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मैक्लोड़गंज का कोतवाली बाजार! खरीदारी, स्वाद और तिब्बती वाइब का एक अद्भुत सफर

मैक्लोड़गंज कोतवाली बाजार इतिहास का साक्षी

मैक्लोड़गंज का कोतवाली बाजार कोई सामान्य बाज़ार नहीं, बल्कि इस पहाड़ी कस्बे की धड़कन है। इसका इतिहास ब्रिटिश दौर से शुरू होता है, जब अंग्रेजों ने पहाड़ों में बैरक, दफ्तर और क्वार्टर बसाने शुरू किए थे। उस समय यहां एक छोटी सी मार्केट बनी, जो धीरे-धीरे स्थानीय लोगों, तिब्बतियों और यात्रियों का मिलन स्थल बन गई। फिर 1959 में जब दलाई लामा तिब्बत से आए, तो उनके साथ हजारों तिब्बती परिवार भी यहां बस गए। इससे बाजार का रंग-रूप पूरी तरह बदल गया। तिब्बती कारीगरी, कपड़े, मोमबत्तियां, हेंड़ीक्राफ्ट और खाने-पीने का नया स्वाद जुड़ गया। समय के साथ यह बाजार सिर्फ खरीदारी का ठिकाना नहीं रहा, बल्कि एक ऐसी जगह बन गया जहां हर गली एक अद्भुत अंदाज में सजी हुई है। कहीं पुराने देवदार के पेड़, कहीं तिब्बती प्रार्थना झंडे हवा में लहराते हुए, तो कहीं पहाड़ी महिलाएं अपने खास हस्तशिल्प बेचती दिखाई देती हैं। आज कोतवाली बाजार मैक्लोड़गंज का सबसे व्यस्त और सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला शॉपिंग स्पॉट है। यहां की गलियों में संस्कृति, इतिहास और खानपान का मिलाजुला स्वाद मिलता है। यह बाजार अपने आप में हिमाचल की पुरानी रिवायतों और तिब्बती सभ्यता की झलक एक साथ दिखाता है, और यही वजह है कि हर पर्यटक यहां रुककर कुछ न कुछ जरूर खरीदता, देखता और महसूस करता है।

मैकलियोडगंज

मैक्लोड़गंज नाम कैसे पड़ा?

इस बाजार का नाम मैक्लोड़गंज नाम ब्रिटिश शासन के दौरान पड़ा। दरअसल, यह जगह अंग्रेजों के एक अधिकारी डेविड मैक्लोड़ के नाम पर रखी गई थी, जो पंजाब प्रांत के उस समय के गवर्नर थे। अंग्रेजों ने कांगड़ा घाटी में एक सैन्य कैंटोनमेंट और हिल स्टेशन विकसित किया, जहां अधिकारियों के रहने और काम करने के लिए नई बसाहट बनाई गई। इसी बसाहट को उनके सम्मान में McLeod गंज कहा जाने लगा। वैसे यहां गंज शब्द फ़ारसी-उर्दू से आया है, जिसका मतलब होता है छोटी बस्ती या मार्केट एरिया। इसलिए मैक्लोड़ + गंज मिलकर बना मैक्लोड़गंज, यानी मैक्लोड़ की बसाहट। आज यह जगह तिब्बती संस्कृति की वजह से विश्वभर में मशहूर है, लेकिन इसका नाम ब्रिटिश प्रशासन की उसी इतिहास से जुड़ा है, जब हिल स्टेशनों को अंग्रेज अधिकारियों के नाम पर रखा जाता था।

मैकलियोडगंज

कहां है यह बाजार और कैसे पहुंचे?

कोतवाली बाजार, मैक्लोड़गंज टाउन का मुख्य हिस्सा है और लगभग हर तरफ से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह बाजार धर्मशाला से करीब 5 किलोमीटर के फासले पर स्थित है। अगर कोई धर्मशाला में रह रहा है, तो टैक्सी, लोकल बस या ऑटो से 15–20 मिनट में सीधे बाजार पहुंच सकता है। मैक्लोड़गंज की संकरी सड़कों पर सफर अपने आप में एक खूबसूरत अनुभव है। एक तरफ गहरी घाटियां, दूसरी तरफ हरे-भरे देवदार के जंगल और बीच-बीच में छोटे-छोटे कैफ़े। अगर आप दिल्ली, चंडीगढ़ या पठानकोट से आ रहे हैं, तो सड़क मार्ग, बस या टैक्सी सबसे आसान रास्ता है। दिल्ली से वोल्वो बसें सीधी मैक्लोड़गंज तक आती हैं। वहीं, नजदीकी रेलवे स्टेशन पठानकोट है, यहां से टैक्सी या बस से 3 से 4 घंटे में मैक्लोड़गंज पहुंचा जा सकता है। नजदीकी हवाई अड्डा कांगड़ा एयरपोर्टहै, जो केवल 20 किलोमीटर दूर है। बाजार पहुंचने के बाद आपको पैदल घूमने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यहां की गलियां संकरी हैं और यहां घूमना ही असली मज़ा है। हर मोड़ पर कोई नई खुशबू, गर्म मोमो या हस्तशिल्प की दुकान आपका दिल जीत लेती है। यानी, यहां तक पहुंचना भी रोमांच है और यहां घूमना उससे भी ज्यादा मजेदार।

मैकलियोडगंज

खरीदारी, तिब्बती कला और फूड का हॉटस्पॉट

कोतवाली बाजार की सबसे बड़ी पहचान इसकी तिब्बती कला और स्थानीय पहाड़ी कारीगरी है। यहां की दुकानों में आपको हाथ से बने स्कार्फ, ऊनी शॉल, प्रार्थना-चक्र, लकड़ी की खूबसूरत मूर्तियां, तिब्बती मोमबत्तियां, लैम्प, रंगीन झंडियां, और एंटीक शो-पीस मिल जाएंगे। अधिकांश पर्यटक यहां से खासकर तिब्बती पेंटिंग, जिसे थंका आर्ट कहते हैं, खरीदकर ले जाना पसंद करते हैं। बाजार का दूसरी बड़ी खास बात है स्ट्रीट फूड। यहां  तिब्बतन मोमो, थुक्पा, लाफिंग हनी बटर टी, और पहाड़ी दाल चावल कढ़ी का स्वाद हर किसी को लुभाता है। चाय और कॉफी के छोटे-छोटे कैफ़े यहां की ठंडी हवा में और भी सुकून देते हैं। इसके अलावा यहां के कैफ़े लाइव म्यूजिक और वाइब की वजह से भी मशहूर हैं। अगर खरीदारी आपका शौक है, तो यहां हर बजट में शानदार विकल्प मिलते हैं। चाहे आप 50 रुपये की चूड़ियां लें या 5000 रुपये का प्रीमियम कश्मीरी शॉल। यह बाजार सेल्फी लवर्स के लिए भी परफेक्ट है, क्योंकि हर गली का बैकग्राउंड इंस्टा रेडी दिखाई देता है। कुल मिलाकर, यह बाजार संस्कृतियों का ऐसा संगम है जहां घूमने का मज़ा दोगुना हो जाता है। (हिल स्टेशनों को अंग्रेज अधिकारियों के नाम पर रखा जाता था।)

मैकलियोडगंज

क्या देखें इस बाजार में?

कोतवाली बाजार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं, बल्कि एक पूरा अनुभव है। यहां घूमते हुए आपको कई खूबसूरत जगहें, दुकानें और लोकल चीजें देखने को मिलती हैं। सबसे पहले तो यहां की तिब्बती दुकानें अपनी रंगीनता और खूबसूरती से मन मोह लेती हैं। यहां प्रार्थना चक्र, तिब्बती कटोरियां, हाथ से बने गहने और सजावटी सामान हर पर्यटक को आकर्षित करते हैं। कई दुकानें ऐसी हैं यहां लोग लाइव कारीगरी भी करते दिखाई देते हैं। इसके अलावा यहां के कैफ़े और ईटरीज़ में आपको दुनिया भर के स्वाद मिल जाते हैं। तिब्बती स्नैक्स से लेकर इटालियन पिज़्ज़ा तक, और कांगड़ा टी से लेकर कड़क मसाला चाय तक। शाम होते ही बाजार में एक अलग ही रौनक आ जाती है। रोशनी, भीड़, हल्की ठंड और पहाड़ों का सुकून। बाजार से पैदल चलते-चलते आप दलाई लामा मंदिर, भगसूनाग मंदिर, भगसूनाग झरना, और मैक्लोड़गंज स्क्वायर भी जा सकते हैं। यानी यहां घूमने के लिए सिर्फ दुकानों पर ही निर्भर नहीं होना पड़ता, बल्कि यह इलाका पूरे मैक्लोड़गंज का केंद्र है जहां से कई आकर्षण पैदल दूरी पर ही मिल जाते हैं। शाम के समय बाजार की स्ट्रीट-शॉपिंग और लोकल हैंडीक्राफ्ट तो इस जगह की असली पहचान है

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फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से खास पांच यात्रा सुझाव

अगर आपको बाजार की असली वाइब महसूस करनी है, तो सुबह का समय सबसे अच्छा है। दुकानदार आराम से बातचीत करते हैं और कीमतें भी बेहतर मिलती हैं।

यहां के तिब्बती और पहाड़ी हस्तशिल्प असली कलाकारों द्वारा बनाए जाते हैं। नकली माल से बचें और दुकानदार से असली-नकली का फर्क पूछते हुए खरीदारी करें।

कोतवाली बाजार के अंदर कई छोटे-छोटे कैफ़े हैं जिनका माहौल बेहद खास है। पहाड़ी कॉफी, ऑर्गेनिक चाय और तिब्बती सूप जरूर ट्राई करें।

बहुत-सी दुकानें डिजिटल पेमेंट लेती हैं, पर पहाड़ी नेटवर्क कभी-कभी गड़बड़ा जाता है। इसलिए थोड़ी नकदी साथ रखने से दिक्कत नहीं होती।

बाजार का असली जादू शाम को नजर आता है रोशनी, हल्की ठंड, और पहाड़ी हवा का एक शानदार दृश्य है। पैदल चलकर हर गली को महसूस करें।

मैकलियोडगंज

कहां रुकें और क्या खाएं?

कोतवाली बाजार के आसपास ठहरने के लिए कई शानदार होटल, गेस्ट हाउस और होमस्टे हैं, जो हर बजट के हिसाब से उपलब्ध हैं। यहां 800–1000 रुपये से लेकर 3000–5000 रुपये तक के होटल आसानी से मिल सकते हैं। कई होटल ऐसे हैं जिनकी बालकनी से पहाड़, जंगल और बादलों का नज़ारा सीधे दिखता है। अगर आप मार्केट के पास रहेंगे, तो घूमना और खाने-पीने की जगहों तक पहुंचना बहुत आसान हो जाता है। खाने की बात करें तो यहां हर स्वाद का इंतजाम है। तिब्बती खाना मोमो, ठुकपा, लाफिंग, तिंगमो यहां का यह मानो मस्ट ट्राय है। इसके अलावा नॉर्थ इंडियन थाली, पंजाबी खाना, साउथ इंडियन डोसा, पिज़्ज़ा, पास्ता और बेकरी आइटम्स भी मिलते हैं। स्ट्रीट फूड में आलू-टिक्की, चाट और गर्म कॉफी का कॉम्बिनेशन हर किसी को पसंद आता है। अगर आप पहाड़ी स्वाद चखना चाहते हैं, तो कांगड़ा दाल चावल या हिमाचली कढ़ी जरूर ट्राई करें। कुल मिलाकर, ठहरने से लेकर खाने तक, इस बाजार के आसपास सारी सुविधाएं बेहतरीन हैं। यहां रहते हुए आप स्थानीय संस्कृति, लोगों और तिब्बती परंपराओं को और अच्छे से महसूस कर सकते हैं।

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Hello! I Pardeep Kumar

मुख्यतः मैं एक मीडिया शिक्षक हूँ, लेकिन हमेशा कुछ नया और रचनात्मक करने की फ़िराक में रहता हूं।

लम्बे सफर पर चलते-चलते बीच राह किसी ढ़ाबे पर कड़क चाय पीने की तलब हमेशा मुझे ज़िंदा बनाये रखती
है।

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