देश में माल ढुलाई के इंफ्रास्ट्रक्चर को नई रफ्तार देने की दिशा में रेलवे बोर्ड ने बड़ा कदम उठाया है। बोर्ड ने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL) को DanKuni-सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) प्रोजेक्ट को फास्ट ट्रैक मोड में आगे बढ़ाने और इसकी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) को मौजूदा हालात के मुताबिक संशोधित करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकार लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम करने और “मेक इन इंडिया” व निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।
क्या है DanKuni- सूरत DFC प्रोजेक्ट?
दानकुनी (पश्चिम बंगाल) से सूरत (गुजरात) तक प्रस्तावित यह कॉरिडोर देश के पूर्वी खनन और औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बंदरगाहों से जोड़ेगा। यह रूट कोयला, स्टील, सीमेंट, कंटेनर और अन्य भारी माल ढुलाई के लिए अहम माना जाता है। मौजूदा समय में यही ट्रैफिक सामान्य रेलवे लाइनों से गुजरता है, जिससे यात्री ट्रेनों की गति प्रभावित होती है और माल गाड़ियों की औसत स्पीड कम रहती है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनने से माल गाड़ियों के लिए अलग ट्रैक उपलब्ध होगा, जिससे ट्रांजिट टाइम घटेगा और समयबद्ध डिलीवरी संभव हो सकेग

DPR क्यों हो रही है संशोधित?
दानकुनी–सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की शुरुआती डीपीआर कई साल पहले तैयार की गई थी, लेकिन तब से देश के औद्योगिक नक्शे में काफी बदलाव आ चुका है। नए इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के विकास, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्कों की स्थापना, बंदरगाहों के विस्तार और नई खनन परियोजनाओं के शुरू होने से माल ढुलाई के ट्रैफिक अनुमान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इसी वजह से अब डीपीआर को संशोधित करने की जरूरत महसूस की जा रही है, ताकि मौजूदा ट्रैफिक पैटर्न का सही आकलन किया जा सके, निर्माण लागत और भूमि अधिग्रहण की बढ़ी हुई कीमतों को शामिल किया जा सके, पर्यावरणीय और तकनीकी मानकों में आए बदलावों को समायोजित किया जा सके और पूरे फाइनेंशियल मॉडल को ज्यादा व्यवहारिक और टिकाऊ बनाया जा सके।
संशोधित DPR से यह तय होगा कि परियोजना की कुल लागत कितनी होगी, निर्माण की समय-सीमा क्या होगी और इसका आर्थिक लाभ कितना अनुमानित है।
इस प्रोजेक्ट में फास्ट ट्रैक मोड क्यों?
सरकार की नीति स्पष्ट है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी जाए, और दानकुनी–सूरत कॉरिडोर को इसी रणनीति के तहत पूर्वी और पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के बीच एक अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह परियोजना तय समय पर पूरी होती है, तो मालगाड़ियों की औसत रफ्तार 60 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है, जिससे ट्रांजिट टाइम में उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी, भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी और रेलवे नेटवर्क पर मौजूदा भीड़भाड़ कम हो सकेगी। अलग फ्रेट ट्रैक उपलब्ध होने से यात्री ट्रेनों के संचालन में भी सुधार होगा और उनकी समयपालन क्षमता बेहतर होने की उम्मीद है।
किन राज्यों को होगा सीधा फायदा?
यह कॉरिडोर पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे प्रमुख औद्योगिक राज्यों को आपस में जोड़ सकता है, जहां कोयला, लौह अयस्क, इस्पात और मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत आधार मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना के शुरू होने से खनन और स्टील सेक्टर को नई गति मिलेगी, क्योंकि कच्चे माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई अधिक तेज और सुगम हो सकेगी। साथ ही बंदरगाहों तक माल की पहुंच तेज होने से निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, जबकि एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को सस्ता और भरोसेमंद परिवहन विकल्प उपलब्ध होगा। निर्माण चरण के दौरान बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होने की संभावना है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि संशोधित DPR कब तक रेलवे बोर्ड को सौंपी जाती है और केंद्र सरकार से अंतिम मंजूरी कब मिलती है। परियोजना की लागत और फंडिंग मॉडल स्पष्ट होने के बाद ही निर्माण कार्य की वास्तविक टाइमलाइन सामने आएगी। रेलवे बोर्ड का यह कदम भारत के फ्रेट नेटवर्क को आधुनिक और हाई-स्पीड बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। यदि दानकुनी–सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर तय समय में पूरा होता है, तो यह देश की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है और भारतीय रेलवे को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बना सकता है।