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Teli Temple तेली का मंदिर- इसके नाम के पीछे हैं तीन कहानियाँ

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क्या आपने कभी ऐसी जगह के बारे में सुना है जहाँ एक ही लोकेशन पर पुराना इतिहास, अनोखी बनावट और रहस्यमय माहौल सब एक साथ मिल जाएं? जी हां! ग्वालियर किले के अंदर बना तेली का मंदिर बिलकुल वैसी ही जगह है। यह किले की सबसे पुरानी और सबसे ऊँची इमारतो में से एक है, करीब 30 मीटर ऊंचा ये मंदिर दूर से ही आपका ध्यान अपनी ओर खींच लेता है जिस कारण आप खुद को इस जगह पर जाने से रोके ही नहीं पाओगे। Teli Temple जैसे ही आप इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचते है तो ऐसा लगता है जैसे सदियों पुरानी कोई कहानी सामने आ खड़ी हुई हो। माना जाता है कि यह मंदिर 8वीं–9वीं शताब्दी का है। ज़्यादातर इतिहासकारो का मानना है कि ये मंदिर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल में बना था, जबकि कुछ इतिहासकार इसकी कला शैली को देखकर इसे हूण राजा मिहिरकुल से भी जोड़ते हैं, लेकिन आम तौर पर 9वीं शताब्दी को ही सही माना जाता है। तेली के मंदिर के नाम का रहस्य? तेली के मंदिर के नाम के पीछे कई मजेदार कहानियां बताई जाती है एक कहानी के अकाउडिंग इसे तेल के व्यापारी (तेली) ने बनवाया था या उनके द्वारा दिए गए दान से इस मंदिर का निर्माण हुआ। वही दूसरा मत ये कहता हैकि यहाँ पूजा-पाठ का जिम्मा तेलंगाना से आए ब्राह्मणों के पास था, इसलिए इस मंदिर का नाम तेली का मंदिर पड़ गया। ये दोनों ही कहानियाँ दिलचस्प हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खिंचती है और यही तो इस जगह की खूबसूरती है। ब्रिटेन ने तेली के मंदिर में बनाई थी सोडा कंपनी साथ ही ये भी माना जाता है कि जब अंग्रेज़ों ने ग्वालियर किले पर कब्ज़ा किया, तो इस मंदिर को शॉपिंग शॉप में बदल दिया गया था। उन्होंने यहां एक सोडा सोया बनवाया था। ब्रिटिश एसोसिएट मेजर कीथ ने एक सोडा मसाला भी इस तेली के मंदिर में स्थापित किया था। ऐसा बताया जाता है कि इस मसाले में बने सोडा को इंग्लैंड भी भेजा गया था। कई सार्जेंट तक ब्रिटेन के घटक इस मंदिर के अधिकारी मैसिज तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। आगे, कर्नल हॉकिन्स ने इसे बंद कर दिया था। अद्भुत वास्तुकला- दो अलग-अलग संस्कृतियों का मेल तेली का मंदिर अपनी बनावट और उसमें बाकियों से बनाई गई देवी-देवताओं, पौराणिक प्राणियों और जटिल पुष्प आकृतियों की मूर्तियो के लिए भी जाना जाता हैं। जो इस मंदिर को बिल्कुल अलग बनाती है। यहाँ आपको एक ही जगह पर उत्तर भारतीय (नागर शैली) और दक्षिण भारतीय (द्रविड़ शैली) वास्तुकला का मेल दिखाई देता है, जो इसे और भी खास बनाता है। मंदिर की छत भी आम मंदिरों जैसी नहीं है। यह पिरामिड जैसी न होकर लंबी, सुरंगनुमा छत है, जिसे बैरल-वॉल्टेड रूफ कहते हैं। यही बताते हैं कि इस पर द्रविड़ शैली का असर है। इसे वलभी मोड भी कहा जाता है जिसमें आयताकार ढांचे पर ऐसे गुंबदनुमा छत बनाई जाती थी। कामुक नक्काशियाँ आपको खजुराहो के मंदिरों की याद दिला देती हैं जब आप इसके सामने खड़े होते हैं तो सबसे पहले इसकी ऊँची, पिरामिड जैसी द्रविड़ शैली की छत आपकी नज़र अपनी ओर खींच लेती है, जो आमतौर पर दक्षिण भारत के मंदिरों में देखी जाती है। वहीं इसके मंडप और प्रवेश द्वार में उत्तर भारतीय मंदिरों की झलक दिखाई देती है बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ, खूबसूरत नक्काशी और विशाल हॉल, जहाँ कभी भक्तों की भीड़ जुटती होगी। मंदिर की बाहरी दीवारों पर की गई बारीक और कभी-कभी कामुक नक्काशियाँ आपको खजुराहो के मंदिरों की याद दिला देती हैं, जिन्हें उनकी ऐसी ही सुंदर कला के लिए जाना जाता है। बाहर की दीवारों पर बने अर्धचंद्राकार मेहराब, जिन्हें चंद्रशाला कहा जाता है, भी इसी शैली की खास पहचान हैं। माना जाता है कि यह मंदिर शुरू में देवी शक्ति को समर्पित था, लेकिन समय के साथ हुए आक्रमण और नुकसान की वजह से बाद में इसे शिव मंदिर के रूप में दोबारा बनाया गया। इसके बावजूद, मुख्य द्वार पर आज भी भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की खूबसूरत नक्काशी देखी जा सकती है। प्रवेश द्वार पर गंगा और यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ भी हैं, जो इस मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। मंदिर का सफ़र कभी युद्ध स्थल, कभी सोडा फैक्ट्री इस मंदिर ने इतिहास के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। सल्तनत काल में हुए हमलों से इसे काफी नुकसान पहुँचा। बाबर ने जब ग्वालियर किले पर कब्जा किया, तो उसने इस मंदिर को किले की सबसे ऊँची इमारत बताया। बाद में 1857 की क्रांति के बाद जब ग्वालियर अंग्रेजों के हाथों में चला गया, तो उन्होंने मंदिर के परिसर का इस्तेमाल पूजा के लिए नहीं, बल्कि एक सोडा फैक्ट्री के रूप में किया! इसके बाद 1860 के दशक में अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ रिसर्च की और 1881 से 1883 के बीच इसका दोबारा निर्माण हुआ, जिससे यह अपनी पुरानी पहचान वापस पा सका। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की ओर से पांच सुझाव मध्य प्रदेश के एक और अनोखे मन्दिर के बारे में पढ़िए!