अस्सी खंभा की बावड़ी – जहाँ 80 खंभों ने कैद और आज़ादी दोनों देखी
अगर आपको इतिहास, सुंदर इमारतें और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ पसंद हैं, तो मध्यप्रदेश के ग्वालियर किले में बनी अस्सी खंभा बावड़ी आपको ज़रूर देखनी चाहिए। 80 खंभों वाली बावड़ी किले की पुरानी जल-संरचना का खास हिस्सा हैं| जो कि आज भी बिल्कुल शांत और रहस्यमय लगती है। यहाँ आकर ऐसा महसूस होता है जैसे पुराने ज़माने का इतिहास और उस दौर के लोगों की बुद्धिमानी आपके सामने जीवंत हो उठती है। 16वीं शताब्दी में बनी यह बावड़ी न सिर्फ पानी का बड़ा स्रोत थी, बल्कि इंजीनियरिंग और वास्तुकला का बेहतरीन नमूना भी है। पाँच दिनों में बना एक कमाल अस्सी खंभा की बावड़ी का निर्माण लगभग 1500 ईस्वी में महाराजा मान सिंह तोमर ने करवाया था। मान्यता है कि पुराने समय के हिंदू इंजीनियरों ने इस बड़ी-सी बावड़ी को सिर्फ पाँच दिनों में बना दिया था, जो किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। इसे बनाने का सबसे बड़ा कारण था, सिकंदर लोदी का ग्वालियर पर हमला, 1505 में सिकंदर लोदी ने जब ग्वालियर किले को घेर लिया था, तब किले में पानी की कमी होने से बचने के लिए महाराज मान सिंह ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था| जिससे महल के अंदर तो पानी की कमी नहीं हुई पर किले के बाहर घेराबंदी किए सिकंदर और उसकी सेना के बीच पानी और खाने की कमी हो गई| इसी वजह से सिकंदर लोदी की घेराबंदी असफल हो गई और उसे मजबूर होकर वापस आगरा लौटना पड़ा। इंडो-इस्लामिक शैली का अनोखा मेल अस्सी खंभा की बावड़ी पानी को सहेजने की पुरानी तकनीक का जबरदस्त उदाहरण है। इसकी बनावट देखकर साफ़ पता चलता है कि उस समय के भारतीय इंजीनियर कितने समझदार और कुशल रहे होंगे। इस बावड़ी को 80 मज़बूत खंभों पर टिकाया गया है, इसी वजह से इसका नाम ‘अस्सी खंभा की बावड़ी’ पड़ा। इसकी संरचना कई मंज़िलों तक नीचे जाती है और ऊपर का हिस्सा मंडप जैसा दिखता है, जिसमें 64 खंभे बनाए गए हैं। इसकी खासियत यह है कि इसमें हिंदू और मुगल—दोनों शैलियों का सुंदर मिश्रण दिखता है। दरवाज़े मुगल अंदाज़ में बने हैं, जबकि बाकी हिस्सों में भारतीय शैली साफ़ झलकती है। बड़े-बड़े पत्थरों से बनी यह बावड़ी ऐसे कक्षों से भरी है जिन्हें पुराने समय में महिलाये खासकर रानियाँ गर्मी से राहत पाने और स्नान करने के लिए इस्तेमाल करती थीं। पानी तक पहुँचने के लिए नीचे तक सीढ़ियाँ जाती हैं, और सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ का पानी गर्मियों में भी सूखता नहीं था। दाता बंदी छोड़’ की ऐतिहासिक कहानी अस्सी खंभा की बावड़ी सिर्फ पानी का जरिया नहीं थी, बल्कि यहाँ का इतिहास राजनीति, धर्म और कई बड़ी घटनाओं का गवाह रहा है। महाराजा मान सिंह के समय में यहाँ एक शिव मंदिर था, जिसके बीच में शिवलिंग स्थापित था। लेकिन जब तोमर राजाओं का शासन खत्म हुआ और मुगलों ने किले पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने मंदिर को तोड़कर इस जगह को शाही जेल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। मुगल बादशाह जहाँगीर ने सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी को करीब 2 साल 3 महीने तक यहीं कैद रखा था। उनके साथ 52 हिंदू राजाओं को भी इसी परिसर में बंद किया गया था। बाद में, जब गुरु जी को रिहा किया गया और उन्होंने 52 राजाओं को भी आज़ाद करवाया, तब उन्हें ‘दाता बंदी छोड़’ की उपाधि मिली। इसी घटना की याद में किले में गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब बनाया गया है, जहाँ आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इतना ही नहीं, मुगल शासक औरंगज़ेब ने भी अपने भाई मुराद बख्श और भतीजे सुलेमान शिकोह को यहीं कैद करके रखा था। फाइव कॉलरस ऑफ ट्रैवल की ओर से पाँच सुझाव शांत और खूबसूरत जगह: अस्सी खंभा की बावड़ी ग्वालियर किले के अंदर एक शांत और देखने लायक स्थान है। कैसे पहुँचें: ग्वालियर शहर से आप ऑटो या कैब लेकर किले तक पहुँच सकते हैं| यहा आने में आपको केवल 15 से 25 मिनट का सामय ही लगता है| जिसका किराया ₹80 से ₹150 तक है| बावड़ी तक कैसे जाएँ: किले के मुख्य गेट से मान सिंह पैलेस की तरफ बढ़ें। पैलेस के प्रवेश से ठीक पहले, बाईं तरफ यह बावड़ी मिलती है। क्या ध्यान रखें: यहा आते सामय आरामदायक जूते ही पहनें, क्योंकि यहा की सतह थोड़ी असमान है, जिससे आपको चलने में परेशानी हो सकती है| गर्मी और भीड़ से बचने के लिए सुबह या देर दोपहर के सामय ही यहा जाएँ। पास के आकर्षण: बावड़ी देखने के बाद इन जगहों को भी जरूर देखें मान सिंह पैलेस, तेली का मंदिर, गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब,|




