कोलम- सजाती है घर की चौखट और करती है सूर्य की किरणों का स्वागत
भारतीय संस्कृति में घर की चौखट का अपना एक अलग महत्त्व होता है। जैसे ही सुबह होती है, दक्षिण भारत के घरों के सामने सफेद चावल के आटे से बने सुंदर-सुंदर डिज़ाइन दिखाई देते हैं इन्हें ही “कोलम” कहा जाता है। यह सिर्फ एक सजावट नहीं, बल्कि एक भावना, एक प्रार्थना और एक जीवन दर्शन है। कोलम बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसकी जड़ें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों से गहराई से जुड़ी हैं। सुबह-सुबह चित्रों के संग लालिमा बिखेरती है अपना रंग माना जाता है कि जब कोई स्त्री सुबह-सुबह झाड़ू लगाकर दरवाज़े पर कोलम बनाती है, तो वह अपने घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त कर देती है और सुख-समृद्धि का स्वागत करती है। यह परंपरा केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। कोलम बनाने में प्रयुक्त आटा पक्षियों और चींटियों के भोजन का माध्यम बनता है, जिससे यह प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक भी बन जाता है। तमिल भाषा में “कोलम” का अर्थ होता है “सुंदरता” या “डिज़ाइन”। इन आकृतियों में वृत्त, त्रिकोण, तारे, फूल और ज्यामितीय रेखाएं शामिल होती हैं। कई बार ये आकृतियां देवी-देवताओं की उपासना से भी जुड़ी होती हैं। हर सुबह कोलम बनाना एक ध्यान प्रक्रिया जैसा होता है, मन को स्थिर करने वाला, आत्मा को शांत करने वाला और दिन की सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक। दक्षिण भारत में यह परंपरा इतनी प्राचीन है कि इसे हर त्योहार, विवाह और विशेष अवसर पर विशेष रूप से बनाया जाता है। दीपावली, पोंगल, ओणम और नववर्ष के दिन तो घर-घर में कोलम के नए रूप खिल उठते हैं। कोलम का इतिहास- परंपरा से कला तक का सफर.. कोलम की परंपरा भारत के प्राचीन वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। पुराणों और शिल्प ग्रंथों में भी “रंगवली”, “अल्पना” और “मंडना” जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जो कोलम के ही रूप हैं। दक्षिण भारत में यह परंपरा विशेष रूप से तमिल समाज के साथ पल्लव और चोल वंश के दौर में फली-फूली। पुराने मंदिरों की दीवारों और पत्थरों पर उकेरे हुए कोलम जैसे पैटर्न इस कला के ऐतिहासिक प्रमाण हैं। माना जाता है कि इन रेखाचित्रों के माध्यम से देवी लक्ष्मी को आमंत्रित किया जाता था, ताकि घर में धन-धान्य की वृद्धि हो। कहां से आया कोलम, क्या है इसमें खास? इसकी उत्पत्ति का एक और रोचक पहलू यह है कि यह एक “जीवंत परंपरा” है यानी हर पीढ़ी इसे अपनी शैली में नया आकार देती आई है। पहले यह केवल सफेद चावल के आटे से बनाया जाता था, पर आज इसमें रंगीन पाउडर, फूलों की पंखुड़ियां और कभी-कभी चावल के घोल का उपयोग भी होता है। हर क्षेत्र में कोलम के अपने विशेष नाम और रूप मिलते हैं जैसे आंध्र प्रदेश में इसे मुग्गु, कर्नाटक में रंगोली, और केरल में कळम कहा जाता है। इन रेखाओं के पीछे छिपे ज्यामितीय पैटर्न केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि गणितीय सटीकता और प्रतीकवाद से भी भरे होते हैं। वृत्त जीवन के चक्र का प्रतीक है, जबकि वर्ग स्थिरता और सुरक्षा को दर्शाता है। बहुत से लोग मानते हैं कि कोलम सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का माध्यम भी था जब महिलाएं सुबह दरवाज़े पर कोलम बनाती थीं, तो वह समय आपसी बातचीत और मेल-मिलाप का भी होता था। इस तरह यह कला समुदाय को जोड़ने का कार्य करती रही है। कोलम बनाना है एक रोमांचक काम कोलम बनाने की कला देखने में जितनी सरल लगती है, उतनी ही साधना की मांग करती है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले ज़मीन को साफ़ किया जाता है, फिर पानी से हल्का गीला किया जाता है ताकि चावल का आटा या रंगीन पाउडर अच्छी तरह जम सके। इसके बाद उंगलियों से छोटे-छोटे बिंदु बनाए जाते हैं । इन्हीं बिंदुओं को जोड़कर सुंदर आकृतियां उभरती हैं। यही “बिंदु कोलम” की शैली कहलाती है। कोलम के डिज़ाइन अनगिनत हैं कुछ देवी-देवताओं को समर्पित होते हैं, कुछ ज्यामितीय पैटर्न वाले, तो कुछ पूरी तरह से रचनात्मक। हर डिज़ाइन के पीछे एक अर्थ छिपा होता है। उदाहरण के लिए, कमल का कोलम पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है, सूर्य कोलम ऊर्जा और जीवन का संकेत देता है, जबकि गणेश कोलम बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना होती है। इसमें क्या-क्या इस्तेमाल किया जाता है? कोलम बनाने में इस्तेमाल होने वाले रंग भी बहुत मायने रखते हैं सफेद शांति का प्रतीक है, लाल ऊर्जा का, पीला समृद्धि का, और हरा जीवन का। आजकल कई लोग कोलम को स्टेंसिल या डिजिटल प्रिंट के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं, परंतु पारंपरिक हाथ से बने कोलम की बात ही कुछ और होती है। इस कला में लय, एकाग्रता और सौंदर्य का अनोखा संगम देखने को मिलता है। एक पारंपरिक कोलम कलाकार के लिए यह सिर्फ डिज़ाइन नहीं, बल्कि एक ध्यान की अवस्था होती है जैसे कोई अपने मन की भावनाएं धरती पर उकेर रहा हो। त्योहारों में कोलम बनाना और भी विशेष हो जाता है। पोंगल के समय पूरे तमिलनाडु में कोलम प्रतियोगिताएं होती हैं, जहां महिलाएं सड़कों और गलियों को रंगीन डिज़ाइनों से भर देती हैं। यह दृश्य इतना मनमोहक होता है कि जैसे धरती ने रंगों की चादर ओढ़ ली हो। डिजिटल दौर में कोलम की नई पहचान आज का युग तकनीक और तेज़ी का है, लेकिन कोलम की परंपरा ने खुद को आधुनिक जीवन के साथ बहुत खूबसूरती से जोड़ा है। अब कोलम केवल घरों की दहलीज पर ही नहीं, बल्कि डिज़ाइन, इंटीरियर डेकोरेशन, फैशन और डिजिटल आर्ट तक में अपनी जगह बना चुका है। कई आर्टिस्ट कोलम के डिज़ाइनों को कपड़ों, साड़ियों, दीवार पेंटिंग और ज्वेलरी में प्रयोग कर रहे हैं। सोशल मीडिया ने भी इस कला को नया जीवन दिया है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर हजारों कलाकार हर दिन कोलम के नए-नए पैटर्न और ट्यूटोरियल साझा करते हैं। इससे न केवल यह कला संरक्षित हो रही है, बल्कि नई पीढ़ी भी इसे अपनाने लगी है। कोलम अब इको-फ्रेंडली आर्ट के रूप में भी जाना जा रहा है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रंगों और चावल के आटे का उपयोग होता है। यह पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि पक्षियों और कीटों को भोजन भी प्रदान करता है। कोलम की यह कला




