाली’ इनका उपनाम था, जो उर्दू शब्द ‘जमाल’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘सुंदरता’ । जमाली एक प्रसिद्ध सूफी संत और कवि थे जिन्होंने सिकंदर लोधी के शासनकाल से लेकर मुग़ल बादशाह बाबर और हुमायूँ के दौर तक का समय देखा था। और जमाली इस सभी के दौर में दरबारी कवि रहे. वे एक महान यात्री थे जिन्होंने एशिया और मध्य पूर्व की व्यापक यात्राएं की थीं । उनकी शायरी में फ़ारसी सूफीवाद की गहरी झलक मिलती है। उन्हें उनके समय में ‘खुसरो-ए-सानी’ (दूसरा खुसरो) और ‘हिंदुस्तान का तोता’ जैसे सम्मानजनक नामों से नवाज़ा गया था।  (जमाली कमाली मस्जिद) कमाली: जमाली के विपरीत, कमाली का इतिहास धुंधला है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में उनके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। लोक कथाओं और मौखिक परंपराओं के अनुसार, कमाली जमाली के प्रिय मित्र या उनके शिष्य थे। अनेक जगह वर्णित है कि जमाली और कमाली दोनों के प्रेम सम्बन्ध थे, दोनों एक दुसरे को बहुत चाहते थे. वहीँ  कुछ लोग उन्हें जमाली का भाई भी मानते हैं। उनकी पहचान को लेकर इतिहासकारों में आज भी मतभेद है, लेकिन जमाली के साथ उनका नाम और उनकी कब्र का जुड़ा होना उनके बीच के गहरे लगाव की गवाही देता है । वास्तुकला की भव्यता: मुग़ल शैली की पूर्वज जमाली कमाली मस्जिद का निर्माण 1528-29 ईस्वी के दौरान किया गया था। यह मस्जिद भारतीय-इस्लामी वास्तुकला के उस संक्रमण काल का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ लोधी शैली मुग़ल वास्तुकला में बदल रही थी। इसे भारत में मुग़ल मस्जिद वास्तुकला का ‘अग्रदूत’ (forerunner) माना जाता है। कह सकते हैं कि यही वह दौर था जब भारत में मुग़ल शैली की इमारते बननी शुरू हो गई थी…. जमाली कमाली मस्जिद की खासियत: संरचना: यह मस्जिद लाल बलुआ पत्थर से बनी है जिस पर सफेद संगमरमर की नक्काशी की गई है । मेहराब: मस्जिद के प्रार्थना कक्ष (Prayer Hall) के सामने एक बड़ा आंगन है। इसमें पाँच मेहराबें हैं, जिनमें केंद्रीय मेहराब सबसे बड़ी है और उस पर एक गुंबद बना है। जैसे-जैसे आप केंद्र की ओर बढ़ते हैं, इन मेहराबों का आकार बढ़ता जाता है, जो इसे एक भव्य रूप देता है । सज्जा: मेहराबों के कोनों (spandrels) को नक्काशीदार पदकों (medallions) और बेहतरीन अलंकरण से सजाया गया है । मस्जिद की पश्चिमी दीवार (किबला) में कुरान की आयतों के साथ सुंदर नक्काशीदार मेहराबें बनी हैं । मिनारें और बुर्ज: मस्जिद के पिछले हिस्से में झरोखे (oriel windows) बने हैं और इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय (octagonal) मीनारें मस्जिद की मजबूती और सुंदरता को बढ़ाती हैं। जमाली कमाली का मक़बरा: ‘दिल्ली का ज्वेल बॉक्स’ मस्जिद के ठीक बगल में उत्तर दिशा में जमाली कमाली का मक़बरा स्थित है, जिसे ‘दिल्ली का ज्वेल बॉक्स’ कहा जाता है। बाहर से यह एक साधारण 7.6 मीटर वर्ग की सपाट छत वाली इमारत दिखती है, लेकिन इसके अंदर की खूबसूरती देखकर कोई भी दंग रह सकता है। मक़बरे की अंदरूनी छत को एक ‘छद्म गुंबद’ (faux dome) के रूप में बनाया गया है, जो गहरे नीले, लाल और सुनहरे रंगों की चित्रकारी (arabesques) से सजा है । दीवारों पर रंगीन टाइलों का काम है और उन पर जमाली द्वारा लिखी गई फ़ारसी कविताएं उकेरी गई हैं । जब आप इसके अंदर कदम रखते हैं, तो आपको ऐसा महसूस होता है जैसे आप वाक़ई किसी गहनों के डिब्बे के अंदर आ गए हों । यहाँ सफेद संगमरमर की दो कब्रें हैं—एक जमाली की और दूसरी कमाली की । जमाली कमाली मस्जिद के कुछ  रुचिकर और अनोखे फैक्ट्स पेन बॉक्स का प्रतीक: दोनों कब्रों पर ‘पेन बॉक्स’ (Pen boxes) के चिन्ह बने हैं,, सूफी परंपरा में यह इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों कब्रें पुरुषों की हैं, क्योंकि विद्वान पुरुषों की कब्रों पर ही ऐसे चिन्ह बनाए जाते थे । अनोखी छत: मक़बरे की छत बाहर से सपाट (flat) दिखती है, लेकिन अंदर से यह एक गुंबद का अहसास कराती है। वास्तुकला का यह प्रयोग उस समय के हिसाब से काफी आधुनिक था। सूफी प्रेम की मिसाल: इतिहासकार माधवी मेनन के अनुसार, दो पुरुषों का एक साथ दफनाया जाना और उनकी शायरी में ईश्वर और इंसान के प्रति प्रेम का धुंधला होना, इसे ‘दरगाह डिज़ायर’ का एक बेहतरीन उदाहरण बनाता है। हाउंटेड कहानियाँ: हालांकि हमारे आधिकारिक स्रोतों में इसका उल्लेख नहीं है, लेकिन स्थानीय लोक कथाओं में इसे अक्सर ‘हाउंटेड’ या भूतिया जगह माना जाता है। हालांकि, दिन के समय यहाँ की शांति और सुंदरता किसी भी डर को दूर कर देती है। नॉन-लिविंग हेरिटेज: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसे ‘नॉन-लिविंग हेरिटेज स्ट्रक्चर’ की श्रेणी में रखा है, जिसका अर्थ है कि यहाँ अब नियमित नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं है। रहस्य और लोक कथाएँ: क्या सच में भूतिया(Haunted) है? जमाली कमाली को अक्सर दिल्ली की “haunted places” की सूची में भी शामिल किया जाता है। कहा जाता है कि: यहाँ अजीब आवाजें सुनाई देती हैं और कुछ लोगों ने यहाँ अजीब अनुभव किए हैं.. लेकिन इन दावों का कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है। क्या है इस मस्जिद की सच्चाई ??  विस्तार से जानने के लिए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल का यह व्लोग जरुर देखिये -👇👇👇